Old Testament
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यहोशू 14:10 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
और अब देख, जब से यहोवा ने मूसा से यह वचन कहा था तब से पैंतालीस वर्ष हो चुके हैं, जिनमें इस्राएली जंगल में घूमते फिरते रहे; उनमें यहोवा ने अपने कहने के अनुसार मुझे जीवित रखा है; और अब मैं पचासी वर्ष का हूँ।
यहोशू 14:10 पद-दर-पद बाइबल टीका
*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।
यहोशू 14:10 समानांतर पद और संबंधित वचन
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गिनती 14:30 (HINIRV) »
उसमें से यपुन्ने के पुत्र कालेब और नून के पुत्र यहोशू को छोड़ कोई भी उस देश में न जाने पाएगा, जिसके विषय मैंने शपथ खाई है कि तुमको उसमें बसाऊँगा। (1 कुरि. 10:5, यहू. 1:5)

गिनती 14:33 (HINIRV) »
और जब तक तुम्हारे शव जंगल में न गल जाएँ तब तक, अर्थात् चालीस वर्ष तक, तुम्हारे बाल-बच्चे जंगल में तुम्हारे व्यभिचार का फल भोगते हुए भटकते रहेंगे। (प्रेरि. 7:36)

यहोशू 14:10 पर टिप्पणी — प्रमुख विचार और जीवन के लिए मार्गदर्शक संदेश
यह प verse यहोशू की किताब में बाइबल के एक महत्वपूर्ण क्षण को उजागर करता है: मूसा के साथ परमेश्वर के वादे के साथ जुड़े पलों की याद दिलाते हुए यहोशू संतान के रूप में कुल 45 वर्ष से अधिक समय की परीक्षा और आज भी परमेश्वर की सुरक्षा में जीवित रहने की उद्घोषणा करता है। यह पाठ न केवल उम्र की चर्चा है, बल्कि विश्वास की दृढ़ताकी और परमेश्वर के अनवरत पालन के भरोसे पर केंद्रित है।
कथन का स्थान और शास्त्रीय पाठ-संदर्भ
यहोशू 14:10 में उम्र का उल्लेख और निर्माण की प्रक्रिया के अनुरूप यहोशू के विश्वास का प्रमाण है: पंथ-वर्षों के बीच, परमेश्वर ने उसे जीवित रखा है, ताकि वह अपने उत्तराधिकार की जिम्मेदारी पूरी कर सके। इस्राएल के नेताओं के लिए यह एक स्मृति-चिन्ह है कि परमेश्वर अपने वादे के अनुरूप समय पर सहायता देता है और बुजुर्गों की भूमिका को सम्मानित ढंग से स्मरण रखता है।
मुख्य आध्यात्मिक शिक्षा
1) विश्वास के साथ उम्र और अनुभव के मानार्थ। पैंतालीस वर्ष जंगल में रहने के बावजूद, यहोशू का यहोवा पर अटूट विश्वास बना रहा; 85 वर्ष की उम्र में भी वह ईश्वरीय योजनाओं के अनुसार आगे बढ़ रहा है।
2) परमेश्वर का निरंतर संरक्षण. यहोवा ने उनके जीवन को बनाए रखा—यह दर्शाता है कि ईश्वर अपने बच्चों को मार्गदर्शित करते हुए उनकी निर्बलताओं पर भी निर्भर रहते हैं।
3) उत्तराधिकार और दायित्वों की स्वीकृति. उम्र कोई बाध्य नहीं; सही समय पर वे अपने विभाग-कर्तव्य को निभाने के लिए तैयार रहते हैं, जो कि धार्मिक और सामाजिक जिम्मेदारियों के प्रति तन्मयता दिखाता है।
अनुकूलन संदर्भ — तुलनात्मक बाइबिल संदर्भ
– इस प्रकार के पाठ में लेखक आस्था और सेवा के लिए दीर्घकालिक धैर्य की बात करते हैं; उदाहरण के लिए जन्म-पूर्व समय से लेकर पूर्णता तक परमेश्वर के वचन का पालन करने की निरंतरता को देखते हैं।
– अन्य金币गी उदाहरण: पुराने नियम के चरित्रों में लंबे समय तक दैवीय उद्देश्यों के लिए जीने की तस्वीरें मिलती हैं, जो हमें कर्म-भूमिका में स्थिरता सिखाती हैं।
जीवन-उपयोगी व्यावहारिक अनुप्रयोग
पवित्रग्रंथों से 2-3 cross-references और संक्षिप्त स्पष्टीकरण
1) इब्रarians 11:11 — विश्वास के कारण वेंच्य को जन्म देना संभव हुआ; पुराने और नए नियम के बीच विश्वास की धारा दिखती है।
2) रोमियों 4:18-21 — अब्राहम की तरह आशा के विरुद्ध भी विश्वास; उम्र के बावजूद ईश्वर के वायदा पर टिके रहने का प्रमाण।
3) पतरस 3:9 — परमेश्वर की मांग है कि वह संन्यासियों को भी उम्र के बावजूद दायित्व देकर प्रेरित करे; धैर्य और निष्ठा के साथ सेवा जारी रहे।
संक्षेप निष्कर्ष
यहोशू 14:10 हमें याद दिलाता है कि परमेश्वर अपने बच्चों को समयानुसार संरक्षण और सक्षम बनाकर आगे बढ़ने के लिए बुलाता है। उम्र चाहे जितनी भी हो, विश्वास, समर्पण और दायित्व की तैयारी में समानता बनी रहती है। यहोवा के सत्य वादे के साथ चलना जीवन के हर चरण में लाभ देता है, और हमारे लिए यह प्रेरणा है कि हमारी दीर्घकालिक श्रद्धा और सेवा पूरे जन्म के उत्तराधिकारी बनकर एक समृद्ध मिसाल स्थापित करें।
नोट: नीचे कुछ उद्धरण पंक्तियाँ Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke से यदि उपलब्ध हों, वे संक्षेप में संकेत के रूप में दिए गए हैं:
— Matthew Henry का संक्षिप्त सार: ज्ञान-आधारित धैर्य और उम्र के साथ ईश्वर की वचन-पालन की महत्ता।
— Albert Barnes से: परमेश्वर का संरक्षण पुरानी आयु में भी सक्रिय रहता है, क्योंकि वह वाचा-खातिर है।
— Adam Clarke का संदेश: विश्वास में बने रहने की प्रेरणा और उत्तराधिकार-कर्तव्य की तैयारी जो हर उम्र में आवश्यक है।