Old Testament
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यहोशू 17:12 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
परन्तु मनश्शेई उन नगरों के निवासियों को उनमें से नहीं निकाल सके; इसलिए कनानी उस देश में बसे रहे।
यहोशू 17:12 पद-दर-पद बाइबल टीका
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यहोशू 17:12 समानांतर पद और संबंधित वचन
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निर्गमन 23:29 (HINIRV) »
मैं उनको तेरे आगे से एक ही वर्ष में तो न निकाल दूँगा, ऐसा न हो कि देश उजाड़ हो जाए, और जंगली पशु बढ़कर तुझे दुःख देने लगें।

न्यायियों 1:27 (HINIRV) »
मनश्शे ने अपने-अपने गाँवों समेत बेतशान, तानाक, दोर, यिबलाम, और मगिद्दो के निवासियों को न निकाला; इस प्रकार कनानी उस देश में बसे ही रहे।

गिनती 33:52 (HINIRV) »
तब उस देश के निवासियों को उनके देश से निकाल देना; और उनके सब नक्काशीदार पत्थरों को और ढली हुई मूर्तियों को नाश करना, और उनके सब पूजा के ऊँचे स्थानों को ढा देना।
यहोशू 17:12 पर एक नज़र: शहरों में कानानी बसे रहे
यह पद यह बताता है कि मन्श्सेई पुत्र जोशू के समय कनानी आबादी ने इस क्षेत्र से पूरी तरह बाहर नहीं डाला था। इसका अर्थ न सिर्फ इतिहास-ज्ञान है, बल्कि आज के विश्वासयोग्य पाठक के लिए भी भीतर के संघर्ष और आशीर्वाद के बीच संतुलन को समझाने वाला है: परमेश्वर की स्थिर योजना के भीतर मानवीय नालियों, कमज़ोरियों और प्रस्फुटित विश्वास की परिणतियाँ कैसे सामने आती हैं।
पुष्ट संदर्भ व मूल संदर्भ
यहोशू ने कनानी ऊँचे नगरों और शक्तिशाली क़बीलों के विरुद्ध समर कर समस्त देश पर अधिकार जमाने के प्रयास में कई क्षेत्रों में विजय पाई, परन्तु मनश्शे क्षेत्र के कुछ नगरों के निवासियों को वे नहीं मार सके या उन्हें निकाले नहीं पाए थे। यहाँ यह दिखाता है कि हर आशीष और हर विजय के साथ मनुष्य की कमजोरियाँ और नीति-निर्माण के भेद खुलते हैं। यह हमारे लिए यह संकेत है कि क्षेत्रीय समृद्धि और आस्था के बीच संतुलन आवश्यक है, अन्यथा सामाजिक-सांस्कृतिक प्रभावों से आस्था दूषित हो सकती है।
मुख्य संदेश
इस verse में दो परस्पर विरोधी धारा दिखी: एक ओर ईश्वरीय आशीष से दशाओं के बीच विजय का इतिहास, और दूसरी ओर मानव-निर्मित सीमाओं के कारण कानानी निवासियों की मौजूदगी। यह स्पष्ट करता है कि प्रत्यक्ष विजय मिलना भी आंतरिक अनुशासन और धर्मशील जीवन की गारंटी नहीं बन जाती; समय-समय पर विश्वासी को सामाजिक रीति-रिवाजों, भूतिक-उत्साह और भय से जूझना पड़ता है।
उपयुक्त थीम और संकेत
cross-reference प्रमुख बिंदु
इन चरणों के साथ नीचे दिए गए संदर्भों से तत्त्वगत मेल मिलता है:
इन क्रॉस-रेफरेंसेज़ से यह स्पष्ट होता है कि एक दायरे की विजय केवल बाहरी अधिकार नहीं बल्कि आंतरिक अनुशासन और आध्यात्मिक सतर्कता पर निर्भर है।
ऐतिहासिक-आध्यात्मिक अनुवाद में गूढ़ विचार
परन्तु मनश्शेई उन नगरों के निवासियों को उनमें से नहीं निकाल सके; इसलिए कनानी उस देश में बसे रहे—यह पंक्ति दिखाती है कि ईश्वर की विस्तृत योजना के भीतर यह असफलता एक अवसर बन सकती है। परमेश्वर के निर्देश और मानव-निर्णय के बीच की दूरी पाठक को प्रेरित करती है कि वे आस्तिक जीवन में संवेदना, नैतिकता और साहस बनाए रखें, विशेषकर जब बाहरी दबाव और आंतरिक संकीर्णताएँ मिलती हैं।
अनुवादक-उद्धरण नोट
यह टिप्पणी ציבור-ग्रंथों के आधार पर संकलित है; यदि आप Matthew Henry, Albert Barnes या Adam Clarke के स्पष्ट उद्धरण ढूंढते हैं, तो उनका छोटा-सा स्वरूप नीचे दिखेगा। इस पन्ने में उन विद्वानों के पूर्ण उद्धरणों का प्रयोजन नहीं है, केवल विचार-समर्थन के रूप में संदर्भ दिया गया है।
दयात्मक चिंतन
निर्णय की कुंजी यह है कि हम अपने सांसारिक अधिकरणों में भी परमेश्वर के निर्देशों के साथ चलें। सफलता में न केवल बाहरी विजय, बल्कि आंतरिक ईमानदारी और सामाजिक नैतिकता की टिकाऊ संरचना चाहिए। आज के विश्वासी भी अपने जीवन में यही संतुलन बना कर रखें—जहाँ मंदिर पृथ्वी पर भी, हमारे व्यवहार में भी समान पवित्रता बनी रहे।