Old Testament
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यहोशू 17:13 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
तो भी जब इस्राएली सामर्थी हो गए, तब कनानियों से बेगारी तो कराने लगे, परन्तु उनको पूरी रीति से निकाल बाहर न किया।।
यहोशू 17:13 पद-दर-पद बाइबल टीका
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यहोशू 17:13 समानांतर पद और संबंधित वचन
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यहोशू 16:10 (HINIRV) »
परन्तु जो कनानी गेजेर में बसे थे उनको एप्रैमियों ने वहाँ से नहीं निकाला; इसलिए वे कनानी उनके बीच आज के दिन तक बसे हैं, और बेगारी में दास के समान काम करते हैं।

व्यवस्थाविवरण 20:11 (HINIRV) »
और यदि वह संधि करना स्वीकार करे और तेरे लिये अपने फाटक खोल दे, तब जितने उसमें हों वे सब तेरे अधीन होकर तेरे लिये बेगार करनेवाले ठहरें।

यहोशू 17:13 का प्रवेग और पाठ का संकेत
पसल 17:13 में लिखा गया है कि इस्राएलियों के सामर्थ्य बढ़ने पर कनानियों को बेगार कराने लगे, परन्तु उन्होंने पूरी रीति से कनानियों को राष्ट्र से बाहर निकाल नहीं दिया। यह पाठ यह स्पष्ट करता है कि परमेश्वर की देहली पर विश्वास और वाचा के दायरे में रहने के बावजूद मानवीय कमजोरी और निष्क्रियता कैसे आ सकती है, जब बहुधा वीरता और धारणा में वृद्धि होती है, पर बंधनशक्ति से पीछे रहते हैं।
ईश्वर के साथ विश्वास और स्पष्टता
यह दिखाता है कि जब तक सामान्य पुरुषों और स्त्रियों में परमेश्वर का डर और विश्वास गरम रहता है, तब तक वे अपने व्चन और विरासत की रक्षा के लिए सक्षम रहते हैं। परन्तु जैसे-जैसे समाज शक्तिशाली होता है, वे अपने विरोधियों के साथ समझौते की चपल चाल चलते हैं और परमेश्वर की पूर्ण व्यवस्था के अनुरूप न चले पाते हैं। यह दर्शाता है कि पवित्र आशीर्वाद निर्भर है obedience पर—ऐसा नहीं कि शक्ति स्वयं ही वह प्रदान करती है; शक्ति एक दायित्व है जिसे परमेश्वर की आज्ञाओं के अनुसार प्रयोग करना होता है।
शब्दार्थ और छवि-संकेत
“बेगारी कराना” से आशय है शत्रुओं के दमन से मुक्त न कर पाना और समाज-व्यवस्था को बाधित करना। “पूरी रीति से निकल बाहर” का भाव बताता है कि परमादेश के अनुसार निवास-क्षेत्रों को पूर्णता से हटाकर पवित्र भूमि बनना चाहिए था, न कि आंशिक तौर पर स्थिति बदलना। यह शब्द Yahweh के आज्ञाकारी रहने और उसकी सार्वजनिक व्यवस्था की पूर्ण पालना के महत्व पर प्रकाश डालते हैं।
संबंधित पासाज और उनके संदर्भ
इन संदर्भों से स्पष्ट होता है कि भूमि के भाग्य, विरासत, और परमेश्वर के आज्ञाकरण के बीच संतुलन बनाए रखना कितना जरूरी है; शक्ति-प्राप्ति के साथ भी पूर्ण obedience का निरंतर पालन मुख्य है।
आज के पाठ का अनुप्रयोग
हम अपने जीवन में भी देखते हैं कि समय-समय पर हम शक्ति और अवसर प्राप्त करते हैं, पर यदि हम परमेश्वर के निर्देशों को अपूर्ण या आंशिक रूप से मानते हैं, तो कठिनाईयां बढ़ती हैं। यह संदेश हमें याद दिलाता है कि संपूर्णता—अपने भय, असुरक्षा, और क्षमताओं के बावजूद—ईश्वर के निर्देशों के अनुसार चलना है। साथ ही यह भी कि सामाजिक या संस्थागत दबाव में कभी-कभी हमें स्पष्ट नैतिकता और प्रामाणिक आस्था के साथ खड़ा रहना होता है, न कि परिस्थिति के अनुरूप समझौता करना।
एतिहासिक-आस्थागत टिप्पणियाँ (प्रमुख टिप्पणीकारों से संक्षेप)
प्राचीन सार्वजनिक-डायन-टिप्पणियों के अनुसार, Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke ने इस प्रकार के पाठों को धर्म-नैतिकता के नजरिये से समझाया है कि परमेश्वर के प्रति पूर्ण अर्पण और उनके विधान के पालन में असफल रहने पर परिणामस्वरूप विरासत को वास्तविक सुरक्षा नहीं मिलती। Chapman/Clarke ने यह भी संकेत किया है कि यह कहानी यह बताती है कि शक्ति मिलना यह स्व-उद्धार नहीं है, बल्कि परमेश्वर के मार्गदर्शन के साथ संयुक्त आचरण आवश्यक है। अगर ये उद्धरण उपलब्ध हों, तो “यहोशू 1:6–9” आदि के मार्गदर्शन पर उनके स्पष्ट विचारों की ओर संकेत होते हैं।