नीतिवचन 21:25 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका

आलसी अपनी लालसा ही में मर जाता है, क्योंकि उसके हाथ काम करने से इन्कार करते हैं।

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नीतिवचन 21:25 पद-दर-पद बाइबल टीका

नीतिवचन 21:25— आलसी अपनी लालसा ही में मर जाता है

यह वाक्य ऐसे व्यक्ति पर चोट करता है जो इच्छा के पीछे भागते तो हैं, पर कर्म नहीं करते। आलस्य और अस्थिर इच्छा मनुष्य को आत्म-सम्पन्नता से दूर रखती है; परिणामस्वरूप उसकी लालसाएँ उसे ही घेर लेती हैं और अंततः वे ही उसकी मृत्यु का कारण बन जाती हैं। यह नीतिवचन न केवल नैतिक चेतावनी है, बल्कि व्यवहार के तौर-तरीकों के बारे में एक ठोस व्यावहारिक मार्गदर्शन है: इच्छा से कार्रवाई की ओर बढ़ें, अन्यथा निराशा और कमी ही जीवन का नियम बन जाएगी।

प्रसंग और मूल सन्देश

यह श्लोक व्यवस्था-प्रधान जीवनशैली के विरुद्ध एक स्पष्ट ध्वनि है: मन में उठती इच्छाओं के बावजूद कर्म में संसार की मांग के अनुसार दृढ़ता नहीं—तो परिणामस्वरूप इच्छा ही अपना शिकार हो जाती है। नीतिवचन में इस तरह के सन्निकट पाठ प्रायः आत्म-नियमन, परिश्रम और ईमानदार व्यवहार को महत्त्व देते हैं। यहाँ “आलसी” शब्द उन लोगों के लिए है जो किसी भी काम को करने से डरते हैं या टालते रहते हैं, जबकि “लालसा” उनकी निरंतर उकसावे को दर्शाती है जो उन्हें प्रगति से अलग रखती है।

मुख्य विचार

1) इच्छाओं के पीछे भागना वास्तव में आत्म-क्षमाप्रार्थक नहीं है; कर्म से दूरी जीवन को असफलताओं की ओर ले जाती है।

2) निरंतर आचरण में असफलता का कारण केवल बाहरी नहीं, भीतर की आलस्य और संकल्प की कमी होती है।

3) जीवन के सफल मार्ग के लिए स्पष्ट लक्ष्य, काम की योजना और दृढ़ता आवश्यक है।

संयुक्त थीम: कठोरता पैदा करने वाले सकारात्मक मार्ग

नीतिवचन की यह शिक्षण-रेखा परिश्रम, संयम और नियत समय पर कार्य के महत्त्व को उठाती है। यह केवल नैतिक सलाह नहीं, बल्कि विश्वासयोग्य जीवन जीने का आह्वान है—क्योंकि परमेश्वर के आदेश के अनुसार किया गया कर्म ही वास्तविक सफलता का आधार बनता है।

क्रॉस-रेफरेंसेज

  • नीतिवचन 6:9-11 — आलस्य की परिणति कभी-कभी अचानक कठिनाइयों के रूप में सामने आती है; कर्मशीलता ही संकट से बाहर निकलने का मार्ग है।
  • रोमियों 12:11 — जीवन को उन्नत करने के लिये श्रम और उत्साह के साथ सेवा करना चाहिए; आलस्य से प्रेरित निष्क्रियता निष्फलता को जन्म देती है।
  • याकूब 2:17 — विश्वास बिना कर्म के जीवित नहीं रहता; यहाँ भी कर्म और इच्छा के बीच संतुलन का संदेश है।

इन संदर्भों के साथ, यह श्लोक एक समरस जीवन की ओर संकेत करता है जहाँ उद्देश्य स्पष्ट हो, और प्रयास नियत रीति से चलें।

व्यावहारिक अनुप्रयोग

  • अपने लक्ष्य निर्धारित करें और प्रतिदिन छोटे-छोटे कदम उठाएँ।
  • अपनी योजना के साथ आत्म-नियमन बनाये रखें—एक अवकाश-युक्त दिनचर्या से भी लाभ होता है।
  • यदि आप अतृप्त उम्मीदों से जूझ रहे हों, तो यह याद रखें कि सक्रियता ही असफलता के antidote है।

समापन विचार

हम सभी कभी-कभी आलस्य के शिकार हो जाते हैं, पर यह शास्त्र याद दिलाता है कि लालसा तब तक प्रभावी नहीं जब तक वह कर्म का रूप नहीं लेती। ईश्वर की सहायता से हमने जो भी किया है, वह हमारे चरित्र का निर्माण करता है। एक विवेकपूर्ण जीव उसी तरह जीता है जो इच्छा को कर्म में ढाल लेता है।

अर्थप्रद उद्धरण (पुष्ट विचार)

Adam Clarke और Matthew Henry के सार्वजनिक-domain टिप्पणियों में उद्धृत रूपरेखाओं के अनुसार: कर्म और विवेक पर बल देना ही सफलता के मार्ग का सार है; आलस्य अंततः परस्पर कमजोरियों को जन्म देता है।

*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।

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