Old Testament
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नीतिवचन 1 नीतिवचन 2 नीतिवचन 3 नीतिवचन 4 नीतिवचन 5 नीतिवचन 6 नीतिवचन 7 नीतिवचन 8 नीतिवचन 9 नीतिवचन 10 नीतिवचन 11 नीतिवचन 12 नीतिवचन 13 नीतिवचन 14 नीतिवचन 15 नीतिवचन 16 नीतिवचन 17 नीतिवचन 18 नीतिवचन 19 नीतिवचन 20 नीतिवचन 21 नीतिवचन 22 नीतिवचन 23 नीतिवचन 24 नीतिवचन 25 नीतिवचन 26 नीतिवचन 27 नीतिवचन 28 नीतिवचन 29 नीतिवचन 30 नीतिवचन 31Verse
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नीतिवचन 21:30 का सीधे अर्थ
यह वचन कहता है कि यहोवा के विरुद्ध कोई भी बुद्धि, कोई समझ, या युक्ति नहीं चलती। यथार्थ में यह सर्तक करता है कि मानव की किसी भी योजना या चालाकी का अंतिम निर्णायक स्रोत परमेश्वर ही है; उसकी योजना के विरुद्ध मानव की बुद्धि टिक नहीं पाती।
पृष्ठभूमि और संदर्भ
नीतिवचन समूह के कहने का मूल उद्देश्य यह है कि जीवन के हर मुद्दे में ईश्वर के मार्ग का चयन सर्वोपरि है। यहाँ कहा गया है कि भले ही मनुष्य कितनी भी चतुराई दिखाए, यहोवा के विरुद्ध कुछ भी स्थिर नहीं रहता। यह सीधे यह दर्शाता है कियथा-व्यवस्था, नीति, और योजनाओं की अंतिम मान्यता परमेश्वर के अधिकार के भीतर है।
व्याख्यात्मक टिप्पणियाँ
मुद्दे के 2-3 प्रमुख विचार
अनुछेदित क्रॉस-रेफरेंसेस
1) नीतिवचन 16:1 - मनुष्य की योजनाओं का नियंत्रण ईश्वर के हाथ में है; परन्तु अंततः उत्तर उनके होंठों की बात परमेश्वर देता है।
2) यशायाह 55:8-9 - परमेश्वर की मार्गदर्शक धारा मनुष्यों की समझ से परे है; उसकी योजनाएं ऊँचाइयों तक पहुँचती हैं।
3) वेदवाक्यों 3:5-6 - हर काम में प्रभु पर भरोसा करें और अपने समझ पर नहीं; वह आपके मार्गों को सीधे करेगा।
संक्षेपित निष्कर्ष व व्यावहारिकtakeaway
जीवन की प्रत्येक योजना में ईश्वर की अधीनता रखना ही बुद्धिमानी है। अपनी समझ पर अड़ना न केवल व्यावहारिक रूप से कठिन है बल्कि आध्यात्मिक निर्भरता को भी घटाता है। प्रभु की योजना के अनुरूप चलना सार्थक सफलता की कुंजी है।
मैथ्यू हेनरी, एल्बर्ट बार्न्स, एडम क्लार्क से संक्षेप उद्धरण
मैथ्यू हेनरी की समानुभूति के अनुसार, “यह सिद्धान्त मानवीय योजना के सामने परमेश्वर की सर्वोच्चता को दर्शाता है।” यदि उद्धरण उपलब्ध हो तो ठीक, अन्यथा सारगर्भित व्याख्या ही उपयोग करें।
एल्बर्ट बार्न्स और एडम क्लार्क के समकालीन संदेशों के अनुरूप इस पाठ में यह विचार स्पष्ट होता है कि यहोवा के विरुद्ध कुटिल योजनाएं असफल होती हैं, और सचेत भक्त BY faith परमेश्वर के रास्ते चुनते हैं।
निष्कर्ष रूप में, यह वचन एक चेतावनी और एक विश्वासपूर्ण निर्देश है: मानव बुद्धि कितनी भी कुशल हो, परमेश्वर की sober योजना के सामने उसका भाग छोटा है; इसलिए जीवन के निर्णयों में उसे ही प्रमुख मानना चाहिए।