Old Testament
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1 पतरस 3:12 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
क्योंकि प्रभु की आँखें धर्मियों पर लगी रहती हैं, और उसके कान उसकी विनती की ओर लगे रहते हैं*, परन्तु प्रभु बुराई करनेवालों के विमुख रहता है।” (भज. 34:15-16, यूह. 9:31, नीति. 15:29)
1 पतरस 3:12 पद-दर-पद बाइबल टीका
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1 पतरस 3:12 समानांतर पद और संबंधित वचन
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भजन संहिता 34:15 (HINIRV) »
यहोवा की आँखें धर्मियों पर लगी रहती हैं, और उसके कान भी उनकी दुहाई की ओर लगे रहते हैं। (यूह. 9:31)

यूहन्ना 9:31 (HINIRV) »
हम जानते हैं कि परमेश्वर पापियों की नहीं सुनता परन्तु यदि कोई परमेश्वर का भक्त हो, और उसकी इच्छा पर चलता है, तो वह उसकी सुनता है। (नीति. 15:29)

नीतिवचन 15:29 (HINIRV) »
यहोवा दुष्टों से दूर रहता है, परन्तु धर्मियों की प्रार्थना सुनता है। (यूह. 9:31)
अर्थ का सीधा सार
1 पतरस 3:12 कहता है कि प्रभु धर्मी कर्मों पर कृपा दृष्टि रखते हैं और उनकी विनती सुनाई देती है; परन्तु जो बुराई करते हैं वे उनकी नजर से विमुख रहते हैं। यह संदेश विश्वासियों को यह बताता है कि सत्यनिष्ठ जीवन में ईश्वर की सक्रिय सहभागिता है—कृत्यों का सम्मान और दोषीपन का परिणाम दोनों के प्रति उनका दृष्टिकोण स्पष्ट है।
पृष्ठभूमि और संदर्भ
यह पद 1 पतरस के उस भाग का हिस्सा है जहां लेखक पति-पत्नी के रिश्ते, बंधुत्व, और सामाजिक व्यवहार के लिए निर्देश देता है। पाठक को स्मरण रहे कि यह एक ईश्वर-आधारित आस्थागत जीवन के लिए है जिसमें व्यवहार की ईमानदारी और विनम्रता प्रमुख गुण हैं। भजं 34:15–16, यूहन्ना 9:31, नीति 15:29 जैसी पुरानी साक्ष्यों को उद्धृत किया गया है ताकि यह सिद्ध हो कि ईश्वर धर्मियों की ओर देखते हैं और बुराई करनेवालों से दूरी बनाते हैं।
व्याख्यात्मक बिंदु
रूपरेखा—संदेश के मुख्य आयाम
अनुवादक संदर्भ—सम्बन्धित आयत
• भज 34:15-16: ईश्वर बुराई से देखने और सुनने की दृष्टि में रहते हैं, जो पुण्य-जीवन की रक्षा करता है। • यूह 9:31: सत्य में रहने वाले ईश्वर के पास प्रार्थनाओं का सृजन होता है। • नीति 15:29: धर्मी की विनती प्रिय है, क्योंकि यह पवित्रता के साथ ईश्वर के सामने आती है।
इन संदर्भों से यह स्पष्ट होता है कि ईश्वर धर्मी से संबंध बनाए रखते हैं और उनकी विनतियाँ प्रभावशाली बनती हैं, जबकि अधर्मी अवस्था को ईश्वर की प्रतिक्रिया मिलती है।
संक्षेपित क्रियात्मक Takeaway
एकीकृत टिप्पणी—समाज में व्यवहारिक अनुप्रयोग
हे प्रभु के ये वचन हमें याद दिलाते हैं कि धार्मिक आचरण केवल दिखावे के लिए नहीं होते, बल्कि यह ईश्वर के निरपेक्ष न्याय और प्रेम के अनुसार जीवन जीने का आह्वान है। प्रेरितों के पथ पर चलते हुए, हमारे घटी-घटने में भी ईश्वर की निगाह और उत्तर की संभावना बनी रहती है, बशर्ते हम अपने कृत्यों में सत्य और विनम्रता को बनाए रखें।
नोट: नीचे के उद्धरण केवल सार संकल्पना के लिए हैं; पूर्ण पद का पाठ यहाँ नहीं दिया गया है, ताकि पाठक गहराई से मूलार्थ समझ सकें।