Old Testament
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यशायाह 1 यशायाह 2 यशायाह 3 यशायाह 4 यशायाह 5 यशायाह 6 यशायाह 7 यशायाह 8 यशायाह 9 यशायाह 10 यशायाह 11 यशायाह 12 यशायाह 13 यशायाह 14 यशायाह 15 यशायाह 16 यशायाह 17 यशायाह 18 यशायाह 19 यशायाह 20 यशायाह 21 यशायाह 22 यशायाह 23 यशायाह 24 यशायाह 25 यशायाह 26 यशायाह 27 यशायाह 28 यशायाह 29 यशायाह 30 यशायाह 31 यशायाह 32 यशायाह 33 यशायाह 34 यशायाह 35 यशायाह 36 यशायाह 37 यशायाह 38 यशायाह 39 यशायाह 40 यशायाह 41 यशायाह 42 यशायाह 43 यशायाह 44 यशायाह 45 यशायाह 46 यशायाह 47 यशायाह 48 यशायाह 49 यशायाह 50 यशायाह 51 यशायाह 52 यशायाह 53 यशायाह 54 यशायाह 55 यशायाह 56 यशायाह 57 यशायाह 58 यशायाह 59 यशायाह 60 यशायाह 61 यशायाह 62 यशायाह 63 यशायाह 64 यशायाह 65 यशायाह 66



यशायाह 13:3 पर टिप्पणी (HINIRV उद्धरण के साथ)
संरचना के रूप में यह पाठ हम पर यह संकेत देता है कि परमेश्वर अपने निर्णयों को szeret नहीं करता, बल्कि उसे पूरी आवश्यकता के साथ क्रोध और न्याय को पूरा करने के लिए एक नियत समय पर प्रेरित करता है। उद्धार के संदर्भ में यह शलोक बिदाई का अग्रदर्शक है—बाधाओं को दूर कर नया दृश्य और शासन स्थापित करने के लिए परमेश्वर अपने पवित्र चयनित लोगों (वरियों) को बुलाते हैं और वे अपने प्रामाणिक उत्साह, प्रभु की प्रधानता और प्रताप के कारण प्रसन्न रहते हैं।
पाठ का परिचय—पार्श्वभूमि और संदर्भ
यशायाह पुस्तक का भाग विशालकाय प्रलय और न्याय के संदेशों को समेटे है। चतुर्थ-युग के बाद के संदर्भ में यह दासत्व की चेतावनी, दया और उद्धार के संकेत प्रस्तुत करता है। अध्याय 13 विशेष रूप से बाबुल के विनाश और उसकी शक्तियों के अंत की भविष्यवाणी का भाग है। यह घोषणा करती है कि प्रभु अपने न्याय के हाथ को उठाते हैं और वे अपने चुने हुए सैनिकों को आपदा के समय बुलाते हैं, ताकि सत्य, न्याय और सत्ता पुनः स्थापित हो सके।
शब्दार्थ और वाक्य-आकार
“我én मैंने स्वयं अपने पवित्र किए हुओं को आज्ञा दी है” का तात्पर्य है—परमेश्वर ने अपने पवित्र और विशिष्ट लोगों को आदेशित किया है कि वे उचित समय पर प्रतिक्रियाशील क्रोध को पूरा करें। “अपने वीरों को बुलाया है जो मेरे प्रताप के कारण प्रसन्न हैं” से स्पष्ट होता है कि वे शक्तिशाली और परमात्मा-धर्मी सेनानी हैं, जो प्रभु के आदर, शक्ति और विजय में आनंदित रहते हैं।
मुख्य आध्यात्मिक पाठ
पवित्र-संबंधित उद्धरणों के साथ तुलना
यह श्लोक यशायाह के न्याय-प्रकटन के साथ संतुलित है, जहाँ परमेश्वर अपना निर्णय स्पष्ट रूप से बताता है। अन्य भागों में भी ऐसा विचार मिलता है कि “प्रभु का क्रोध तब आता है जब अन्याय स्थिर होता है, परन्तु वह अपनी पवित्रताओं के अनुसार मदद भी भेजते हैं।”
क्रिस्टियन अनुप्रयोग
- विश्वासियों के लिए संदेश यह है कि परमेश्वर की योजनाओं में भागीदारी निर्बाध है; सत्ता और धैर्य के साथ वे स्वयं को उसकी सेवकाई में समर्पित करें।
- कठिन समय में भी पवित्र चुनावों को मानना और उनकी शक्ति पर भरोसा रखना चाहिए, क्योंकि प्रभु अपने वीरों को बुलाते हैं जो प्रताप के कारण प्रसन्न रहते हैं।
क्रॉस-रेफरेंस और संबंध
1) निवास-क्षेत्र में कूट-योजना: न्याय के समय परमेश्वर अपने चयनित लोगों को बुलाते हैं—यशायाह 40:10 के अनुरूप यह कहा जा सकता है कि प्रभु विजय के साथ आता है।
2) दयालुता बनाम क्रोध: रोम 11:22 जैसी शिक्षाओं से जुड़ाव मिलता है कि ईश्वर की करुणा और न्याय क्रमशः चलते हैं।
3) उद्धार के लिए तैयार रहने की चेतावनी: प्रकाशित-वाणी के विजयों के साथ विश्वासियों का साहस बढ़ता है कि परमेश्वर अभी भी युद्ध-स्थिति में खड़ा है।
संक्षेप विवरण
यह श्लोक उन तथ्य Transmission: परमेश्वर ने अपने पवित्र लोगों को न्यायोचित समय पर बुलाया है, ताकि वे अपने प्रताप के कारण प्रसन्न होकर क्रोधी और विजयी रूप से कदम बढ़ाएं। यह संदेश आज भी हमें यह सिखाता है कि प्रभु की योजनाओं में विश्वास और उनकी पवित्र selectivity में उत्साह रखना चाहिए।
नोट: प्रस्तुत व्याख्या में Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के सार्वजनिक-डायमोंट उद्धरणों से आवश्यक छोटे अंश स्पष्टीकरण हेतु सम्मिलित किए गए हैं; वास्तविक पाठ उद्धरण नीचे दिये गए हैं:
“The lord of hosts is risen up” — Matthew Henry (छोटे-चयन उद्धरण)
“God is a righteous judge, and a God that is angry with the wicked every day” — Albert Barnes (छोटे-चयन उद्धरण)
“The day of vengeance is in the heart of the Lord, and the mighty men are called forth” — Adam Clarke (छोटे-चयन उद्धरण)