Old Testament
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यशायाह 1 यशायाह 2 यशायाह 3 यशायाह 4 यशायाह 5 यशायाह 6 यशायाह 7 यशायाह 8 यशायाह 9 यशायाह 10 यशायाह 11 यशायाह 12 यशायाह 13 यशायाह 14 यशायाह 15 यशायाह 16 यशायाह 17 यशायाह 18 यशायाह 19 यशायाह 20 यशायाह 21 यशायाह 22 यशायाह 23 यशायाह 24 यशायाह 25 यशायाह 26 यशायाह 27 यशायाह 28 यशायाह 29 यशायाह 30 यशायाह 31 यशायाह 32 यशायाह 33 यशायाह 34 यशायाह 35 यशायाह 36 यशायाह 37 यशायाह 38 यशायाह 39 यशायाह 40 यशायाह 41 यशायाह 42 यशायाह 43 यशायाह 44 यशायाह 45 यशायाह 46 यशायाह 47 यशायाह 48 यशायाह 49 यशायाह 50 यशायाह 51 यशायाह 52 यशायाह 53 यशायाह 54 यशायाह 55 यशायाह 56 यशायाह 57 यशायाह 58 यशायाह 59 यशायाह 60 यशायाह 61 यशायाह 62 यशायाह 63 यशायाह 64 यशायाह 65 यशायाह 66



यशायाह 38:22 — संदर्भ के साथ टिप्पणी
इस अध्याय में यशायाह को हज़किय्याह के स्वास्थ्य और अनुभवों के बारे में चिंता है। यशायाह ने राजा से पूछा कि वह क्यों चिंतन कर रहा है और क्यों उसकी बीमारी पर भगवान की कृपा और प्रतीक्षा की आशा है। इस पंक्ति में हिजकिय्याह अपने बयान के साथ एक ठहराव बनाते हैं: वे यह पूछ रहे हैं कि उनसे यह चिन्ह क्यों माँगा जा रहा है ताकि वे समझ सकें कि Jehová के भवन को फिर जाने पायेंगे।
मुख्य अर्थ
यह वाक्य संकेत देता है कि राजा हिजकिय्याह अपनी बीमारी के दौरान परमेश्वर के मन से लेकर अपने भविष्य के बारे में स्पष्ट चिन्ह चाहते थे। चूँकि उन्हें विश्वास था कि परमेश्वर ही उनकी चंगाी और पुनः प्रवेश का कारण बनेंगे, वे यह जानना चाहते थे कि कब उनका घर-गृहस्थी, समाज और सेवा परमेश्वर के भवन के लिए खुल जाएगा। यह सवाल किसी भी बंधन से ऊपर है—आत्मिक स्थिति और विश्वास की पुष्टि पाने की चाहत है।
दो मुख्य विषय
शीर्षक विचार और संरचना
यहाँ तीन बिंदु हैं जिन्हें ध्यान में रखना चाहिए:
क्रॉस-रेफरेंस (संक्षेप में) और तात्पर्य
यशायाह 7:14 की तरह कुछ चिन्हों पर भी निर्भर रहने की प्रेरणा मिलती है, साथ ही मरकूस 12:33 जैसे वचन स्मरण कराते हैं कि परमेश्वर के अनुग्रह में विश्वास सबसे बड़ा संकेत है। यीशु के उपदेशों में आस्था और चिन्हों के बीच संतुलन की शिक्षा मिलती है—क्योंकि प्रभु अपने लोगों के विश्वास को दृढ़ करने के लिए चिह्न देता है, पर आस्था को चिन्हों पर नहीं टिकना चाहिए।
व्यावहारिक विचार
आप अपनी परिस्थिति में कहें: क्या मैं परमेश्वर के साथ सीधे विश्वास पर टिक रहा हूँ, या मैं संकेतों की परख में फँस गया हूँ? कठिन समय में ईश्वर की कृपा के लिए आशा रखना चाहिए, और जिम्मेदारी—भवन अर्थात समुदाय, प्रोत्साहन और लोग-प्रेम के साझा कार्य बनते हैं।
कुल सार
यशायाह 38:22 में हिजकिय्याह अपने प्रश्न के माध्यम से यह दिखाते हैं कि परमेश्वर के भवन में लौटना एक परम विशेषाधिकार है जिसे सत्य और विश्वास के साथ ग्रहण किया जाना चाहिए। यह वाक्य आस्था के परीक्षण और समुदाय की पुनःस्थापना के बीच संतुलन दर्शाता है: भगवान अपने लोगों के लिए चिह्न देते हैं, पर आस्था उनका मार्ग बनाती है।
पूर्व-प्रचलित विचार (संक्षिप्त उद्धरण)
अगर आवश्यक हो, पाठक Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के सार्वजनिक-डोमेन उद्धरणों के छोटे-छोटे स्पष्ट अंश से प्रेरणा पाते हैं।
संक्षेप
इस वाक्य के पीछे का संदेश यह है कि परमेश्वर की योजना पर विश्वास रखना चाहिए; चिन्हों से मार्गदर्शन मिल सकता है, पर आस्था और समुदाय के पुनःस्थापना के लिए संकल्प सर्वाधिक आवश्यक है।