यशायाह 64:9 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका

इसलिए हे यहोवा, अत्यन्त क्रोधित न हो, और अनन्तकाल तक हमारे अधर्म को स्मरण न रख। विचार करके देख, हम तेरी विनती करते हैं, हम सब तेरी प्रजा हैं।

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यशायाह 64:9 पद-दर-पद बाइबल टीका

यशायाह 64:9 पर Commentary (HINIRV)

सीधे शब्दों में इसका अर्थ है: हे यहोवा, कृपा करके अत्यंत क्रोध न कर और हमारे दोषों को दूर तक स्मरण न कर; तश्च, हमने तेरे समक्ष विनती की है—हम तेरी प्रजा हैं, कृपा कर और अपने प्रजा को दया दे। यह पढी जाने वाली दुआ यहूदी समुदाय की ज़िंदगी में गहरी आस्था, विवशता और परमेश्वर के प्रति निर्भरता का संकेत है।

पृष्ठभूमि और संदर्भ

यशायाह ग्रंथक में इस भाग को अनेक विश्लेषक दया और पाप के बीच की जटिल स्थिति के रूप में पढ़ते हैं। इस वचन में पाप के कारण उत्पन्न क्रोध से उद्धार की आशा है, और यह प्रार्थना है कि परमेश्वर अपनी महान करुणा दिखाए—जिन्होंने पहले दिए गए दाय के कारण, अब भी उनकी सीमा को पार न किया जाए। यहूदी समुदाय में यह आग्रह सामाजिक और धार्मिक पुनर्स्थापना की उत्कंठा को दर्शाता है, जब वे परकीय शासन और पाप के बोझ से जूझ रहे थे।

पाठ का अर्थ-व्याख्या

1) क्रोध की संदिग्धता कम करने की मांग: “अत्यन्त क्रोधित न हो” से यह संकेत मिलता है कि परमेश्वर के क्रोध के कारणों को समझना है, परन्तु भक्तजन उसकी करुणा के पात्र बने रहें।

2) अनन्तकाल तक स्मरण न रखना: यह बताता है कि उनके पापों के बोझ को एकदम भूला नहीं जाना चाहिए; बल्कि डर और पश्चात्ताप के साथ सुधार की प्रेरणा बनी रहे।

3) विनती और प्रजा की पहचान: “हम तेरी विनती करते हैं, हम सब तेरी प्रजा हैं” यह दो चीज़ें उभारती हैं—एक नितांत जरूरत और दूसरा एकता का अनुभव। मैं मुख्य बात यह समझता हूँ कि समुदाय अपने पाप-घटक को स्मरण कर दोषी होने के बजाय, दया-प्रधान उद्धार की आशा में इकठ्ठा हुआ है।

सूत्रात्मक अवलोकन (छोटा विश्लेषण)

  • प्रार्थना में करुणा प्रमुख भूमिका निभाती है—क्रोध के स्थान पर दया की मांग।
  • जातीय एकता—“हम सब तेरी प्रजा”—प्रतीक है कि सामूहिक पथ-भ्रष्टता के बीच भी परमेश्वर के साथ चलने की इच्छा जीवित है।
  • पश्चात्ताप और पुनर्स्थापना के बीच संतुलन: दोष स्वीकार करने के बावजूद उद्धारक जवाब पाने की उम्मीद।

प्रमुख cross-references (संक्षिप्त व्याख्या)

1) यशायाह 59:1-2: पाप की दूरी से परमेश्वर की पहुंच में अवरोध—परन्तु यदि दिल से पाप त्यागे जाएँ, तो उद्धार संभव है।

2) ऋुजुश 1:18: यदि भीतर से डर और पश्चात्ताप हो, तो परमेश्वर की सहायता मिलती है।

3) डैनिएल 9:18-19: समुदाय की दुआ और क्या दैविक स्थान पर बड़ी कृपा से क्षमा मिलती है—यह वही भावना है जो यहाँ प्रतिध्वनित होती है।

हिंदी में संक्षिप्त निर्देशित takeaway

एजेंट टिप्पणी (संरचित, संदिग्ध उद्धरणों के साथ)

मॅथ्यू हेन्री से: “आत्म-आत्मा का भय और पाप के लिए पश्चात्ताप परमेश्वर के करीब आने का सुराग हैं।”

एल्बर्ट ब्रेन्स से: “ऐसे समय में भी जब कठिनाई अधिक हो, परमेश्वर की करुणा बनती है एक सुरक्षित ठिकाना।”

एडम क्लार्क से: “यह प्रार्थना यह तय करती है कि परमेश्वर के साथ हमारा रिश्ता कितना मजबूत है—हमारे पाप चाहे कितने भी बड़े क्यों न हों, उसकी दयालुता से उद्धार संभव है।”

नोट

यदि आप चाहें, तो मैं इन उद्धरणों के वास्तविक वाक्यों के करीब के अंशों के साथ और अधिक गहराई से अर्थ-विकास भी दे सकता/सकती हूँ।

*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।

यशायाह 64:9 समानांतर पद और संबंधित वचन

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