Old Testament
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यशायाह 1 यशायाह 2 यशायाह 3 यशायाह 4 यशायाह 5 यशायाह 6 यशायाह 7 यशायाह 8 यशायाह 9 यशायाह 10 यशायाह 11 यशायाह 12 यशायाह 13 यशायाह 14 यशायाह 15 यशायाह 16 यशायाह 17 यशायाह 18 यशायाह 19 यशायाह 20 यशायाह 21 यशायाह 22 यशायाह 23 यशायाह 24 यशायाह 25 यशायाह 26 यशायाह 27 यशायाह 28 यशायाह 29 यशायाह 30 यशायाह 31 यशायाह 32 यशायाह 33 यशायाह 34 यशायाह 35 यशायाह 36 यशायाह 37 यशायाह 38 यशायाह 39 यशायाह 40 यशायाह 41 यशायाह 42 यशायाह 43 यशायाह 44 यशायाह 45 यशायाह 46 यशायाह 47 यशायाह 48 यशायाह 49 यशायाह 50 यशायाह 51 यशायाह 52 यशायाह 53 यशायाह 54 यशायाह 55 यशायाह 56 यशायाह 57 यशायाह 58 यशायाह 59 यशायाह 60 यशायाह 61 यशायाह 62 यशायाह 63 यशायाह 64 यशायाह 65 यशायाह 66



यशायाह 64:6 पर टिप्पणी
यशायाह के इस उद्धारक पाठ में प्रभु के सामने मानवता की निर्भरता और उसकी पापी स्थिति स्पष्ट रूप से उभरकर आती है। संदर्भ यह है कि इस्राएल के लोग और सभी जातियाँ यहाँ परमेश्वर के न्याय के बीच अपनी निर्भर स्थिति मानते हुए अपने भीतर की अशुद्धता को स्वीकार करती हैं। यह अध्याय पाप के कारण निरन्तर अपमान और बिखराव के बीच ईश्वर की करुणा के लिए आशा दिखाता है, परन्तु मानवता की नैतिक असफलता को स्पष्ट रूप से रेखांकित भी करता है।
मुख्य संदेश
यह verse बताता है कि मानवस्वभाव पूरी तरह अशुद्ध है और हमारे “धर्म” के कर्म भी असली 신실ता से नहीं, बल्कि स्वार्थ और पाप के चिथड़ों से बनते हैं। उद्धारकर्ता के समक्ष हमारी स्थिति इतनी विक्षयपूर्ण है कि हमें आंतरिक परिवर्तन की आवश्यकता है। यह न केवल पाप के परिणामों की व्यथा है, बल्कि परमेश्वर की पवित्रता के सामने हमारी असत्य और निर्बलता की स्वीकृति भी है।
केंद्रीय विषय
Related passages (संकेत-अनुरोध)
1) रोम 3:23— हर किसी ने पाप किया है और परमेश्वर की महिमा से विमुख रह गया है; यह विचार यशायाह के संदेश के अनुरूप कि हम स्वार्थपूर्ण और दोषपूर्ण हैं।
2) इब्रानी 7:26‑27— परमेश्वर का पूर्ण पवित्रता-युक्त उद्धारकर्ता, जो हमारे लिये पूरक और समर्पित है; यह बताता है कि भरोसे के साथ हम ऊपर उठते हैं।
3) जोएल 2:13— प्रभु को ताड़ना नहीं, बल्कि दिल से रबरना; भगवान के लिए सच्ची पश्चात्ताप की आवश्यकता पर प्रकाश डालता है।
शील reflection (व्यावहारिक प्रभाव)
यह पाठ हमें यह सिखाता है कि हमारा आत्म-धर्म या आत्म-उत्साह एक वास्तविक परिवर्तन की जगह नहीं है। हमें अपनी निरर्थकता को स्वीकार कर, प्रभु से पुनर्जीवन, पवित्रता और दया के लिए विनम्र प्राथना करनी चाहिए। धार्मिक आयोजन या कर्म का ढाँचा भी यदि दिल से परिवर्तन नहीं लाता, तो वह चिथड़ों के समान है। इसलिए जीवन में नियमित आत्म-विकास, प्रार्थना और नीच-स्वर से परमेश्वर के साथ एक सचेत संबंध बनाए रखना आवश्यक है।
सार-सारांश
यशायाह 64:6 यह साक्ष्य देता है कि मानवता अपने स्वभाविक अशुद्धता में है और हमारे धर्म के कर्म भी शुद्ध नहीं हैं। परन्तु यह भी स्पष्ट करता है कि ईश्वर की राह में एक खुला अवसर है—स्वीकृति, पश्चात्ताप और परमेश्वर की करुणा के साथ उद्धार। इस संदेश में उन्नत होने वाले विश्वासियों के लिए आशीर्वाद है कि वे दयालु परमेश्वर के निकट स्थिर रहें और उसकी पवित्रता से ढलें।
Cross-references (संक्षिप्त टिप्पणी)
• रोम 3:23— सभी पापी हैं; यह verse यशायाह के बहाने एक सार्वभौमिक स्थिति की पुष्टि करता है।
• इब्र 7:26‑27— हमारे उद्धारकर्ता की पूर्ण पवित्रता और समर्थता; यह पाठ इस परिवर्तन की आशा को दृढ़ करता है।
• जोएल 2:13— दिल से पश्चात्ताप के महत्व को उजागर करता है।
उद्धरणों के लिए नोट: Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के संकलन से यदि कोई सटीक वाक्यांश उद्धृत हुआ हो, तो उसने इस पंक्ति में स्पष्ट संकेत के रूप में उल्लेखित किया गया है।