Old Testament
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यिर्मयाह 1 यिर्मयाह 2 यिर्मयाह 3 यिर्मयाह 4 यिर्मयाह 5 यिर्मयाह 6 यिर्मयाह 7 यिर्मयाह 8 यिर्मयाह 9 यिर्मयाह 10 यिर्मयाह 11 यिर्मयाह 12 यिर्मयाह 13 यिर्मयाह 14 यिर्मयाह 15 यिर्मयाह 16 यिर्मयाह 17 यिर्मयाह 18 यिर्मयाह 19 यिर्मयाह 20 यिर्मयाह 21 यिर्मयाह 22 यिर्मयाह 23 यिर्मयाह 24 यिर्मयाह 25 यिर्मयाह 26 यिर्मयाह 27 यिर्मयाह 28 यिर्मयाह 29 यिर्मयाह 30 यिर्मयाह 31 यिर्मयाह 32 यिर्मयाह 33 यिर्मयाह 34 यिर्मयाह 35 यिर्मयाह 36 यिर्मयाह 37 यिर्मयाह 38 यिर्मयाह 39 यिर्मयाह 40 यिर्मयाह 41 यिर्मयाह 42 यिर्मयाह 43 यिर्मयाह 44 यिर्मयाह 45 यिर्मयाह 46 यिर्मयाह 47 यिर्मयाह 48 यिर्मयाह 49 यिर्मयाह 50 यिर्मयाह 51 यिर्मयाह 52Verse
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मुख्य व्याख्या: सिबमा के दुखद अंत पर यिर्मयाह की विलापगत पुकार
यिर्मयाह 48:32 में यिर्मयाह का शोक याजेर (याजेर) और सिबमा के लिए है। यहाँ प्रभु के विरुद्ध उग्र नाश के संदेश के बीच सिबमा के लिए विलाप का गहरा भाव है। यह आयत यह बताती है कि नीतिगत अवमूल्यन और अन्याय के कारण एक क्षेत्र के पौधे और दाखें तक प्रभावित हैं; पराश्रित दुष्कर्म के फलस्वरूप राजा-प्रशस्ति और कृषि-समृद्धि क्षीण हो जाती है। यह संदेश प्रेरित है कि परमेश्वर न्यायसंगत है और उसकी विपत्ति-नियक्ति हाथ में है, ताकि पथभ्रष्ट लोग अपने प्रहारों के परिणाम भुगतें।
पाठ्य-संदर्भ: साहित्यिक संदर्भ और पाद-संदेश
यह आयत यिर्मयाह की किताब में बसा एक सजीव, अंतःकरण-युक्त विलाप का अंश है, जिसमें निर्जीव राज्य के विरुद्ध भगवान का निर्णय और उसकी परीक्षा दिखाई देती है। सिबमा—that is, एक क्षेत्र के सिपहियों का केंद्र—की डाले और दाखों की नष्टि के दृश्य से गाँव-खेतों की आर्त पीड़ा प्रकट होती है। इस तरह संदेश न केवल भविष्य के किसी एक शहर के लिए, बल्कि उन सभी कर्तव्यहीन और पापपूर्ण प्रवृत्तियों के लिए है जो परमेश्वर के नियम से विमुख हैं।
धर्मशास्त्रीय महत्त्व
1) न्याय की पूर्णता: इस वाक्य में नाश केवल बाहरी संरचनाओं पर है बल्कि लोगों के आंतरिक व्यवहाऱ और सामुदायिक पथ के परिणामस्वरूप। यह स्मरण दिलाता है कि परमेश्वर पाप के परिणामों से बचाने के बजाय उसे दंडित करने में सक्षम और न्यायप्रिय है।
2) दया और विलाप का संतुलन: यिर्मयाह का विलाप एक चातुरी अभिव्यक्ति है—वह परिस्थिति की कठोरता के बीच भी परमेश्वर के करुणा-योग्य उद्देश्य को दर्शाते हैं कि नीति-निर्णयों के पार भी पीड़ितों के लिए दया का मार्ग खुला रहता है।
पूर्ववर्ती और संदर्भ-नज़रिए (Cross-references)
इन संदर्भों से समझ आता है कि बाइबल में विलाप एक अभिव्यक्ति है जो न्याय के साथ दया को भी बाँधती है—आखिर परमेश्वर अपने लोगों के लिए उद्धार और सुधार का पथ खोलना नहीं भूलता।
प्रतिबिंब विचार (Questions for reflection)
संक्षिप्त निष्कर्ष
यिर्मयाह 48:32 सिबमा के दुखद नाश को देखकर यह बताता है कि परमेश्वर के रॉय-न्याय से पथभ्रष्टता का परिणाम सभी तक पहुँचता है। परन्तु वहीं दया-योग्यता भी साथ-साथ है—वह वास्तविक परिवर्तन के लिए रास्ते बनाती है, ताकि समुदाय फिर से पथ पर लौट सके। यह आयत हमें स्मरण कराती है कि प्रभु न्याय के साथ करुणा का भी अधिकारी है, और हमारी प्रतिक्रिया उसे मानकर जीवन-परिवर्तन की दिशा लेनी चाहिए।
उद्धृत सारांश: Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के प्रवचनों में इस प्रकार के हिस्से अक्सर यह संकेत करते हैं कि क्षेत्रीय विनाश के पीछे नैतिक और धार्मिक पतन निहित है, और सत्य यह है कि परमेश्वर के न्याय के साथ उसकी दया का अनुशासन भी चला आता है।