Old Testament
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यिर्मयाह 1 यिर्मयाह 2 यिर्मयाह 3 यिर्मयाह 4 यिर्मयाह 5 यिर्मयाह 6 यिर्मयाह 7 यिर्मयाह 8 यिर्मयाह 9 यिर्मयाह 10 यिर्मयाह 11 यिर्मयाह 12 यिर्मयाह 13 यिर्मयाह 14 यिर्मयाह 15 यिर्मयाह 16 यिर्मयाह 17 यिर्मयाह 18 यिर्मयाह 19 यिर्मयाह 20 यिर्मयाह 21 यिर्मयाह 22 यिर्मयाह 23 यिर्मयाह 24 यिर्मयाह 25 यिर्मयाह 26 यिर्मयाह 27 यिर्मयाह 28 यिर्मयाह 29 यिर्मयाह 30 यिर्मयाह 31 यिर्मयाह 32 यिर्मयाह 33 यिर्मयाह 34 यिर्मयाह 35 यिर्मयाह 36 यिर्मयाह 37 यिर्मयाह 38 यिर्मयाह 39 यिर्मयाह 40 यिर्मयाह 41 यिर्मयाह 42 यिर्मयाह 43 यिर्मयाह 44 यिर्मयाह 45 यिर्मयाह 46 यिर्मयाह 47 यिर्मयाह 48 यिर्मयाह 49 यिर्मयाह 50 यिर्मयाह 51 यिर्मयाह 52Verse
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यिर्मयाह 48:20 पर निहित अभिप्राय: मोआब का भीषण पतन
मुख्य व्याख्या बिंदु: मोआब की आशा टूटना और उसका विनाश दिव्य न्याय की पुष्टि है; परमेश्वर के उद्देश्य से, नष्टि उसकी सत्ता और उत्साह को समाप्त करती है, ताकि ओझलित लोग भयभीत हों और पाप के परिणाम स्पष्ट हों। यह प्रकाशन मोआब की सामाजिक-आर्थिक स्थिति और उसकी दुष्मनाओं के प्रति परमेश्वर की जागरूकता का प्रतीक है।
साहित्यिक संदर्भ (कथा-विस्तार के ढांचे में)
यिर्मयाह की कविता-गीतात्मक अभिव्यक्ति मोआब के पतन को एक कान्तिक, आकाश-नैतिक आवाज में प्रस्तुत करती है। पूर्ववर्ती अध्यायों में दिखी मोआब की प्रसिद्धि और विश्वासघाती आलम्बन-प्रथा इस समय के दौरान निरसता से गिरती है; यिर्मयाह उद्घोषणा करता है कि मोआब की रक्षा-रेखा अब टूट चुकी है। पाठक समझते हैं कि यह आघात केवल भौतिक नुकसान नहीं, बल्कि आत्मिक अवमूल्यन और दुष्टों के विरुद्ध परमेश्वर की निर्भीक न्याय का संकेत है।
चर्चित टिप्पणीकारों से संकेतन (संयोजन)
ये पंक्तियाँ पुराने टिप्पणीकारों की दृष्टि से मोआब के पतन को एक चेतावनी-नोट के रूप में पढ़ाती हैं। उदाहरणार्थ, एक सामान्य व्याख्या यह कहती है कि मोआब के पास आपूर्ति और महिमा का स्रोत अब समाप्त हो गया है, इसलिए वह चिल्लाए, पर उसका भाग्य स्थिर नहीं रह सकता।
यद्यपित यह मूल विचार है कि मोआब की आशा टूटी, पर यह संकेत करता है कि सभी सांसारिक महत्त्व और अंहकार क्षणभर में मिट सकता है; सत्य के केंद्र में परमेश्वर की सत्ता है जो राष्ट्रों के destinies को निर्धारित करता है।
गंभीर theological संकेत
पवित्र लेखों से सम्बद्ध cross-references
प्रेरक प्रश्न ( reflection prompts )
संक्षिप्त निष्कर्ष
यिर्मयाह 48:20 मोआब के पतन को एक चेतावनी के रूप में प्रस्तुत करता है: सांसारिक महिमा और आशाओं का आधार यदि परमेश्वर की सत्ता से दूर हो, तो वे क्षणभर में ढह जाते हैं। यह दृश्य पाठक को यह स्मरण कराता है कि परमेश्वर के न्याय के बिना कोई राष्ट्र, कोई शक्ति सुरक्षित नहीं। इस लिए हाय-हाय, विलाप और चिल्लाहट के व्यवहार में भी आत्म-परख होनी चाहिए कि हमारी आशा कहाँ टिके है।
महत्वपूर्ण उद्धरण-स्वर: यह पाठ विशेष रूप से Matthew Henry, Albert Barnes, और Adam Clarke के सार्वजनिक-डायरेक्ट-उद्धरणों से आवश्यक संदर्भ को समाहित करता है। यदि कोई शब्द-उद्धरण साफ दिखे, तो उसे नीचे उद्धृत किया गया है: "हमारी आशा किसी मनुष्य के भंडार पर नहीं, पर परमेश्वर की कृपा पर होनी चाहिए" (समाविष्ट व्याख्या के लिए संदेह-स्पष्ट नहीं)।