Old Testament
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यिर्मयाह 1 यिर्मयाह 2 यिर्मयाह 3 यिर्मयाह 4 यिर्मयाह 5 यिर्मयाह 6 यिर्मयाह 7 यिर्मयाह 8 यिर्मयाह 9 यिर्मयाह 10 यिर्मयाह 11 यिर्मयाह 12 यिर्मयाह 13 यिर्मयाह 14 यिर्मयाह 15 यिर्मयाह 16 यिर्मयाह 17 यिर्मयाह 18 यिर्मयाह 19 यिर्मयाह 20 यिर्मयाह 21 यिर्मयाह 22 यिर्मयाह 23 यिर्मयाह 24 यिर्मयाह 25 यिर्मयाह 26 यिर्मयाह 27 यिर्मयाह 28 यिर्मयाह 29 यिर्मयाह 30 यिर्मयाह 31 यिर्मयाह 32 यिर्मयाह 33 यिर्मयाह 34 यिर्मयाह 35 यिर्मयाह 36 यिर्मयाह 37 यिर्मयाह 38 यिर्मयाह 39 यिर्मयाह 40 यिर्मयाह 41 यिर्मयाह 42 यिर्मयाह 43 यिर्मयाह 44 यिर्मयाह 45 यिर्मयाह 46 यिर्मयाह 47 यिर्मयाह 48 यिर्मयाह 49 यिर्मयाह 50 यिर्मयाह 51 यिर्मयाह 52Verse
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यिर्मयाह 48:7 पर निहित मुख्य बिंदु
यह पद उन लोगों के लिए चेतावनी है जो अपनी सुरक्षा और सम्पन्नता को परमेश्वर की स्थान पर मान लेते हैं। यिर्मयाह ने माओस, मोआब, और अन्य राष्ट्रों की कुलीनताओं के विश्वास-घटाने वाले आस्थागत ढाँचों को उजागर किया है, जहां आत्म-आश्रितता और धन-दौलत की सुरक्षा ने उन्हें पाप के कठोर परिणामों तक पहुँचाया। यहाँ यह स्पष्ट है कि जिसे वह भरोसा है, वही है जिसे दण्ड के समय लिया जाएगा।
पाठ का साहित्यिक संदर्भ
यिर्मयाह 48 मुआब (मोआब) के विरुद्ध भविष्यवाणी का भाग है; यह मूर्त-आराधना, धन-संपदा और राजनीतिक सुरक्षा पर उनकी निर्भरता के कारण आने वाले दण्ड का चित्रण करता है। शास्त्र इस जगह एक सामान्य सिद्धांत रखता है—जो प्रभु से विमुख होकर अपनी शक्ति को ही सुरक्षा मानता है, वही वास्तविक समृद्धि और सुरक्षा से वंचित रहता है।
धर्मशास्त्रीय महत्व
यह पद यह संकेत देता है कि आर्थिक या राजनीतिक सुरक्षा पर अति-आश्रित होना आत्म-विश्वास का रूप ले सकता है जो ईश्वर के साक्षात्कार से दूर कर देता है। प्रभु के समानांतर, “मैं ही तुम्हारी सहायता हूँ” के संदेश को अनदेखा करना जोखिम भरा है। भले ही कमोश देवता और उनके मंत्री-याजक भी बंधुआ हो जाएं, पर परमेश्वर की इच्छा उनके अहंकार से ऊपर है। यह संकेत देता है कि ईश्वर के निर्णयों में विश्वास रखना ही बुद्धिमत्ता है, न कि मृत्यु-बद्ध आत्म-गौरव में फँसना।
अनुसंधान के लिए cross-references
जीवंत सोच-विचार के लिए प्रश्न
संक्षिप्त निष्कर्ष
यिर्मयाह 48:7 स्पष्ट करता है कि शारीरिक संपदा और राजनीतिक सत्ता भी यदि ईश्वर के मार्ग पर नहीं चलतीं, तो शांति और सुरक्षा की वास्तविक अनुभूति नहीं दे सकतीं। प्रभु–विश्वास ही वह ठोस आधार है जो बंधारित जीवन में भी स्वीकृत रहता है। यह संदेश आज भी नवजीवन की राह दिखाता है कि हमारी सुरक्षा का ठिकाना यथार्थ में केवल परमेश्वर के वादों में है, न कि पृथ्वी की संपत्ति या व्यवस्था में।
महत्वपूर्ण उद्धरण (पढ़े जाने लायक)
महत्त्वपूर्ण दैवीय विचारों को समाहित करते हुए, नीचे तीन पूर्व-स्वीकृत टीकाकरणों से एक-एक स्पष्ट विचार शामिल किया गया है—परंतु पूर्ण टेक्स्ट उद्धरण नहीं दिए गए हैं, केवल संकेत मिलते हैं:
Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के सार्वजनिक-डोमेन.commentary में जहां “उद्धरण” सीधे है, वहाँ उल्लेखित है। अगर आप चाहें, मैं उन स्रोतों के संक्षिप्त विचारों के आधार पर अधिक विशिष्ट पंक्तियाँ दे सकता/सकती हूँ।