Old Testament
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यिर्मयाह 1 यिर्मयाह 2 यिर्मयाह 3 यिर्मयाह 4 यिर्मयाह 5 यिर्मयाह 6 यिर्मयाह 7 यिर्मयाह 8 यिर्मयाह 9 यिर्मयाह 10 यिर्मयाह 11 यिर्मयाह 12 यिर्मयाह 13 यिर्मयाह 14 यिर्मयाह 15 यिर्मयाह 16 यिर्मयाह 17 यिर्मयाह 18 यिर्मयाह 19 यिर्मयाह 20 यिर्मयाह 21 यिर्मयाह 22 यिर्मयाह 23 यिर्मयाह 24 यिर्मयाह 25 यिर्मयाह 26 यिर्मयाह 27 यिर्मयाह 28 यिर्मयाह 29 यिर्मयाह 30 यिर्मयाह 31 यिर्मयाह 32 यिर्मयाह 33 यिर्मयाह 34 यिर्मयाह 35 यिर्मयाह 36 यिर्मयाह 37 यिर्मयाह 38 यिर्मयाह 39 यिर्मयाह 40 यिर्मयाह 41 यिर्मयाह 42 यिर्मयाह 43 यिर्मयाह 44 यिर्मयाह 45 यिर्मयाह 46 यिर्मयाह 47 यिर्मयाह 48 यिर्मयाह 49 यिर्मयाह 50 यिर्मयाह 51 यिर्मयाह 52Verse
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यिर्मयाह 48:36 पर टिप्पणी — मोआब के लिए बाँसुरी रोना
यह पद क्यों महत्त्वपूर्ण है
इस वाक्य में भविष्य के एक विडंबनापूर्ण क्षण की स्वीकारोक्ति है: मोआब के लोगों ने जो धैर्य और साधन-सम्पत्ति संजोकर रखा था, उसका क्षय हो जाना है। पिता के रूप में यिर्मयाह एक ऐसे समाज का विलाप व्यक्त करते हैं जो अपनी सीमा-रिपोर्टों से बाहर नहीं निकल पाया, और उन सब असफलताओं के बीच भी परमेश्वर की न्यायिक गतिविधि स्पष्ट होती है। यह हमें यह याद दिलाता है कि सांसारिक संपत्ति और रणनीतियाँ क्षणिक हैं, पर परमेश्वर का निर्णय स्थिर है।
वास्तविक प्र=context का सार
यिर्मयाह ने मूसा के समय से चली आ रही निर्भरता के विपरीत बंधनों और अस्थिरताओं की स्थिति में भी अन्यजातियों के साथ घटती-घटती घटनाओं की ओर संकेत किया है। इस पद में मोआब के ग्रहणशील समाज के लिए चेतावनी है कि उन्होंने अपनी सुरक्षा और सम्पन्नता को पृथ्वी के स्रोतों पर निर्भर किया, न कि परमेश्वर की abundantie पर। परिणामस्वरूप, जो कुछ उन्होंने कमाकर बचाया है, वह अब नष्ट हो रहा है।
मुख्य विचार
कथा-संदर्भ से जुड़े बिंदु
यह पंक्ति मोआब के लिए संकेत करती है कि उनकी आंतरिक संपदा और बाहरी सुरक्षा संकट के समय भी नहीं टिकती। यिर्मयाह के संदेश में यह एक थीम बनती है कि परमेश्वर की न्याय-नियतियाँ प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से नष्ट होने वाली चीजों पर प्रभाव डालती हैं, चाहे वे कितना भी सुरक्षित क्यों न हों।
क्रॉस-रेफरेन्स
1) मुक्तियों के समय की शिक्षा: इस्राइल के साथ परमेश्वर की सहायता के बजाय मानव-उपायों पर निर्भर रहने के परिणामों की याद दिलाती है। छोटे-छोटे राष्ट्र भी नश्वर संपत्ति के कारण संकट में पड़ते हैं।
2) निर्भरता बनाम भरोसा: परमेश्वर पर पूर्ण भरोसा न होने पर किस तरह संसार की सुरक्षा ढह जाती है, यह देखने को मिलता है।
3) न्याय का समय: परमेश्वर अपनी नीति-नियमों के अनुसार काम करते हैं, और लोगों की अपेक्षाएँ उनके चित्त के अनुसार ढलना चाहिये।
डिवोशनल विचार
जहाँ मोआब अपनी बाँसुरी की धुन में विलाप कर रहा है, वहाँ हमें अपने जीवन के स्रोतों पर एक ध्यान देना चाहिए। क्या हम अपनी सुरक्षा के लिए केवल धन, भागदौड़ या प्रभाव के बूते चलते हैं, या हमारा पहला भरोसा परमेश्वर की योजना और उसकी कृपा पर है? परिस्थिति चाहे कैसी भी हो, परमेश्वर की न्याय-गाथाएं अडिग रहती हैं।
पवित्र पाठ से प्रेरित तीन से पाठ-तकस
किसी भी परिस्थिति में, वास्तविक शांति परमेश्वर की सत्ता में है; सांसारिक सुरक्षा टिक नहीं पाती।
कठोर सच के साथ एक ठहराव, एक ग्रहणशीलता—यही है यिर्मयाह का संदेश: अपने उद्धारक-निर्भरता को उठाकर, अपनी आशाओं को परमेश्वर के निर्णय के अनुरूप ढालिए।
उद्धरण के लिए: Matthew Henry, Albert Barnes, Adam Clarke के सार्वजनिक डोमेन टिप्पणी-रेखाओं में से जो संकलन सीधे उद्धृत हैं, वे इस पाठ के भाव को पूरक करते हैं। यदि आप चाहें, मैं इन्हीं commentators के संक्षिप्त, सटीक अंश दे सकता हूँ ताकि पाठ-संवाद और उद्धरण एक साथ स्पष्ट हों।