Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
मत्ती 6:1 मत्ती 6:2 मत्ती 6:3 मत्ती 6:4 मत्ती 6:5 मत्ती 6:6 मत्ती 6:7 मत्ती 6:8 मत्ती 6:9 मत्ती 6:10 मत्ती 6:11 मत्ती 6:12 मत्ती 6:13 मत्ती 6:14 मत्ती 6:15 मत्ती 6:16 मत्ती 6:17 मत्ती 6:18 मत्ती 6:19 मत्ती 6:20 मत्ती 6:21 मत्ती 6:22 मत्ती 6:23 मत्ती 6:24 मत्ती 6:25 मत्ती 6:26 मत्ती 6:27 मत्ती 6:28 मत्ती 6:29 मत्ती 6:30 मत्ती 6:31 मत्ती 6:32 मत्ती 6:33 मत्ती 6:34



मत्ती 6:14 पर commentary
यह अध्याय प्रभु यीशु के ज्ञानवर्धक शिक्षण का भाग है, जहाँ प्रार्थना, उपहार देने, और दृष्टीनिर्वाह (त्याग) के व्यवहार में असत्य और स्वार्थ से मुक्त रहने का उच्च आदर्श प्रस्तुत किया गया है। यह verse संकेत देता है कि परमेश्वर की कृपा और क्षमा हमारे रिश्तों के भीतर की धड़कनों पर निर्भर है। यदि हम मनुष्यों के अपराध क्षमा करते हैं, तब ही हमारा पिता स्वर्गीय भी हमें क्षमा करेगा। इसका अर्थ स्पष्ट है: क्षमा एक दूजे के बीच का गुण है जो ईश्वर के साथ हमारे संबन्धों की स्थिति दर्शाता है।
पार्श्व रहा संदर्भ और मूल सन्देश
यह वाक्य मत्ती के सार में प्रेषित है, जहाँ यीशु प्रभु-प्रार्थना (पहचान-पूजा) के पाठ सहित, यह सिखाता है कि क्षमा दोनों पक्षों के बीच एक जीवनदायिनी क्रिया है। यदि हम दूसरों के प्रति क्षमा नहीं दिखाते, तो यह बिंदु बताता है कि ईश्वर हमारी ओर से क्षमा कैसे दे—या दे पाने की सीमा कैसे घटती है। यह न केवल अन्याय के प्रति संतोष से जुड़ा है, बल्कि यह हमारे आंतरिक हृदय की सच्ची स्थिति का परीक्षण भी है।
मुख्य संदेश
गहरे विचार और उनकी व्याख्या
टिप्पणियों में Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke की सार्वजनिक-डायारियों से संक्षेप और उपयुक्त उद्धरण मिलते हैं जो इस verse के तात्पर्य को और स्पष्ट करते हैं।
• Henry कहते हैं कि यदि हम भारी मन से दूसरों की गलतियों को नहीं माफ करते, तो हम परमेश्वर की क्षमा के पात्र नहीं बन पाते; हृदय की गर्मी और दयालुता हमारे आध्यात्मिक स्वास्थ्य के संकेत हैं।
• Barnes बताते हैं कि यह न्याय-प्रक्रिया हमारे दैनिक अन्तर-व्यवहार पर लागू होती है—जैसे ही हम दूसरे के प्रति कठोर रहते हैं, हमारे लिए क्षमा की सीढ़ी अवरोध बन जाती है।
• Clarke विश्लेषण करते हैं कि क्षमा का सत्य ईश्वर की नीति से जुड़ा है—जो व्यक्ति दूसरों को क्षमा करता है, वह स्वयं ईश्वर की कृपा के अधिकार में रहता है; यह अंदर से निकलकर कर्तव्य बन जाती है।
इन त्रयी की दृष्टि से एक ही संदेश निकलता है—ईश्वर की क्षमा हमारे जीवन में आंतरिक रूप से क्रिया-प्रक्रिया है; जब हम दूसरों को क्षमा करते हैं, तो हम परमेश्वर की क्षमा के मार्ग में चलते हैं।
क्रॉस-रेफरेंस (संक्षेप में)
1) मत्ती 18:21-35 — दया और क्षमा के प्रकरण में शिष्य की शालीनता का परीक्षण, जहाँ एक व्यक्ति की क्षमा की सीमा दूसरी क्षमाशीलता पर निर्भर होती है।
2) लूका 6:37 — "तुम न समझाओ, नहीं तो तुम्हें नाप लिया जाएगा; ... क्षमा करो, और तुम्हें क्षमा किया जाएगा"—निःस्वार्थ क्षमाशीलता की प्रेरणा।
3) माखा 11:25-26 — पिता के प्रति क्षमा की व्यापकता; आंतरिक परिवर्तन क्षमा के साथ जुड़ा है।
व्यावहारिक पक्ष
- प्रत्यक्ष संबंधों में छोटों से बड़े तक हर स्तर पर क्षमा बनाएं—कठिन परिस्थितियों में भी पहले कदम को न छोड़ें।
- क्षमा करना स्वयं में शांति को जन्म देता है और रिश्तों को पुनर्जीवित करता है।
आध्यात्मिक चिंतन
क्षमाशीलता के साथ प्रार्थना, आचार-विचार और व्यवहार एक-साथ विकसित होते हैं। यह बताता है कि कैसे ईश्वर की कृपा हमारे भीतर भ्रमित मन को साफ़ करती है और हमें दया-स्पर्शी बनाती है।
संक्षिप्त devotional विचार
आज के दिन अगर किसी ने आपका दिल दुखाया है, तो प्रभु की ओर चढ़कर क्षमा की प्रार्थना करें। आपके भीतर की क्षमा आपके लिए भी ईश्वर की क्षमा को खोल देगी, और स्वर्गीय पिता के स्वागत के मार्ग को मजबूत करेगी।