मत्ती 6:28 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका

“और वस्त्र के लिये क्यों चिन्ता करते हो? सोसनों के फूलों पर ध्यान करो, कि वे कैसे बढ़ते हैं, वे न तो परिश्रम करते हैं, न काटते हैं।

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मत्ती 6:28 पद-दर-पद बाइबल टीका

सीधी बात का अर्थ

मत्ती 6:28 में यीशु कहते हैं: वस्त्र के लिये चिन्ता क्यों करते हो? आकाश के फूलों जैसे परिश्रम और कटाई के बिना वे कैसे बढ़ते हैं, यह सोचो। यह संदेश हमारी चिंता को ईश्वर के बदले अवहेलना नहीं, बल्कि विश्वास की ओर मोड़ने के लिए है कि प्रभु अपनी देख-रेख करते हैं और आवश्यकता पूरी करेंगे।

पृष्ठभूमि और संदर्भ

यह वक्तव्य मत्ती 6 के हिस्से में आता है जिसमें यीशु संसारिक चिंताओं पर चेतावनी देते हैं—खासकर भौतिक आवश्यकताओं के लिए। वह पिता-परक संबोधन के माध्यम से बतलाते हैं कि सांसारिक चिन्ता के बजाय परम पिता की बहुमूल्य देखरेख पर भरोसा रखना चाहिए। फूलों की तुलना केबल शोभा, रंग, और बढ़त के प्राकृतिक चक्र से है; यह बताता है कि ईश्वर परिवर्तन नहीं होते और न उन्हें मेहनत-चाहे अलग से प्रार्थना की आवश्यकता है, बल्कि वे स्वतः सुंदर और धारणीय तरीके से बढ़ते हैं।

व्याख्यात्मक निष्कर्ष

- प्रकृति से शिक्षा: प्रकृति की व्यवस्था में परम Adri की नीयत स्पष्ट है—वह अपने प्रावधानों को धारण करता है और अनुपम तरीके से संचालित होता है।

- चिंता के स्थान पर विश्वास: चिंतन के बजाय विश्वासपूर्ण व्यवहार—कथित आवश्यकताओं पर निर्भरता की कमी—हमें परम पिता की सुरक्षा पर टिके रहने की प्रेरणा देता है।

- जीवन के प्राथमिकता क्रम: वस्त्र, अन्न आदि भौतिक चीजें तात्कालिक जरूरतें हैं; परन्तु ईश्वर के royaume और उसकी righteousness की खोज पहले आनी चाहिए ताकि बाकी सब जुड़ जाएं।

छोटे थीमैटिक बिंदु

  • ईश्वर की देखभाल पर भरोसा बनाम निरर्थक चिंता
  • प्रकृति से प्रेरणा: परमपालक के कार्य की सहजता
  • रुचियाँ और आवश्यकताएँ: जीवन की प्राथमिकताओं की पुनर्संयोजना

संबद्ध पाठ जो विचार की दिशा खोलते हैं

- लूका 12:22-31: यीशु बतलाते हैं कि हमारे जीवन की चिंता के स्थान पर परम पिता के राज्य की खोज हो और ईश्वर के राज्य के लिए निश्चय और नैतिक विश्वास जरूरी है।

- फिलिप्पियों 4:6-7: चिंता के बजाय prayer and supplication, with thanksgiving, परस्पर शांति का वचन देता है—यह भी वस्त्र-आहार की चिंता से ऊपर उठने का मार्ग है।

- 1 राजा 17: zoek: Elijah के समय ईश्वर ने पक्षियों के द्वारा भोजन की व्यवस्था की—प्रत्याभास यह है कि ईश्वर हर प्रकार से देखभाल करता है।

व्यावहारिक निष्कर्ष

हम विश्वास करें कि परम पिता हमारी आवश्यकताओं का कृपापूर्ण संबल बनता है। दैनिक जरूरी वस्त्र की चिंता छोड़कर, ईश्वर की Provision पर निर्भर रहें—ताकि हमारे दिल चिंता से मुक्त होकर परमेश्वर के साथ अधिक नजदीक जुड़ें।

चर्चित उद्धरण (निरीक्षणित स्रोत)

यह पंक्ति सार्वजनिक-डोमेन टिप्पणीकारों के समानार्थी विवेचनाओं के अनुरूप है। नीचे प्रमुख टिप्पणीकारों के संक्षेप विचार मिलते हैं:

- मॅथ्यू हेन्री: चूँकि प्रकृति में ईश्वर की व्यवस्था स्पष्ट है, इंसान को भी उसी भरोसे से प्रार्थना करनी चाहिए ताकि आवश्यकताएँ सत्यापित हों।

- आर्थर ब्रेन्स: चिंता के सूनापन से ऊपर उठना, प्रतिदिन की आवश्यकताओं को ईश्वर के चरणों में रखना उचित है।

- एडम क्लार्क: फूलों के बढ़ने की गति दिखाती है कि ईश्वर के काम में मानव के प्रयासों की अनावश्यक भागीदारी का स्थान है जब तक वह His निर्देश में नहीं है।

योगात्मक संदर्भ

1) मत्ती 6:25-34 के अन्य भाग में भी ईश्वर की देखरेख का संदेश है—खासकर रात और दिन के बीच संतुलन बनाये रखना।

2) लूका 12:22-31: चिंता से मुक्ति और ईश्वर के राज्य की तलाशी का आग्रह।

संक्षेप में: यह उपदेश हमें याद दिलाता है कि जीवन की वास्तविक सुरक्षा परम पिता की कृपा और राज्य की सत्ता में है; भौतिक चिन्ता के बदले उस भरोसे को पक्का करें और जीवन-कार्य की दिशा उसी विश्वास के प्रकाश में संचालित करें।

*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।

मत्ती 6:28 समानांतर पद और संबंधित वचन

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इसलिए मैं तुम से कहता हूँ, कि अपने प्राण के लिये यह चिन्ता न करना कि हम क्या खाएँगे, और क्या पीएँगे, और न अपने शरीर के लिये कि क्या पहनेंगे, क्या प्राण भोजन से, और शरीर वस्त्र से बढ़कर नहीं?

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किसी भी बात की चिन्ता मत करो; परन्तु हर एक बात में तुम्हारे निवेदन, प्रार्थना और विनती के द्वारा धन्यवाद के साथ परमेश्‍वर के सम्मुख उपस्थित किए जाएँ।

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“इसलिए तुम चिन्ता करके यह न कहना, कि हम क्या खाएँगे, या क्या पीएँगे, या क्या पहनेंगे?

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