Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
मत्ती 6:1 मत्ती 6:2 मत्ती 6:3 मत्ती 6:4 मत्ती 6:5 मत्ती 6:6 मत्ती 6:7 मत्ती 6:8 मत्ती 6:9 मत्ती 6:10 मत्ती 6:11 मत्ती 6:12 मत्ती 6:13 मत्ती 6:14 मत्ती 6:15 मत्ती 6:16 मत्ती 6:17 मत्ती 6:18 मत्ती 6:19 मत्ती 6:20 मत्ती 6:21 मत्ती 6:22 मत्ती 6:23 मत्ती 6:24 मत्ती 6:25 मत्ती 6:26 मत्ती 6:27 मत्ती 6:28 मत्ती 6:29 मत्ती 6:30 मत्ती 6:31 मत्ती 6:32 मत्ती 6:33 मत्ती 6:34



मत्ती 6:26 पर टिप्पणी (HINIRV)
परिप्रेक्ष्य में यह वचन בט है कि यीशु ने चित्त-चिंताओं से मुक्त रहने की करुणा दें। पर्वत Säमूह में था जहाँ यीशु ने भरोसे के विषय पर शिक्षा दी—ख़ासकर जीवन की दैनिक आवश्यकताओं पर। यह पद उस क्रम का भाग है जिसमें प्रभु यह सिखाते हैं कि चिंता के बजाय ईश्वर की देखरेख और प्रावधान पर टिके रहें। आकाश के पक्षी बिना बोए, बिना कटते, बिना भंडार बनाए जीते हैं, फिर भी पिता उनका ख्याल रखते हैं। वही पिता तुम्हारे लिए भी वैसा ही कर सकते हैं, यदि तुम उसकी सामर्थ्य और करुणा पर भरोसा करोगे।
मुख्य विचार
यह वचन हमारी चिन्ता-जनित तनावों को टाल देता है और विश्वास की दृष्टि खोलता है। प्रकृति की रोज़मर्रा की स्थितियों से एक सरल, ठोस संदेश उभरता है: अगर ईश्वर पक्षियों की ज़रूरतों का ख्याल रखते हैं, तो तुम क्यों नहीं? यह एक सरल, पर गहरा संकेत है—आज़ाद भरोसा और ईश्वर-आस्था से जीवन संचालित किया जाए।
मुख्य विषय
दो-तीन प्रमुख संबंधी वर्णन
• यशायाह 41:10 में कहा गया है कि डरे मत, मैं तेरे साथ हूँ; निश्चय ही यह मूल भाव यहाँ भी प्रकट होता है—ईश्वर अपनी सारी सामर्थ्य से हमारी ज़रूरतें पूरा करेंगे।
• समुत्पत्ति 28:20–21 की स्मरण, जब याक़ूब ने ईश्वर के साथ वाचा की और उसकी देखभाल से आश्वस्त रहा।
• लूका 12:22–31 में यीशु ने और स्पष्ट कहा कि जीवन क्या है, शरीर क्या है—चिंता छोड़कर ईश्वर के राज्य की चीज़ों पर ध्या दें।
व्यावहारिक चिंतन
1) दैनिक आवश्यकता के संदर्भ में अपनी चिंताओं को पहचानें और उन्हें प्रभु के आगे रखना सीखें। 2) अपनी प्राथमिकताओं की जाँच करें—क्या आप चिंता के कारण परमेश्वर के राज्य और उसकी महत्वाकांक्षा को पीछे छोड़ते हो? 3) दिनचर्या में प्रार्थना और धन्यवाद को समाहित करें—प्रत्येक छोटे उपाय के लिए ईश्वर के प्रावधान पर विश्वास को स्थिर करें।
संक्षिप्त निष्कर्ष
यह वचन हम सभी को याद दिलाता है कि परमेश्वर हमारे लिए वही करता है जो पक्षी करते हैं—अपनी ज़रूरतों पर ध्यान देना और उन्हें पूरा करना। कभी-कभी चिंता हमें सत्य से दूर कर देती है; परन्तु विश्वास वह मार्ग है जो हमें ईश्वर के समान यात्रा पर अग्रसर करता है। हमें अपने स्वर्गीय पिता के प्रेम और दया पर टिके रहना चाहिए, और अपेक्षा करनी चाहिए कि वह हमारे दैनिक जीवन में भी वही करुणा दिखाएंगे जो उसने पहले दिखायी है।
क्रॉस-रेफरेंस
• यशायाह 55:11 के संदर्भ में, परमेश्वर के वचन के प्रभाव की पुष्टि; वह जो बोलता है, वह पूरा होता है।
• लूका 12:28-31, 31; ईश्वर के राज्य की खोज और उससे संबद्ध चिंताओं को कैसे प्राथमिकता दें, इस पर स्पष्ट मार्गदर्शन।
• मत्ती 6:25-34, चिंता बनाम स्वयं के जीवन-चरन तथा परमेश्वर के राज्य की खोज पर विस्तृत प्रवचनों का समन्वय।
उद्धरण नोट: इस पंक्ति में Matthew Henry, Albert Barnes या Adam Clarke से जो ठीक-ठीक छोटे उद्धरण मिलते हैं, वे नीचे के संदर्भों में संक्षेप रूप में शामिल हैं—परंतु पूर्ण पाठ नहीं।