मत्ती 6:5 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका

“और जब तू प्रार्थना करे, तो कपटियों के समान न हो क्योंकि लोगों को दिखाने के लिये आराधनालयों में और सड़कों के चौराहों पर खड़े होकर प्रार्थना करना उनको अच्छा लगता है। मैं तुम से सच कहता हूँ, कि वे अपना प्रतिफल पा चुके।

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मत्ती 6:5 पद-दर-पद बाइबल टीका

मत्ती 6:5 का संदर्भ और इसका आशय

यह पद्नमा यीशु के पिता के राज्य के आन्तरिक धर्मव्यवहार के बारे में शिक्षित करता है। पाठ हमें उन लोगों के बारे में सचेत करता है जो लोग-परिश्रम दिखाने के लिए आराधना के स्थानों पर खड़े होकर दूसरों को प्रभावित करने का प्रयास करते हैं। Jesus कहता है कि प्रार्थना में कपट और प्रदर्शन का कोई वास्तविक मूल्य नहीं है; ईश्वर निष्ठा और मन के अंश की चाहत करते हैं, न कि भीड़ की प्रशंसा।

ईश्वर के साथ ईमानदारी और आत्मा की प्रार्थना

पद में “कपटियों” शब्द से संकेत मिलता है उन धार्मिक दिखावे वालों का जो पोंगा-नकली शैली से प्रार्थना करते हैं ताकि लोग उनकी भक्ति को सराहें। परन्तु परमेश्वर वास्तविक प्रेम, सत्य और नम्रता को देखता है। इसका संदेश है—प्रार्थना एक आत्मिक संवाद है, न कि प्रदर्शन का मंच। मसीह ने यह स्पष्ट किया कि वह ऐसे आचरण को नहीं स्वीकारते जो दूसरों के सम्मान-प्रतिष्ठा के लिए किया गया हो।

शब्दार्थ और चित्रण की स्पष्टता

  • आराधनालयों में और सड़कों के चौराहों पर खड़े होकर— सार्वजनिक प्रदर्शन के स्थान, जहाँ लोग दूसरों की दृष्टि में श्रेष्ठ दिखना चाहें।
  • दिखाने के लिये— आत्मा के सच्चे भाव के विपरीत, मान-प्रतिष्ठा पाना लक्ष्य रहता है।
  • प्रतिफल— यहाँ परमेश्वर की प्रशंसा और आशीष जो दिखावे से नहीं मिलती, बल्कि मन की निष्कलंक निष्ठा से मिलती है।

अन्य राहत देने वाले संदर्भ

1) मत्ती 6:1— स्मरण करा देता है कि हमारी धर्म-कार्य का उद्देश्य लोगों को नहीं, बल्कि परमेश्वर को स्मरण और आदर्श बनना चाहिए।

2) लूका 18:9-14— फरिशियों के आत्म-गौरवन पर एक कथा, जहां आत्म-गौरव बनाम विनम्रता की परीक्षा दी जाती है।

3) याकूब 4:6— ईश्वर के पास घमण्ड से अधिक वह जो निम्नावस्था में आता है, और वह कृपा को देता है।

शुद्ध Application: आज के संदर्भ में

आज के समय में भी कई बार धार्मिक क्रिया-कलाप—प्रार्थना, उपनों की सेवा, या दान—सभाओं, ऑनलाइन पोस्टों या सामाजिक मंचों पर प्रचार-प्रसार का साधन बन जाते हैं। यह पद स्मरण कराता है कि प्रार्थना का मूल उद्देश्य परमेश्वर से वास्तविक संवाद है, स्वयं को दिखाने का नहीं। सक्रियता और समुदाय के साझा अनुभवों में भी नम्रता, शांत हृदय, और सत्य-वचन की आस्था उसी तरह प्रकट होनी चाहिए।

संक्षिप्त मौलिक सार

प्रार्थना में परमेश्वर के सामने खुली ईमानदारी और नम्रता का प्रवेश है; प्रदर्शन नहीं। जो लोग केवल भीड़ को प्रभावित करना चाहते हैं, वे अपनी संतुष्टि पाएंगे किन्तु परमेश्वर की कृपा से वे दूर रहते हैं।

संदर्भित उद्धरण (निर्दिष्ट स्पष्ट उद्धरण केवल वही जो सार्वजनिक-domain टिप्पणीकारों में उपलब्ध हैं)

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नोट: नीचे दिए गए पद-उद्धरणों से पाठक को अन्य प्रकरणों के साथ संयोग समझना सरल होता है, परन्तु यहाँ पूर्ण शाब्दिक उद्धरण नहीं देते हैं, ताकि मूल अर्थ सुरक्षित रहे.

*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।

मत्ती 6:5 समानांतर पद और संबंधित वचन

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“इसलिए जब तू दान करे, तो अपना ढिंढोरा न पिटवा, जैसे कपटी*, आराधनालयों और गलियों में करते हैं, ताकि लोग उनकी बड़ाई करें, मैं तुम से सच कहता हूँ, कि वे अपना प्रतिफल पा चुके।

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“दो मनुष्य मन्दिर में प्रार्थना करने के लिये गए; एक फरीसी था और दूसरा चुंगी लेनेवाला।

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और जब कभी तुम खड़े हुए प्रार्थना करते हो, तो यदि तुम्हारे मन में किसी की ओर से कुछ विरोध हो, तो क्षमा करो: इसलिए कि तुम्हारा स्वर्गीय पिता भी तुम्हारे अपराध क्षमा करे।

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