Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
मत्ती 6:1 मत्ती 6:2 मत्ती 6:3 मत्ती 6:4 मत्ती 6:5 मत्ती 6:6 मत्ती 6:7 मत्ती 6:8 मत्ती 6:9 मत्ती 6:10 मत्ती 6:11 मत्ती 6:12 मत्ती 6:13 मत्ती 6:14 मत्ती 6:15 मत्ती 6:16 मत्ती 6:17 मत्ती 6:18 मत्ती 6:19 मत्ती 6:20 मत्ती 6:21 मत्ती 6:22 मत्ती 6:23 मत्ती 6:24 मत्ती 6:25 मत्ती 6:26 मत्ती 6:27 मत्ती 6:28 मत्ती 6:29 मत्ती 6:30 मत्ती 6:31 मत्ती 6:32 मत्ती 6:33 मत्ती 6:34



मत्ती 6:19 का सार और संदर्भ
यह उद्धरण यीशु के Sermon on the Mount में धन और सम्पत्ति के विषय पर है। preceding verses आत्म-आश्रय और ईश्वर की आज्ञाओं पर तात्पर्य रखते हैं, और यह बताता है कि पृथ्वी पर जमा किया गया धन अस्थिर है। जहाँ कीड़ा और काई बिगाड़ते हैं, और जहाँ चोर सेंध लगाते और चुराते हैं, वहीं धन भय, चिंता और भ्रष्ट अनुमान के कारण खो सकता है। यीशु यह चेतावनी दे रहे हैं कि विश्वासियों को आंतरिक समृद्धि, न कि बाहरी वस्तुओं पर निर्भर रहना चाहिए।
मुख्य अर्थ
धन को ईश्वर की आज्ञाओं के अनुसार भली-भांति उपयोग करने के बजाय अगर हम उसे जीवन का केंद्र बना लेते हैं, तो वह हमारी सुरक्षा नहीं बन सकता। पृथ्वी की पत्नी और क्षणिक सुखों के पीछे भागना आत्मिक ऊर्जा को घटा देता है। यीशु एक मार्ग स्पष्ट कर रहे हैं: स्वर्गीय धनों को संजोना, जो अकाल या क्षति से नहीं, बल्कि स्थिर और टिकाऊ होते हैं।
क्यों यह महत्वपूर्ण है: दो-तीन प्रमुख विषय
अन्य प्रासंगिक पवित्र ग्रंथ से संपर्क
1) मत्ती 6:33— “पहले परमेश्वर की राज्य और उसकी धार्मिकता” पर टिके रहने की प्रेरणा देता है, जिससे धन के साथ संतुलन बना रहता है।
2) लूका 12:15— “क्योंकि अधिकतम आयुष्य धन से नहीं, पर ईश्वर की आत्मा से समृद्धि है”— व्यवहारिक समृद्धि की प्राथमिकता का संकेत।
3) जेम्स 5:1–5— धन के दुरुपयोग और असन्तुष्टियों के परिणामों पर चेतावनी, सामाजिक न्याय के दृष्टिकोण से भी विचार प्रस्तुत करता है।
एक व्यवहारिक प्रतिबिंब
आज के संदर्भ में, यह वाक्य हमें लागतों के बीच संतुलन बनाने को प्रेरित करता है—खर्च में विवेक, दानो-यज्ञ के लिए योगदान, और आवश्यकता से अधिक भंडार नहीं रखने का अभ्यास। साथ ही यह स्मरण दिलाता है कि ईश्वर के प्रति दृढ़ विश्वास और सेवा हमें दुष्प्रेरणा से बचाते हैं और आंतरिक शांति प्रदान करते हैं।
संक्षेप
मत्ती 6:19 में यीशु धन के प्रति हमारी दृष्टि स्पष्ट करते हैं: पृथ्वी पर जमा धन अस्थिर है; उसकी सुरक्षा अंत में क्षरण हो जाती है, परन्तु जो स्वर्गीय धनों के लिये खर्च करते हैं, वही वास्तविक मूल्य और स्थायित्व पाते हैं। इस शिक्षा का मूल उद्देश्य है—अपने दिल को परमेश्वर के राज्य के नीचे रखना और आंतरिक आशीर्वादों की ओर अग्रसर होना।
उद्धरण स्पष्ट उल्लेख
इस पंक्ति के अर्थ को स्पष्ट करते समय मैठ्यू henry, Albert Barnes और Adam Clarke जैसे विश्वसनीय पवित्र-पारिभाषिक टिप्पणीकारों के सार को समाहित किया गया है। नीचे उनके विचारों के संक्षेपिक संकेत दिए जा रहे हैं:
• Matthew Henry: धन की अस्थिरता और आंतरिक सम्पदा के महत्व पर दृढ़ शब्द।
• Albert Barnes: निर्भरता के स्रोत का चयन—ईश्वर या सांसारिक धन—इस पर ध्यानाकर्षण।
• Adam Clarke: चोरों और क्षय के वास्तविक खतरे के बारे में व्यावहारिक विवेचना।
नोट: उपरोक्त टिप्पणीकारों के स्पष्ट उद्धरण पंक्तियों के रूप में कुल मिलाकर संकलित नहीं हैं, किन्तु उनके प्रमुख विचार इस अनुच्छेद में समाहित हैं।