रोमियों 4:20 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका

और न अविश्वासी होकर परमेश्‍वर की प्रतिज्ञा पर संदेह किया, पर विश्वास में दृढ़ होकर परमेश्‍वर की महिमा की,

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रोमियों 4:20 पद-दर-पद बाइबल टीका

सीधे अर्थ का सार

रोमियों 4:20 में प्रेरित पॉल बतलाते हैं कि पिता परमेश्वर की प्रतिज्ञा पर विश्वास करने में असंगत नहीं रहा, बल्कि अविश्वास के बावजूद दृढ़ विश्वास से उसे मान लिया। इस वचन का तात्पर्य है कि ईश्वर की प्रतिज्ञा सत्य है और विश्वास ही उद्धार का मार्ग है—यद्यपि हमारी अनुभवी अस्थिरता और संदेह अनेक बार सामने आते हैं, फिर भी विश्वास बनाए रखना परमेश्वर की महिमा को प्रकट करता है।

पृष्ठभूमि और संदर्भ

रोमियों की पुस्तिका में पॉल आरंभ से यह स्पष्ट कर देते हैं कि चंद परमेश्वर के वचनों के अनुसार जीवन का मार्ग विश्वास पर ही निर्भर है, न कि कर्मों पर। रोमियों 4 में वे एब्राhem, इसाक, और याकूब के उदाहरणों के साथ यह दर्शाते हैं कि कैसे परमेश्वर की प्रतिज्ञा विश्वास के कारण ही पूरा होती है। इस संदेश का उद्देश्य यह है कि जड़ों में ईमानदारी और परमेश्वर केायहक पर भरोसा रखने वाला विश्वास ही धर्मी ठहरता है।

व्यावहारिक अध्ययनों के बिंदु

  • विश्वास बनाये रखना जब परिस्थितियाँ प्रतिकूल हों; न ही संदेह के कारण प्रतिज्ञाओं को छोटा करें।
  • परमेश्वर की महिमा तभी प्रकट होती है जब हम उसकी प्रतिज्ञाओं पर पूर्ण भरोसा करते हैं, भले ही मानवीय दृष्टिकोण से रास्ते अस्पष्ट लगें।
  • धैर्य और विश्वास—इन दोनों का संयोजन ईश्वर के उद्धारकार्य को गति देता है।

वाद-संबंधी उद्धरण और उनके सार के संकेत

Matthew Henry के अनुसार, दृढ़ विश्वास का अर्थ है “प्रतिज्ञा के प्रति अडिग रहना, भले ही आपको अस्थिरता का अनुभव हो।” Albert Barnes यह दर्शाते हैं कि अविश्वास से मुक्त होकर विश्वास में स्थिर रहना ही鉄कार है। Adam Clarke इसे ईश्वर के प्रेरित शब्दों की गवाही मानते हैं, कि विश्वास के द्वारा प्रतिज्ञा को सच मानना परमेश्वर की महिमा को दिखाने का तरीका है।

क्रॉस-रेफरेंसेस (संक्षेप में explanations)

- रोमियों 3-4 के आसपास अन्य उदाहरण बताते हैं कि परमेश्वर कैसे असाधारण प्रतीक्षित समय में भी प्रतिज्ञा पूरी करते हैं; विश्वास के साथ ही धर्मी ठहरना संभव है।
- हिब्रियों 11 में विश्वास के प्रकरणों से यह स्पष्ट होता है कि ऐतिहासिक व्यक्तियों ने भी प्रतिज्ञाओं को अस्थिर परिस्थितियों के बीच में स्वीकार किया।
- हन्ना और अन्य दृढ़ विश्वासियों के दृष्टांत भी परमेश्वर के कर्मों को प्रकट करने की प्रेरणा देते हैं।

संश्लेषित निष्कर्ष

रोमियों 4:20 में हम देखते हैं कि विश्वास केवल तर्कशास्त्र नहीं है, बल्कि एक सक्रिय निर्णय है जो प्रतिज्ञाओं पर केंद्रित रहता है। अविश्वास के क्षणों में भी, यदि हम परमेश्वर की वचन-प्रतिज्ञाओं पर अडिग रहे, तो उसकी महिमा प्रकट होती है और उद्धार की राह स्पष्ट होती है। हमारी जिम्मेदारी है—प्रिय परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं को मानना, धैर्य से उनका पालन करना, और अपनी कमजोरियों के बीच भी विश्वास को बढ़ावा देना।

*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।

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और उसने कहा, “हे अति प्रिय पुरुष, मत डर, तुझे शान्ति मिले; तू दृढ़ हो और तेरा हियाव बन्धा रहे।” जब उसने यह कहा, तब मैंने हियाव बाँधकर कहा, “हे मेरे प्रभु, अब कह, क्योंकि तूने मेरा हियाव बन्धाया है।” (यशा. 41:10)

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और धन्य है, वह जिस ने विश्वास किया कि जो बातें प्रभु की ओर से उससे कही गई, वे पूरी होंगी।”

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