Old Testament
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पठन-परिचय
रोमियों 4:23 का यह वचन (HINIRV अनुवाद के संदर्भ में) यह पुष्टि करता है कि वचन “विश्वास उसके लिये धार्मिकता गिना गया” किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं है। पॉल यहाँ अविश्वास और धार्मिकता के संबंध को स्पष्ट कर रहे हैं: धार्मिकता का गणनात्मक होना विश्वास पर निर्भर है, और वह गणना व्यापक रूप से लागू होती है।
अध्याय में स्थान और प्रवाह
रोमियों 4 में पॉल अब्राहम के उदाहरण के माध्यम से यह सिद्ध करते हैं कि धार्मिकता कर्मों से नहीं, बल्कि विश्वास से गिनी गई। अध्याय आरंभ में पॉल सिखाते हैं कि अगर धार्मिकता कर्मों द्वारा मिलती तो गर्व का स्थान बनता; परन्तु अब्राहम के मामले में स्पष्ट है कि उसे धर्मी मन लिया गया क्योंकि उसने ईश्वर पर विश्वास किया। 4:23 वचन इस तर्क को सार्वभौमिक बनाने का संकेत देता है — यह वचन केवल अभिविन्यास नहीं बल्कि सिद्धांत है जो सब पर लागू होता है।
मुख्य आध्यात्मिक शिक्षा
आध्यात्मिक रूप से यह पद बताता है कि धार्मिकता का आधार मानव प्रयास नहीं, बल्कि ईश्वर द्वारा स्वीकार किया गया विश्वास है। यह भरोसा व्यक्तिगत अनुभव और पाप-स्वीकार के साथ जुड़ा है, न कि धार्मिक नियमों या निजी पुण्य से। इसका अर्थ यह भी है कि ईश्वर की न्यायशीलता और अनुग्रह का स्रोत मानव कर्मों में नहीं बल्कि उसके वादे और विश्वास के उत्तर में दिया गया उत्तरदायित्व है।
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व्यावहारिक अनुप्रयोग
आज के जीवन में इस वचन का अर्थ यह है कि आत्मिक सुरक्षा और परमेश्वर के साथ संबंध हमारे धार्मिक कर्मों पर नहीं टिका होना चाहिए। हम निम्नलिखित तरीकों से इसे लागू कर सकते हैं:
स्रोत और परंपरागत टिप्पणी
Matthew Henry ने नोट किया है कि यह वचन सार्वभौमिक सिद्धांत व्यक्त करता है और अव्राहम का उदाहरण सभी पर लागू होता है। Albert Barnes इस बात पर जोर देते हैं कि पॉल का प्रयास यह दिखाना है कि धार्मिकता की गणना विश्वास के प्रकरण में हुई, न कि किसी नियम के पालन से। Adam Clarke का विश्लेषण भी इस तर्क को पुष्ट करता है कि वचन का उद्देश्य व्यक्तिगत घटना से व्यापक सिद्धांत बनाना था।
संक्षेप
रोमियों 4:23 यह स्पष्ट करता है कि "विश्वास के लिये धार्मिकता गिनी गयी"—यह वचन सिर्फ़ अभिदृष्टि नहीं बल्कि उन सभी के लिये सत्य है जो ईश्वर पर विश्वास करते हैं। यह मानना कि धार्मिकता हमारे कर्मों की गणना का परिणाम है, पॉल के तर्क के प्रतिकूल है। इस पद से सीख यह है कि विश्वास को ही धार्मिकता का आधार समझना चाहिए, और वही विश्वास कर्मों में सच्चे फल के रूप में प्रकट होता है।