Old Testament
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रोमियों 4:1 रोमियों 4:2 रोमियों 4:3 रोमियों 4:4 रोमियों 4:5 रोमियों 4:6 रोमियों 4:7 रोमियों 4:8 रोमियों 4:9 रोमियों 4:10 रोमियों 4:11 रोमियों 4:12 रोमियों 4:13 रोमियों 4:14 रोमियों 4:15 रोमियों 4:16 रोमियों 4:17 रोमियों 4:18 रोमियों 4:19 रोमियों 4:20 रोमियों 4:21 रोमियों 4:22 रोमियों 4:23 रोमियों 4:24 रोमियों 4:25



रोमियों 4:25 का अर्थ—स्वीकारना और जी उठना
सीधे अर्थ में इस पवित्र वचन का तात्पर्य है: यीशु मसीह हमारे अपराधों के कारण पकड़वाए और हमारे धार्मिकता के लिए जिलाए गए। यह उन पहचानों को स्पष्ट करता है जो यशायाह की अभिव्यक्तियों से मेल खाती हैं: कृपया उनके पापों के प्रतिफल के लिए वह गया, और हमारे उद्धार के लिए वह जिलाया गया।
संदर्भात्मक पृष्ठभूमि
रोमियों के पहले अध्याय से लेकर चौथे अध्याय तक पौलुस ने इब्राहीम के विश्वास-उद्धार के सिद्धांत को स्थापित किया है—यह स्पष्ट करता है कि धार्मिकता विश्वास के द्वारा मिलती है, न कि कानून के कर्मों से। यहाँ क्रूस पर मसीह का बलिदान हमारे अपराधों के लिए, और उनकी पुनर्जीवति हमारी righteousness के रूप में प्रस्तुत होती है। यशायाह 53 के छंद इस योजना की पंक्तियाँ हैं, जहाँ मसीह पर वह चोट पड़ती है जो हमारे अपराधों के लिए है, और उसकी सख्ती के बाद हमारा न्याय ठहरता है।
व्याख्यात्मक दृष्टिकोण
1) अपराधों के लिए पकड़वाया गया: मसीह ने हमारे स्थान पर दण्ड उठाया ताकि दुष्कर्मों का ब्योरा हमारे ऊपर से हट जाए। यह क्रिया प्रेम के गहरे समर्पण का परिणाम है।
2) धर्मी ठहरना: उसके कर्म से हमारे ऊपर न्याय की दृष्टि में धर्मी ठहराव आता है; यह न्याय की धारणा नहीं, बल्कि परमेश्वर की कृपा के कारण है जो विश्वास पर आधारित है।
3) यशायाह संदर्भ: 53 अध्याय में मसीह के कष्ट और अद्भुत आशीषों का संकेत है—उनके ज़ख्मों के लिए हम चंगा होते हैं। यह एक पूर्ण योजना है जिसमें मृत्यु के बाद जिलाव भी उद्धार का प्रमाण है।
छोटी थीमैटिक सूची
संबद्ध पद (संक्षिप्त संकेत)
यशायाह 53:5, 53:12—यह दोनों संकेत करते हैं कि मसीह के दुख और उनके कारण हमारे पापों का क्षोभ समाप्त होता है और उनकी महानता के कारण हम उद्धार पाते हैं।
निष्कर्षित व्यावहारिक अनुरोध
हम जो]="अधिकार-निष्ठा" के नाम पर अपने जीवन में विश्वास को बनाए रखें, वह मसीह के प्राप्त उद्धार की क़ीमत को समझते हुए प्रेम, नम्रता और सेवाभाव के साथ जीएं। धार्मिकता केवल तर्क नहीं, बल्कि नीचे उतरने वाले आत्म-समर्पण और विश्वास का परिणाम है।
क्रॉस-रेफ़रेंसे
1) रोमियों 3:28–29 — विश्वास से ही धर्मी ठहरना; कर्म से नहीं।
2) याकूब 2:24 — कर्म धर्मी ठहरते हैं; पर यह कर्म विश्वास से प्रेरित होते हैं।
3) 1 Corinthians 15:3–4 — मरकर जी उठना और उद्धार की गारंटी।
नोट: इस commentary को Matthew Henry, Albert Barnes, और Adam Clarke के सार्वजनिक-डोमेन विचारों से प्रेरित किन्तु मूल रूप से नया रूप दिया गया है; आवश्यक जगह पर उन्हीं के स्पष्ट उद्धरणों के छोटे-चोटे हिस्से लिए जा सकते थे—उनके पूरे वाक्यों का उद्धरण यहाँ संक्षेप में नहीं है, पर उनके प्रमुख निष्कर्षों का समन्वय किया गया है।