रोमियों 4:15 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका

व्यवस्था तो क्रोध उपजाती है और जहाँ व्यवस्था नहीं वहाँ उसका उल्लंघन भी नहीं।

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रोमियों 4:15 पद-दर-पद बाइबल टीका

रोमियों 4:15 पर टिप्पणी

पद का संदेहपूर्ण सूत्र यह दिखाता है कि व्यवस्था (मोराल कानून) के बिना अपराध-भाव संभव ही नहीं, और व्यवस्था के कारण ही उल्लंघन की परिभाषा उभरकर आती है। रोमियों की पंक्तियाँ इस बात पर प्रकाश डालती हैं कि ईश्वर की व्यवस्था कैसे मानव आचरण का संदर्भ बनती है: जहां कानून है, वहां उल्लंघन स्पष्ट होता है; और जहां कानून का इरादा पवित्र आज्ञा को मानना है, वहां क्रोध या दंड का खतरा रहता है। आवाज़ उठती है कि पाप की सच्ची प्रकृति कब और कैसे प्रकट होती है, जब नैतिक मानदंड पृथक्करण और उन्नति के साथ जुड़ते हैं।

मुख्य विचार

यह वचन ईश्वर की व्यवस्था के सम्मान और उसकी निष्कलंक मान्यता के साथ क्रोध के सापेक्ष एक स्पष्ट निष्कर्ष देता है। जब कानून नहीं होता, तब अपराध का तात्कालिक दंड नहीं दिखता; पर इसका वास्तविक प्रभाव यह है कि गलत राह पूर्व निर्धारित गति से बढ़ती नहीं, क्योंकि नैतिक विवेक अभी भी दुष्कर्म के विरुद्ध चेतावनी देता है। फिर भी शास्त्र का उद्देश्य कानून-उन्मुख दंड से अधिक है: पाप की स्थिति को पहचानना ताकि उद्धार के बारे में समझ और विश्वास जागृत हो।

केंद्रीय विषय

  • लौह-कानून बनाम आंतरिक विवेक: कानून बाह्य मानकों को स्थापित करते हैं, परन्तु आंतरिक विवेक से पाप की मिसालें उजागर होती हैं।
  • क्रोध और दंड का रिश्ता: व्यवस्था के कारण ही क्रोध का खतरा पैदा होता है—यह दंड के साथ जुड़ता है और उद्धार के लिए प्रेरणा बनता है।
  • धर्म और उद्धार का उद्देश्य: कानून-आधारित नैतिकता से कहीं आगे कि कृपा के द्वारा ही हम सच्चे विश्वास में खड़े होते हैं।

पवित्र तुलनियाँ एवं संदर्भ

यह विचार Romans के दूसरे अध्याय-तीसरे अध्याय से भी जुड़ता है, जहां कानून की भूमिका और पाप के बारे में गहराई से चर्चा है। उदाहरणतः यह दिखाता है कि क्रोध-उत्पत्ति कब और क्यों होती है, जब नैतिक मानक स्पष्ट हों। साथ ही, अन्य न्यू टेस्टामेंट कथनों में यह सिद्ध होता है कि उद्धार केवल कानून के कारण नहीं, बल्कि ईश्वर की कृपा से है।

व्यावहारिक चिंतन

हम कैसे इसकo अपनी दिनचर्या में लागू करें? कानून-संदेह से डरना नहीं, परन्तु दयालुता और नम्रता के साथ पालन समझना। जब हम पाप की प्रकृति को पहचानते हैं, तब ईश्वर की कृपा से उद्धार की योजना में विश्वास दृढ़ होता है। जीवन के निर्णयों में नैतिक दायित्व स्पष्ट होते हैं, और उद्धार की दिशा में गति मिलती है।

-cross-reference संकेत

1) रोमियों 3:20 — कानून के कर्म के अनुसार किसी को धर्मी ठहरना संभव नहीं; सिर्फ विश्वास से उद्धार संभव है।

2) पतरस 1:25 — विश्वास से प्रभावी परिवर्तन होता है, क्योंकि वचन स्थिर है।

3) गैलातियों 3:24 — Law जैसा शिक्षक है जो मसीह तक पहुँचने का मार्ग बनता है।

संक्षिप्त निष्कर्ष

वचन बताता है कि व्यवस्था क्रोध को जन्म देती है क्योंकि वह पाप के विरुद्ध स्पष्ट मानक रखती है; परन्तु उद्धार ईश्वरीय कृपा और विश्वास से आता है। इस प्रकाश में, नैतिकता केवल कानून की सीमा तक नहीं रुकती, बल्कि आत्म-परिवर्तन और विश्वास की जीवनशैली का प्रवेश पाती है।

ध्यान दिलाने योग्य उद्धरण (यदि उपलब्ध):

Matthew Henry, Albert Barnes, Adam Clarke के संरक्षित वाक्यों में से निम्नाकित छोटे अंश उपलब्ध हैं—"कानून क्रोध का कारण बनता है" (संकेत) और "उद्धार विश्वास से है, कानून के कारण नहीं"—ये विचार हमारी समेकित व्याख्या का आधार बनते हैं।

*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।

रोमियों 4:15 समानांतर पद और संबंधित वचन

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क्योंकि व्यवस्था के दिए जाने तक पाप जगत में तो था, परन्तु जहाँ व्यवस्था नहीं, वहाँ पाप गिना नहीं जाता।

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गलातियों 3:10 (HINIRV) »
अतः जितने लोग व्यवस्था के कामों पर भरोसा रखते हैं, वे सब श्राप के अधीन हैं, क्योंकि लिखा है, “जो कोई व्यवस्था की पुस्तक में लिखी हुई सब बातों के करने में स्थिर नहीं रहता, वह श्रापित है।” (याकू. 2:10,12, व्य. 27:26)

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हम जानते हैं, कि व्यवस्था जो कुछ कहती है उन्हीं से कहती है, जो व्यवस्था के अधीन हैं इसलिए कि हर एक मुँह बन्द किया जाए, और सारा संसार परमेश्‍वर के दण्ड के योग्य ठहरे।

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