Old Testament
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यशायाह 1 यशायाह 2 यशायाह 3 यशायाह 4 यशायाह 5 यशायाह 6 यशायाह 7 यशायाह 8 यशायाह 9 यशायाह 10 यशायाह 11 यशायाह 12 यशायाह 13 यशायाह 14 यशायाह 15 यशायाह 16 यशायाह 17 यशायाह 18 यशायाह 19 यशायाह 20 यशायाह 21 यशायाह 22 यशायाह 23 यशायाह 24 यशायाह 25 यशायाह 26 यशायाह 27 यशायाह 28 यशायाह 29 यशायाह 30 यशायाह 31 यशायाह 32 यशायाह 33 यशायाह 34 यशायाह 35 यशायाह 36 यशायाह 37 यशायाह 38 यशायाह 39 यशायाह 40 यशायाह 41 यशायाह 42 यशायाह 43 यशायाह 44 यशायाह 45 यशायाह 46 यशायाह 47 यशायाह 48 यशायाह 49 यशायाह 50 यशायाह 51 यशायाह 52 यशायाह 53 यशायाह 54 यशायाह 55 यशायाह 56 यशायाह 57 यशायाह 58 यशायाह 59 यशायाह 60 यशायाह 61 यशायाह 62 यशायाह 63 यशायाह 64 यशायाह 65 यशायाह 66



यशायाह 2:20 परिहाषा: परलोक की नयी दृष्टि
यह शास्त्रोच्चारण वह क्षण बताता है जब प्रभु के दिन का भोर जब लोग अपनी पापी सत्ता से मुक्त हो जाते हैं, तब वे अपनी दूसरे प्रकार के पाप-हार पर आहुति दे देंगे—चाँदी-सोने की मूर्तियाँ, जिन्हें उन्होंने दण्डवत करने के लिए बनाया था। यह verse यह दिखाता है कि अदृश्य सत्ता पर निर्भर रहने वाले लोग अपने उद्धारकर्ता को छोड़ कर ध्वस्त पदार्थों के पीछे दौड़ते हैं, पर अंततः इन मूर्तियों की कोई सुरक्षा नहीं है।
परिचयात्मक संदर्भ
यह पद यशायाह की आस्था-संदेश के शिखर में है जहाँ भविष्य के परमेश्वर के राज्य की स्थापना की भविष्यवाणी की गई है। मिस्र, बबीलोन, और अन्य जातियों की मूर्तिपूजा के विरुद्ध एक निर्णायक चेतावनी है कि जब क्रियात्मक कठोरता घटेगी, तब लोग बने बनाए पापों से दूर नहीं रह पाएंगे; वे अपनी मूर्तियों को भी छोड़ देंगे क्योंकि वे केवल छलावे हैं।
मूल संदेश
यही है: भय, उद्गार, और गर्व की स्थिति में भी, प्रभु के सामने आत्म-समर्पण और निरंतरता चाहिए। उस दिन, लोग अपने धन-सम्पत्ति की कल्पनाओं के प्रतीकों को भी नहीं बचा पाएंगे; वे उन्हें छौना-छछून्दरों और चमगादड़ों के आगे फेंक देंगे—एक तरह के प्रतीकात्मक विनाश और व्यर्थ आश्रय के त्याग की दिशा में। यह उद्धार की परिप्रेक्ष्य से एक स्पष्ट सन्देश है कि परमेश्वर की महिमा से ज्यादा कुछ नहीं टिकता; लोग अपने मन से निर्भर रहते हैं, पर प्रभु ही वास्तविक ठिकाना है।
उद्धार-उपमा और बल्वन
यह verses एक गहरी पवित्रता-उत्पलन का संकेत देती है: जब ईश्वर के राज्य का प्रकाश पूरी तरह फैलता है, तब मूर्तिपूजा की असुरक्षा उजागर हो जाती है। यह एक प्रकार का निर्णय-परिणाम है जिसे भक्ति और दया से भरे जीवन में घुलना चाहिए।
क्रॉस-रेफरेंस (संभावित लिंकिंग और संक्षिप्त स्पष्टीकरण)
हिंदी में प्रकाशित यह विचार
1) सच्चा बचाव कहाँ है? प्रभु की कृपा में, न कि मनुष्य की संपत्ति या उपकरणों में। 2) भय और गर्व के समय भी, हमें अपनी आशाओं को परमेश्वर के विरुद्ध नहीं बल्कि उसके वचनों के अनुरूप बनाये रखना चाहिए। 3) अंतिम समय में जो धनी-हानी है, वह हर प्रकार की मूर्ति के पीछे नहीं बचती; केवल ईश्वर की सत्ता ही स्थिर रहती है।
देवotional स्मरण
रोशनी से परे, प्रभु के चेहरे की गर्माहट में स्थिर रहें। जो कुछ भी धन-संपदा या पद-प्रतिष्ठा ने हमें दिया, उसे छोड़ कर केवल उसी के सामने झुकना है जो सबका मालिक है। हर दिन अपने हृदय की मूर्तियों की जाँच करें: क्या आप भी किसी अहंकारी विचार, किसी दिखावे, या किसी वैचारिक मोह में फँसे हैं? ईश्वर के प्रकाश में आते ही ये मूर्तियाँ निर्थurk हो जाएँगी; तब केवल परमेश्वर की महिमा सुरक्षित रहेगी।