यशायाह 40:21 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका

क्या तुम नहीं जानते? क्या तुमने नहीं सुना? क्या तुमको आरम्भ ही से नहीं बताया गया? क्या तुमने पृथ्वी की नींव पड़ने के समय ही से विचार नहीं किया?

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यशायाह 40:21 पद-दर-पद बाइबल टीका

यशायाह 40:21 का अर्थ स्पष्ट रूप से

इस पद का सीधा meaning है: प्रभु परमेश्वर के आरम्भ से सृष्टि-योजना और पृथ्वी की नींव डालने के समय से ही वे पूर्ण ज्ञान और सत्ता के साथ हैं। नज़रें उठाने पर उद्धारकर्ता-प्रभु कौन हैं—यही पंक्ति उनका परिचय कराती है: वे पहले से सुनाई दे चुके सत्य, सूर्य-चन्द्र जैसे रचित ब्रह्मांड के पीछे के केंद्र-कर्ता हैं। यहां यह प्रेरित किया गया है कि ईश्वर के प्रभाव और ज्ञान के विशालता को उन पर टिकाकर कर्म करना चाहिए।

पृष्ठभूमि और पाठ-संदर्भ

यशायाह का यह भाग मर्सिया-नवजीवन के समय की विपरीत परिस्थितियों के बीच परमेश्वर की महानता की गवाही देता है। पाठक उस अनंत दृष्टि को याद करे जो सृजन के आरम्भ से वह जानता है और जो भविष्य के उद्धार-कार्य को भी संचालित करता है। यह प्रसंग ईश्वर की सपूर्ण अधिकारिता और विश्वासयोग्यता को स्मरण कराता है कि वे कभी नहीं बदलते।

व्याख्यात्मक अवलोकन

  • पहचान की मांग: परमेश्वर अपने समर्थक बनाम नास्तिकों के प्रश्नों के उत्तर में यह स्मरण कराते हैं कि वे आरम्भ से जानते हैं और शालीनता से निभाते हैं।
  • भरोसे की पहल: यह वचन विश्वासियों को राह दिखाता है कि संसार की सतह पर हो रहे बदलावों के बीच भी ईश्वर का स्थिरत्व और योजना पूरक है।
  • उद्धार-आशा का आधार: सृष्टि-नींव के दृश्य से प्रेरित होकर ईश्वर के भरोसे से आगे बढ़ना उचित ठहरता है।

मुख्य विचार

  1. ईश्वर का आरम्भ से ज्ञान: वे जानते थे, जानते हैं और जानेंगे—किसी भी समय, किसी भी परिस्थिति में उनका ज्ञान अप्राप्त नहीं।
  2. सृष्टि-नींव का स्मरण: पृथ्वी की रचना के समय से विचार होना—यही उनकी स्थिरता और शक्ति का प्रमाण है।
  3. विश्वास की उत्तेजना: इस ज्ञान से प्रेरित होकर भक्त को कठिनाई में भी धैर्य और आशा मिलती है।

संदर्भित क्रॉस-रेफरेंसे

1) यशायाह 46:9-10 — प्रभु बताता है कि उसने आरम्भ से क्या किया है और अंत तक क्या होगा; यह समान विचारधारा दर्शाता है कि परमेश्वर की योजना सभी समयों के ऊपर है।

2) रोमियों 11:33-34 — परमेश्वर की योजना-गंभीरता और उसकी बुद्धि का अनंतत्व; हमें उसकी महिमा में अचंभा होता है कि कौन उसकी परखा-समझ सकता है।

3) मत्ती 11:28-30 — ईश्वर के ज्ञान और विश्राम पर विश्वास करते हुए यीशु शान्ति और क्षमा की राह बताते हैं; यह पद आत्म-विश्वास की दिशा दिखाता है।

अन्य टिप्पणीकारों के संक्षिप्त निष्कर्ष

हार्ने-हैंडर: सृजन के समय से ईश्वर के बढ़ते ज्ञान का स्मरण, विश्वासियों के लिए स्थिरता का स्रोत।

एडम क्लार्क: यह वचन प्रभु के अनंत ज्ञान और सत्ता की ओर संकेत करता है, ताकि विपरीत परिस्थितियों में भी मानवीय समझौतों से ऊपर उठकर आशा बनी रहे।

मैथ्यू हेनरी (संक्षेप): परमेश्वर की स्थापना और क्रिया-प्रणाली की पुष्टि है; वे पुराने राज-कार्य के अनुसार ही उद्धार को पूरा करेंगे।

संक्षिप्त प्रायोगिक Takeaway

जब भी हमारे चारों ओर संदेह और प्रश्न उठें, याद रखें कि परमेश्वर आरम्भ से जानते हैं और योजनाबद्ध तरीके से क्रिया करते हैं। उनकी अखंड विश्वासयोग्यता हमारे लिए नियोजन और धैर्य की mhaka है, इसलिए हमें उनके निर्देशन में आगे बढ़ना चाहिए।

धार्मिक उपागम के मुताबिक सावधानी

यद्यपि यह Verse विशिष्ट रूप से ईश्वर की क्षमता पर प्रकाश डालता है, परंतु हमें अपने विश्वास में संतुलन बनाए रखना चाहिए—न कि किसी प्रकार के निर्भय भयो-रुखेपन से। साहचर्य, प्राथना, और पवित्र जीवन से हम इस सत्य को अपने जीवन में स्थिर कर सकते हैं।

*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।

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