Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीChapter
यशायाह 1 यशायाह 2 यशायाह 3 यशायाह 4 यशायाह 5 यशायाह 6 यशायाह 7 यशायाह 8 यशायाह 9 यशायाह 10 यशायाह 11 यशायाह 12 यशायाह 13 यशायाह 14 यशायाह 15 यशायाह 16 यशायाह 17 यशायाह 18 यशायाह 19 यशायाह 20 यशायाह 21 यशायाह 22 यशायाह 23 यशायाह 24 यशायाह 25 यशायाह 26 यशायाह 27 यशायाह 28 यशायाह 29 यशायाह 30 यशायाह 31 यशायाह 32 यशायाह 33 यशायाह 34 यशायाह 35 यशायाह 36 यशायाह 37 यशायाह 38 यशायाह 39 यशायाह 40 यशायाह 41 यशायाह 42 यशायाह 43 यशायाह 44 यशायाह 45 यशायाह 46 यशायाह 47 यशायाह 48 यशायाह 49 यशायाह 50 यशायाह 51 यशायाह 52 यशायाह 53 यशायाह 54 यशायाह 55 यशायाह 56 यशायाह 57 यशायाह 58 यशायाह 59 यशायाह 60 यशायाह 61 यशायाह 62 यशायाह 63 यशायाह 64 यशायाह 65 यशायाह 66Verse
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यशायाह 40:21 का अर्थ स्पष्ट रूप से
इस पद का सीधा meaning है: प्रभु परमेश्वर के आरम्भ से सृष्टि-योजना और पृथ्वी की नींव डालने के समय से ही वे पूर्ण ज्ञान और सत्ता के साथ हैं। नज़रें उठाने पर उद्धारकर्ता-प्रभु कौन हैं—यही पंक्ति उनका परिचय कराती है: वे पहले से सुनाई दे चुके सत्य, सूर्य-चन्द्र जैसे रचित ब्रह्मांड के पीछे के केंद्र-कर्ता हैं। यहां यह प्रेरित किया गया है कि ईश्वर के प्रभाव और ज्ञान के विशालता को उन पर टिकाकर कर्म करना चाहिए।
पृष्ठभूमि और पाठ-संदर्भ
यशायाह का यह भाग मर्सिया-नवजीवन के समय की विपरीत परिस्थितियों के बीच परमेश्वर की महानता की गवाही देता है। पाठक उस अनंत दृष्टि को याद करे जो सृजन के आरम्भ से वह जानता है और जो भविष्य के उद्धार-कार्य को भी संचालित करता है। यह प्रसंग ईश्वर की सपूर्ण अधिकारिता और विश्वासयोग्यता को स्मरण कराता है कि वे कभी नहीं बदलते।
व्याख्यात्मक अवलोकन
मुख्य विचार
संदर्भित क्रॉस-रेफरेंसे
1) यशायाह 46:9-10 — प्रभु बताता है कि उसने आरम्भ से क्या किया है और अंत तक क्या होगा; यह समान विचारधारा दर्शाता है कि परमेश्वर की योजना सभी समयों के ऊपर है।
2) रोमियों 11:33-34 — परमेश्वर की योजना-गंभीरता और उसकी बुद्धि का अनंतत्व; हमें उसकी महिमा में अचंभा होता है कि कौन उसकी परखा-समझ सकता है।
3) मत्ती 11:28-30 — ईश्वर के ज्ञान और विश्राम पर विश्वास करते हुए यीशु शान्ति और क्षमा की राह बताते हैं; यह पद आत्म-विश्वास की दिशा दिखाता है।
अन्य टिप्पणीकारों के संक्षिप्त निष्कर्ष
हार्ने-हैंडर: सृजन के समय से ईश्वर के बढ़ते ज्ञान का स्मरण, विश्वासियों के लिए स्थिरता का स्रोत।
एडम क्लार्क: यह वचन प्रभु के अनंत ज्ञान और सत्ता की ओर संकेत करता है, ताकि विपरीत परिस्थितियों में भी मानवीय समझौतों से ऊपर उठकर आशा बनी रहे।
मैथ्यू हेनरी (संक्षेप): परमेश्वर की स्थापना और क्रिया-प्रणाली की पुष्टि है; वे पुराने राज-कार्य के अनुसार ही उद्धार को पूरा करेंगे।
संक्षिप्त प्रायोगिक Takeaway
जब भी हमारे चारों ओर संदेह और प्रश्न उठें, याद रखें कि परमेश्वर आरम्भ से जानते हैं और योजनाबद्ध तरीके से क्रिया करते हैं। उनकी अखंड विश्वासयोग्यता हमारे लिए नियोजन और धैर्य की mhaka है, इसलिए हमें उनके निर्देशन में आगे बढ़ना चाहिए।
धार्मिक उपागम के मुताबिक सावधानी
यद्यपि यह Verse विशिष्ट रूप से ईश्वर की क्षमता पर प्रकाश डालता है, परंतु हमें अपने विश्वास में संतुलन बनाए रखना चाहिए—न कि किसी प्रकार के निर्भय भयो-रुखेपन से। साहचर्य, प्राथना, और पवित्र जीवन से हम इस सत्य को अपने जीवन में स्थिर कर सकते हैं।