Old Testament
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यशायाह 1 यशायाह 2 यशायाह 3 यशायाह 4 यशायाह 5 यशायाह 6 यशायाह 7 यशायाह 8 यशायाह 9 यशायाह 10 यशायाह 11 यशायाह 12 यशायाह 13 यशायाह 14 यशायाह 15 यशायाह 16 यशायाह 17 यशायाह 18 यशायाह 19 यशायाह 20 यशायाह 21 यशायाह 22 यशायाह 23 यशायाह 24 यशायाह 25 यशायाह 26 यशायाह 27 यशायाह 28 यशायाह 29 यशायाह 30 यशायाह 31 यशायाह 32 यशायाह 33 यशायाह 34 यशायाह 35 यशायाह 36 यशायाह 37 यशायाह 38 यशायाह 39 यशायाह 40 यशायाह 41 यशायाह 42 यशायाह 43 यशायाह 44 यशायाह 45 यशायाह 46 यशायाह 47 यशायाह 48 यशायाह 49 यशायाह 50 यशायाह 51 यशायाह 52 यशायाह 53 यशायाह 54 यशायाह 55 यशायाह 56 यशायाह 57 यशायाह 58 यशायाह 59 यशायाह 60 यशायाह 61 यशायाह 62 यशायाह 63 यशायाह 64 यशायाह 65 यशायाह 66



मुख्य व्याख्या बिंदु
यशायाह 53:10 का प्रमुख संदेश यह है कि परमेश्वर के उद्धारकार्य में दुःख और बलिदान एक सुव्यवस्थित योजना का भाग हैं। प्रभु की पीड़ा से अनुदानित चिकित्सा और वसूली का मार्ग खुलता है: उसने उसे रोगी किया, ताकि वह दोषबल से होकर, अपनी redirected जीवन से भविष्य के पेड़ पर चढ़े और लोग उसकी प्रवृत्ति से बहुधा लाभ पाएं। यह आयकमित्र-भक्ति नहीं, बल्कि योजनाबद्ध सन्तान के लिए एक अपरिहार्य मार्ग है—यह प्रभु की इच्छा पूरी करने वाला है।
पाठ्य-संदर्भ (साहित्यिक संदर्भ)
कुल मिलाकर यह अध्याय ग़ज़ब का एक दिग्दर्शन प्रस्तुत करता है—कष्ट द्वारा चिह्नित एक सेवक, जो जनता के लिए इमानदारी और धर्मप्रियता के आदर्श को स्थापित करता है। यहाँ दुःख का प्रभाव लक्ष्य है: क्रियात्मक रूप से रोगी बनना, ताकि उसमें जीवन का एक नया गुण उभरे—प्रभु की इच्छा पूरी हो और वह बहुत दिनों तक जीवित रहे।
धर्मशास्त्रीय महत्व
यह उद्धार का चिंतन है कि पीड़ा और शांति एक साथ चलती हैं। पाठ स्पष्ट करता है कि प्रभु के कष्ट मात्र शारीरिक नहीं, बल्कि योग्यतात्मक हैं: दोषक्षमता के लिए नहीं, बल्कि मानवता की पीड़ा को सहन कर उसे भीतर से चंगा कर देना। इससे यह सिद्ध होता है कि परमेश्वर की योजना मानव पाप के घातक परिणामों को हराने के लिए है, और यह सब आख़िरकार उस द्वारा संचालित है।
क्रॉस-रेफरेंसेस (संक्षिप्त संदर्भ विवरण)
संक्षेप में, इन संदर्भों से यह स्पष्ट होता है कि दुःख की यह योजना उद्धार के लिए आवश्यक है, न कि निषेध या हार का पुरस्कार।
आत्म-विचार के प्रश्न
संक्षिप्त निष्कर्ष
53:10 में परमेश्वर की इच्छा—दुख के मार्ग से भी—उद्धार का मार्ग दिखाती है। यह शास्त्र हमारे begrip को बताती है कि कैसे न केवल प्रभु ने पीड़ा को सहा, बल्कि उससे इंसान के लिए चंगा करने का रास्ता खोल दिया। इसलिए विश्वासयोग्य को यह सुनिश्चित रहना चाहिए कि साथ-साथ बलिदान, दया और जीवित आशा सब मिलती हैं।
एतिहासिक-अनुकरणीय संदर्भ से एकत्रित उद्धरण (उद्धरण चेतावनी)
यह भाग किसी पुराने सार्वजनिक-डোমेन टिप्पणीकार से सीधे उद्धरणों के तौर पर सक्षम नहीं है, पर इन विचारों में Matthew Henry, Albert Barnes एवं Adam Clarke की संक्षिप्त सार-रेखा उपयोगी ठहरती है।
याद रहे: नीचे दिये गए प्रसिद्ध उद्धरणों को संक्षेप में दोहराया गया है और पूर्ण पद्यों का पाठ नहीं दिया गया है। यदि आप चाहें तो मैं हर टिप्पणीकार के प्रासंगिक संक्षेप उद्धरण को विस्तार से दे सकता/सकती हूँ।