यशायाह 59:18 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका

उनके कर्मों के अनुसार वह उनको फल देगा, अपने द्रोहियों पर वह अपना क्रोध भड़काएगा और अपने शत्रुओं को उनकी कमाई देगा; वह द्वीपवासियों को भी उनकी कमाई भर देगा। (जक. 17:10, प्रका. 20:12,13, नहू. 1:2, प्रका. 22:12)

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यशायाह 59:18 पद-दर-पद बाइबल टीका

यशायाह 59:18 का अर्थ और उद्देश्य

इस पद में परमेश्वर के न्याय की स्पष्ट प्रकृति प्रस्तुत है: परमेश्वर हर कर्म के अनुसार फल देता है—जो लोग दुष्कर्म करते हैं वे उसे भोगते हैं, और जो साहसिक धैर्य के साथ उसकी सेवा में रहते हैं, उन्हें आशीष और प्रतिफल मिलता है। यह उद्धारकर्ता-युग की न्याय-घटना का भाग है, जिसमें परमेश्वर शत्रुओं पर क्रोध की शक्तिशाली बरसात चलाते हैं और उनकी कमाई—यानी उनके शब्द, कर्म, और प्रभाव—के अनुसार परिणाम देते हैं।

साहित्यिक संदर्भ के बारे में

पद 59:18 एक ऐसी कल्पना प्रदान करता है जिसमें दुष्टों के विरुद्ध एक निर्णायक क्रोध का दृश्य है, और साथ ही यह संकेत है कि सभी जातियों, द्वीपों, और सामाजिक समूहों तक परमेश्वर का न्याय पहुँचेगा। यह तख्ती है कि परमेश्वर की योजना पूरी दुनिया के लिये न्यायपूर्ण है, न कि केवल एक सीमित समूह के लिए।

धार्मिक significance

यह वाक्य ग़ौर करने योग्य है क्योंकि यह बताता है कि ईश्वर न केवल दया दिखाते हैं बल्कि उनके क्रोध और न्याय भी स्थितियों के अनुसार प्रकट होते हैं। यह प्रभु के अनुशासन और उद्धार के बीच एक संतुलन दर्शाता है: वे गलत के विरुद्ध कठोर हैं ताकि अच्छाई का अस्त्र बना रहे।

अन्य शास्त्रीय विचारों के साथ तारतम्य

पूर्वकथित विचारों के अनुसार: जाकरे 17:10 और निहू 1:2-3 जैसे पाठ यह संकेत करते हैं कि परमेश्वर के क्रोध और विजय उनके उच्च मानदंडों के अनुरूप होते हैं। इस संदर्भ में प्रकाशित वचन यह बताते हैं कि लोक-कल्याण के लिए न्याय और दया दोनों अनिवार्य हैं।

संयुक्त विचार—एक समेकित समझ

यह verse एक ऐसे दायरे का उद्घाटन करता है जहां दुष्टों के कर्म उनके परिणाम बनते हैं, जबकि परमेश्वर की रक्षा और पुरस्कार उन पर नहीं टिके रहते जो विश्वास में टिके रहते हैं। यह उद्धार के आसरे के साथ न्याय की ठोस याद दिलाता है: परमेश्वर हर ओर से प्रतिदान देंगें—परमेश्वर के लोगों के लिये शांति और न्याय, और दुष्टों के लिये उनकी गलतियों के अनुसार उत्तरदायित्व।

आंतरिक संदर्भ और क्रॉस-रेफरेंसेस

  • यशायाह 59:2-3: पाप और ढाल बनकर भ्रष्ट कर डालते हैं; परन्तु परमेश्वर न्याय के साथ प्रतिक्रिया करते हैं।
  • याकूब 1:12 के साथ प्रेरणा: धैर्य धर लेने वाला आशीष पाता है, क्योंकि संहार के बाद भी परमेश्वर का प्रतिदान रहता है।
  • प्रकाशितवाक्य 22:12: हर छोड़-छोड़ कर्म के अनुसार प्रतिफल आने का तर्क—न्यायपूर्ण अंत के वास्ते।

हर क्रिया के पीछे एक परिणाम है, और हर परिणाम परमेश्वर की सम्पूर्णता और धर्मपरायणता को प्रकट करता है।

हमें से क्या पूछना चाहिए

  • क्या मैं अपने व्यवहार में ईश्वर के न्याय और दया के संतुलन को ठीक से अनुभव कर रहा हूँ?
  • क्या मेरे निर्णय दूसरों के लिए ईश्वरीय परिणामों की दिशा तय कर रहे हैं?

संक्षिप्त निष्कार

यशायाह 59:18 संकेत देता है कि परमेश्वर के न्याय के फल सृष्टि के हर क्षेत्र में लागू होते हैं—िक यह दुष्टों पर क्रोध की वेग से और उनके विरुद्ध गतिविधियों के अनुसार प्रतिफल देता है, जबकि भले लोग विश्वास और निर्भयता के साथ उसे मानते रहते हैं।

महत्वपूर्ण उद्धरण जिन्हें उपलब्ध है (पूर्व-प्रकाशन):

“येशु के उद्धार के साथ न्याय भी आना चाहिए।” — Matthew Henry (उद्धृत संक्षेप)

“परमेश्वर का क्रोध और उसकी दया एक साथ चलते हैं; उसकी योजना पूरी दुनिया के लिए है।” — Albert Barnes (उद्धृत संक्षेप)

“हर कर्म के अनुसार प्रतिफल—यह परमेश्वर की महानता की पुष्टि है।” — Adam Clarke (उद्धृत संक्षेप)

संक्षिप्त निष्कर्ष

59:18 बताता है कि परमेश्वर न्याय का परिचायक हैं और उनका दया तथा क्रोध दोनों योग से चलता है। यह पाठ हमें अपने जीवन में पवित्रता और विश्वास की दृढ़ता बनाए रखने के लिए प्रेरित करता है, ताकि हमारा कर्म-फल ईश्वर की सच्चाई के अनुरूप हो।

*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।

यशायाह 59:18 समानांतर पद और संबंधित वचन

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हाँ, मैंने अपने क्रोध में आकर देश-देश के लोगों को लताड़ा, अपनी जलजलाहट से मैंने उन्हें मतवाला कर दिया, और उनके लहू को भूमि पर बहा दिया।” अनुग्रह का स्मरण

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“मैं यहोवा मन को खोजता और हृदय को जाँचता हूँ ताकि प्रत्येक जन को उसकी चाल-चलन के अनुसार अर्थात् उसके कामों का फल दूँ।” (1 पत. 1:17, प्रका. 2:23, प्रका. 20:12,13, प्रका. 22:12)

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वह मनुष्य की करनी का फल देता है, और प्रत्येक को अपनी-अपनी चाल का फल भुगताता है।

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