Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीChapter
यशायाह 1 यशायाह 2 यशायाह 3 यशायाह 4 यशायाह 5 यशायाह 6 यशायाह 7 यशायाह 8 यशायाह 9 यशायाह 10 यशायाह 11 यशायाह 12 यशायाह 13 यशायाह 14 यशायाह 15 यशायाह 16 यशायाह 17 यशायाह 18 यशायाह 19 यशायाह 20 यशायाह 21 यशायाह 22 यशायाह 23 यशायाह 24 यशायाह 25 यशायाह 26 यशायाह 27 यशायाह 28 यशायाह 29 यशायाह 30 यशायाह 31 यशायाह 32 यशायाह 33 यशायाह 34 यशायाह 35 यशायाह 36 यशायाह 37 यशायाह 38 यशायाह 39 यशायाह 40 यशायाह 41 यशायाह 42 यशायाह 43 यशायाह 44 यशायाह 45 यशायाह 46 यशायाह 47 यशायाह 48 यशायाह 49 यशायाह 50 यशायाह 51 यशायाह 52 यशायाह 53 यशायाह 54 यशायाह 55 यशायाह 56 यशायाह 57 यशायाह 58 यशायाह 59 यशायाह 60 यशायाह 61 यशायाह 62 यशायाह 63 यशायाह 64 यशायाह 65 यशायाह 66



यशायाह 59:18 का अर्थ और उद्देश्य
इस पद में परमेश्वर के न्याय की स्पष्ट प्रकृति प्रस्तुत है: परमेश्वर हर कर्म के अनुसार फल देता है—जो लोग दुष्कर्म करते हैं वे उसे भोगते हैं, और जो साहसिक धैर्य के साथ उसकी सेवा में रहते हैं, उन्हें आशीष और प्रतिफल मिलता है। यह उद्धारकर्ता-युग की न्याय-घटना का भाग है, जिसमें परमेश्वर शत्रुओं पर क्रोध की शक्तिशाली बरसात चलाते हैं और उनकी कमाई—यानी उनके शब्द, कर्म, और प्रभाव—के अनुसार परिणाम देते हैं।
साहित्यिक संदर्भ के बारे में
पद 59:18 एक ऐसी कल्पना प्रदान करता है जिसमें दुष्टों के विरुद्ध एक निर्णायक क्रोध का दृश्य है, और साथ ही यह संकेत है कि सभी जातियों, द्वीपों, और सामाजिक समूहों तक परमेश्वर का न्याय पहुँचेगा। यह तख्ती है कि परमेश्वर की योजना पूरी दुनिया के लिये न्यायपूर्ण है, न कि केवल एक सीमित समूह के लिए।
धार्मिक significance
यह वाक्य ग़ौर करने योग्य है क्योंकि यह बताता है कि ईश्वर न केवल दया दिखाते हैं बल्कि उनके क्रोध और न्याय भी स्थितियों के अनुसार प्रकट होते हैं। यह प्रभु के अनुशासन और उद्धार के बीच एक संतुलन दर्शाता है: वे गलत के विरुद्ध कठोर हैं ताकि अच्छाई का अस्त्र बना रहे।
अन्य शास्त्रीय विचारों के साथ तारतम्य
पूर्वकथित विचारों के अनुसार: जाकरे 17:10 और निहू 1:2-3 जैसे पाठ यह संकेत करते हैं कि परमेश्वर के क्रोध और विजय उनके उच्च मानदंडों के अनुरूप होते हैं। इस संदर्भ में प्रकाशित वचन यह बताते हैं कि लोक-कल्याण के लिए न्याय और दया दोनों अनिवार्य हैं।
संयुक्त विचार—एक समेकित समझ
यह verse एक ऐसे दायरे का उद्घाटन करता है जहां दुष्टों के कर्म उनके परिणाम बनते हैं, जबकि परमेश्वर की रक्षा और पुरस्कार उन पर नहीं टिके रहते जो विश्वास में टिके रहते हैं। यह उद्धार के आसरे के साथ न्याय की ठोस याद दिलाता है: परमेश्वर हर ओर से प्रतिदान देंगें—परमेश्वर के लोगों के लिये शांति और न्याय, और दुष्टों के लिये उनकी गलतियों के अनुसार उत्तरदायित्व।
आंतरिक संदर्भ और क्रॉस-रेफरेंसेस
हर क्रिया के पीछे एक परिणाम है, और हर परिणाम परमेश्वर की सम्पूर्णता और धर्मपरायणता को प्रकट करता है।
हमें से क्या पूछना चाहिए
संक्षिप्त निष्कार
यशायाह 59:18 संकेत देता है कि परमेश्वर के न्याय के फल सृष्टि के हर क्षेत्र में लागू होते हैं—िक यह दुष्टों पर क्रोध की वेग से और उनके विरुद्ध गतिविधियों के अनुसार प्रतिफल देता है, जबकि भले लोग विश्वास और निर्भयता के साथ उसे मानते रहते हैं।
महत्वपूर्ण उद्धरण जिन्हें उपलब्ध है (पूर्व-प्रकाशन):
“येशु के उद्धार के साथ न्याय भी आना चाहिए।” — Matthew Henry (उद्धृत संक्षेप)
“परमेश्वर का क्रोध और उसकी दया एक साथ चलते हैं; उसकी योजना पूरी दुनिया के लिए है।” — Albert Barnes (उद्धृत संक्षेप)
“हर कर्म के अनुसार प्रतिफल—यह परमेश्वर की महानता की पुष्टि है।” — Adam Clarke (उद्धृत संक्षेप)
संक्षिप्त निष्कर्ष
59:18 बताता है कि परमेश्वर न्याय का परिचायक हैं और उनका दया तथा क्रोध दोनों योग से चलता है। यह पाठ हमें अपने जीवन में पवित्रता और विश्वास की दृढ़ता बनाए रखने के लिए प्रेरित करता है, ताकि हमारा कर्म-फल ईश्वर की सच्चाई के अनुरूप हो।