यशायाह 66:2 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका

यहोवा की यह वाणी है, ये सब वस्तुएँ मेरे ही हाथ की बनाई हुई हैं, इसलिए ये सब मेरी ही हैं। परन्तु मैं उसी की ओर दृष्टि करूँगा जो दीन और खेदित मन* का हो, और मेरा वचन सुनकर थरथराता हो। (भज. 34:18, मत्ती5:3)

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यशायाह 66:2 पद-दर-पद बाइबल टीका

यशायाह 66:2 का भावार्थ और संदर्भ

यह वचन कहता है: यहोवा सब कुछ अपनी कृपा-हाथ से बनाया है, इसलिए सब उसकी ही हैं। किन्तु वह अपना ध्यान उन दीन-खेदित आत्माओं पर देता है जो विनम्रता से उसकी ओर देखते हैं और वचन का पालन करके थरथराते हैं।

परिपूरक संदर्भ

यशायाह का यह भाग अंत-युग की अभिव्यक्ति हेतु है—निर्णय, न्याय और उन्नत आध्यात्मिक स्थिति के बारे में। बाल-भक्ति, दयालुता, और नम्रता के साथ परमेश्वर के सामने रहने की मांग यहाँ प्रमुख है। यह ओढ़ना नहीं, बल्कि वास्तविक भाव-स्थिति है: मन का दीनापन, बेचैनी, और परमेश्वर के वचन के प्रति आस्था। भजनों 34:18 और मत्ती 5:3 का संदर्भ संकेत देता है कि ईश्वर उन लोगों की ओर ध्यान देते हैं जो भली-भांति टूटे दिल के साथ आते हैं।

वान् धारणाएं और निरीक्षण

  • ईश्वर की रचना-शक्ति स्पष्ट है—सब कुछ उसी ने बनाया है, इसलिए सत्ता उसकी है।
  • परमेश्वर उनहे की ओर योग्य दृष्टि डालते हैं जो दीन हैं, खेदित मन से आते हैं, और वचन को सुनकर कांपते हैं।
  • यह दीनता केवल बाहरी दिखावा नहीं है; यह हृदय-स्थिति है जो विश्वास, विनम्रता और विनोद के साथ जुड़ी है।

मुख्य थीमैटिक बिंदु

  1. स्वामित्व और अधिकार: सब कुछ परमेश्वर के हाथ की रचना है; हमारा ठहराव उसी के अधिकार में है।
  2. दीनता की भक्ति: ईश्वर उन लोगों को स्वीकार करते हैं जो टूटे दिल से आते हैं।
  3. वचन-स्वीकार्यता: परमेश्वर का वचन उनसे जुड़ता है जो सुनकर थरथराते हैं—यानी उत्तर मिल सकता है, मार्ग खुल सकता है।

क्रॉस-रेफरेंसेस के साथ संकल्पना

1) भज 34:18 — “दीन मन वाले प्रभु के निकट हैं।” यह बताता है कि परमेश्वर ऐसे विवेकपूर्ण मन को देख लेते हैं जो विपदा में अपने से संपर्क रखते हैं।

2) मति 5:3 — “धन्य है दीन-हृदयजन, क्योंकि उन्हीं को आकाश का राज्य मिलेगा।” यह उद्धार-प्रस्ताव दीनता के मूल्य को स्पष्ट करता है।

3) यशाय 57:15 — “जो नम्र हैं, मैं वहीं रहता हूँ”— परमेश्वर की तलाश-केन्द्रित देखभाल का विस्तृत संदर्भ देता है।

व्यावहारिक takeaways

  • हमारी पहचान: प्रभु की रचना है; हमारी सुरक्षा और मूल्यांकन उसी में है।
  • हृदय की स्थिति: दीनता, जड़ता और विनम्रता के साथ वचन को ग्रहण करें।
  • आशा और दिशा: दीन-मन यदि ईश्वर के सामने आया है, तो उसका वचन सचेत मार्ग दर्शाता है।

संक्षिप्त सार

यशायाह 66:2 एक सार्वभौमिक स्मरण है कि ईश्वर Sovereign है—सब कुछ उसी के हाथों में है। पर वह उन दीन-खेदित आत्माओं की ओर दृष्टि डालते हैं जो विनीत मन से आते हैं और उनके वचन पर भरोसा करते हैं। यह संदेश विनम्रता की और उद्धार की राह दिखाता है।

उद्धृत अंश (जो सीधे पहले के पन्नों से प्रेरित हैं)

यदि आवश्यक हो, यह पाठ יהा के हल्के-फुल्के उद्धरण के साथ है: “दीन मन वाले प्रभु के निकट हैं” (भज 34:18) और “तीन संकेत: दीन, विनय, वचन-श्रवण”—ये Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के विचारों के संकलन के अनुरूप हैं।

*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।

यशायाह 66:2 समानांतर पद और संबंधित वचन

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टूटा मन* परमेश्‍वर के योग्य बलिदान है; हे परमेश्‍वर, तू टूटे और पिसे हुए मन को तुच्छ नहीं जानता।

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