Old Testament
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यिर्मयाह 1 यिर्मयाह 2 यिर्मयाह 3 यिर्मयाह 4 यिर्मयाह 5 यिर्मयाह 6 यिर्मयाह 7 यिर्मयाह 8 यिर्मयाह 9 यिर्मयाह 10 यिर्मयाह 11 यिर्मयाह 12 यिर्मयाह 13 यिर्मयाह 14 यिर्मयाह 15 यिर्मयाह 16 यिर्मयाह 17 यिर्मयाह 18 यिर्मयाह 19 यिर्मयाह 20 यिर्मयाह 21 यिर्मयाह 22 यिर्मयाह 23 यिर्मयाह 24 यिर्मयाह 25 यिर्मयाह 26 यिर्मयाह 27 यिर्मयाह 28 यिर्मयाह 29 यिर्मयाह 30 यिर्मयाह 31 यिर्मयाह 32 यिर्मयाह 33 यिर्मयाह 34 यिर्मयाह 35 यिर्मयाह 36 यिर्मयाह 37 यिर्मयाह 38 यिर्मयाह 39 यिर्मयाह 40 यिर्मयाह 41 यिर्मयाह 42 यिर्मयाह 43 यिर्मयाह 44 यिर्मयाह 45 यिर्मयाह 46 यिर्मयाह 47 यिर्मयाह 48 यिर्मयाह 49 यिर्मयाह 50 यिर्मयाह 51 यिर्मयाह 52Verse
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यिर्मयाह 5:19 का अर्थ (हिंदी एकांतरित प्रेरक टिप्पणी)
सीधे शब्दों में इसका मतलब है: जब लोग पूछेंगे कि यहोवा ने वही क्यों किया, तो उत्तर में एक स्पष्ट कारण दिया जाए— वे परमेश्वर की उपेक्षा और दूसरे देवताओं की आराधना के कारण संहार और परायापन झेल रहे हैं। यह वाक्य पूर्वक बताता है कि उद्धार के अवसरों को छोड़कर दुष्कर्म करने से परिणाम भी उसी प्रकार भागीदारी बन जाते हैं; देश से बाहर रहने पर दासी-बंधुओं के समान परदेशी जीवन भी उन पर आ पड़ेगा।
पृष्ठभूमि और प्रसंग
यिर्मयाह का संदेश बाबुल की विफलताओं के बाद के समय का है—यहूदा के लोगों ने अपनी पिटाई और आंतरिक असंतोष के दौरान भी परमेश्वर के सम्मुख उनकी वचनबद्धता तोड़ी। इस उद्धारक भविष्यवाणी में ऐसा कहा गया कि परमेश्वर ने उनके निरोधात्मक पतन के परिणामस्वरूप देश से बाहर जाने, पराये देश में सेवा करने जैसे अनुभव लिए जाएंगे, ताकि उनकी आंखों के सामने उनकी बुराईयों का प्रकटीकरण हो सके और वे वापसी के लिए तैयार हों।
व्याख्या के मुख्य बिंदु
क्रॉस-रेफरेंस (संकेतित संक्षेप, बिना पूर्ण पाठ)
1) Jeremiah 3:22-23: पटल पर लौट आने की पुकार; भरोसा बनाम आत्म-समर्पण की चेतावनी।
2) Leviticus 26:39-42: अनुपालन के अभाव में दंड और फिर से आस्था की वापसी की संभावना।
3) Deuteronomy 30:1-3: उलटकर लौट आने पर परमेश्वर की दया और पवित्रता की वापसी का प्रश्न।
हिंदी विश्लेषण—मौलिक संदेश
यहां यह स्पष्ट है कि परमेश्वर के विरुद्ध जीवन जीने के परिणाम सामाजिक-आर्थिक और राष्ट्रीय अनुभागों में स्पष्ट दिखाई देते हैं। लोग जब इश्वर की जगह अन्य देवताओं की तरफ मुड़ते हैं, तो समुदाय अस्थिर होता है—परदेशी सेवक बनना, अपनी पवित्रता से दूर रहना। न्याय के साथ प्रेम भी जुड़ा है: ईश्वर चाहता है कि उनका समाज अपने उद्धारकर्ता के प्रति समर्पित रहे ताकि वे फिर से उनकी कृपा में लौट सकें।
संक्षिप्त विषय-वस्तु
व्यावहारिक निष्कर्ष
हम जिससे परिचित हैं, उससे विचलन होने पर जीवन की दिशा बदल जाती है। परन्तु परमेश्वर की पवित्रता पर लौटना संभव है—यदि हम अपने जीवन में सचेत रूप से ईश्वर के अनुमोदन की मांग करें, और पुरानी बुराइयों से निर्मूल होकर उनके मार्ग पर चले। खुद को कारणों से मुक्त कर, दूसरे विकल्पों के स्थान पर उनकी मार्गदर्शिता को प्राथमिकता दें।
कथनात्मक उद्धरण (महत्वपूर्ण)
यदि आप Matthew Henry, Albert Barnes या Adam Clarke के स्पष्ट शब्दों से उद्धरण चाहते हैं, तो नीचे एक-एक पंक्ति संकेत है:
“…” (स्थापित संदर्भ में हल्का उद्धरण उपलब्ध हो सकता है; कृपया पाठ से सीधे संदर्भ देखें)
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