Old Testament
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यिर्मयाह 5:18 पर टिप्पणी: परमेश्वर की रहमत के पीछे का दृढ़ संकल्प
मुख्य interpretive बिंदु: यह वाणी बताती है कि परमेश्वर अपने दंड के बावजूद भी यरूशलेम और यहूदा के प्रति अपनी उदार माफी और प्रेम के विकल्प को छोड़ते नहीं हैं। कटु दोषों के बावजूद, भगवान की वादाएँ और उनकी करुणा अविचल बनी रहती हैं। यहVerse भविष्य की आशा देता है कि दिवाली का अंधकार इतनी देर तक नहीं टिकेगा, क्योंकि परमेश्वर पुनः सँभालकर पक्का मार्ग दिखाते हैं।
साहित्यिक संदर्भ (पाठ्य-परिप्रेक्ष्य)
यिर्मयाह की पुस्तक में उद्धार की उम्मीद अनेक बार टूटे हुए सम्बन्धों, आदत प्रक्रियाओं और चेतावनियों के बीच उभरती है। अध्याय 5 में耶, जो यहूदियों के नैतिक गिरावट की गूंज है, यिर्मयाह को यह दिखाता है कि परमेश्वर की वाणी केवल दंड तक सीमित नहीं है, बल्कि वह पापियों के लिए भी मार्ग खोलते हैं। इस वाक्य में भगवान कहते हैं कि उनकी चाल यह नहीं कि वे अंत कर दें, बल्कि वे पुनः राह दिखाने को इच्छा रखते हैं।
धर्मशास्त्रीय महत्व
यह वचन यह स्पष्ट करता है कि दंड और दया दोनों परमेश्वर के न्याय और करुणा के आयाम हैं। दंड उसे सत्य के पुकारने से रोक नहीं पाता; बल्कि करुणा और विश्वासघात के बीच वह पुनः मेल के प्रयास को बनाये रखते हैं। यहूदियों के इतिहास में निराशा के समय भी ईश्वर की सच्ची इच्छा यह है कि वे लौटें और उनके साथ नया आरम्भ करें।
अन्य ग्रंथों के साथ सम्बद्धता
- यशायाह 54:7-10: दया और स्थायित्व की पुनः-प्रतिष्ठा की आशा। यह स्पष्ट करता है कि God’s steadfast love and mercy endure forever even when discipline seems harsh.
- सेम 3:4-6: पाप के कारण पूजास्थलों पर संकट, परन्तु कोमलतापूर्ण उद्धार की संभावना बनी रहती है; दया का चक्र टूटता नहीं।
- रोम 11:22-23: कटुता और करुणा एक साथ चलते हैं; ईश्वर का चयन और उसकी करुणा अटल है, यदि लोग लौटें तो वे भी लगाए जा सकते हैं।
चिंतन के प्रश्न (Reflection)
संक्षिप्त निष्कर्ष
यिर्मयाह 5:18 में परमेश्वर यह स्पष्ट करते हैं कि उनके वचन का उद्देश्य प्रायः दंड नहीं, बल्कि उद्धार और पुनःस्थापना है। यह वाक्य हमें यह याद दिलाता है कि ईश्वर की करुणा अत्यंत गहरी है और उनका वचन समय-समय पर हमें आशा का रास्ता दिखाता है। जब संसार में अंधकार होता है, तब भी प्रभु कह रहे हैं—मैं तुम्हारा अंत न करूँगा; लौट आओ, ताकि मैं तुम्हें अपने लोक-कल्याण के मार्ग पर स्थापित कर दूँ।
पूर्व-प्राप्त उद्धरण (Historicalquotes)
यदि आवश्यक हो, टिप्पणी में Matthew Henry, Albert Barnes, Adam Clarke से संक्षिप्त, स्वीकृत उद्धरण आप पाएँगे: - Matthew Henry: “...". - Albert Barnes: “...". - Adam Clarke: “...". सावधानी: यहाँ पूर्ण पाठ उद्धरण नहीं दिया गया है; केवल उनके स्वर-संरचना के संकेत हैं।
Cross-references (संक्षेप)
- यशायाह 54:7-10: करुणा की पुनःस्थापना; स्थायित्व पर विचार।
- रोम 11:22-23: दया और न्याय के बीच संतुलन; लौटने पर आशा।
- पंक्ति-प्रेरणा: देव-नियत की पवित्रता और उद्धार की योजना के संकेत।