Old Testament
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मत्ती 28:17 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
और उन्होंने उसके दर्शन पा कर उसे प्रणाम किया, पर किसी-किसी* को सन्देह हुआ।
मत्ती 28:17 पद-दर-पद बाइबल टीका
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मत्ती 28:17 समानांतर पद और संबंधित वचन
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भजन संहिता 45:11 (HINIRV) »
और राजा तेरे रूप की चाह करेगा। क्योंकि वह तो तेरा प्रभु है, तू उसे दण्डवत् कर।

भजन संहिता 2:12 (HINIRV) »
पुत्र को चूमो ऐसा न हो कि वह क्रोध करे, और तुम मार्ग ही में नाश हो जाओ, क्योंकि क्षण भर में उसका क्रोध भड़कने को है। धन्य है वे जो उसमें शरण लेते है।

मत्ती 16:28 (HINIRV) »
मैं तुम से सच कहता हूँ, कि जो यहाँ खड़े हैं, उनमें से कितने ऐसे हैं, कि जब तक मनुष्य के पुत्र को उसके राज्य में आते हुए न देख लेंगे, तब तक मृत्यु का स्वाद कभी न चखेंगे।”
मत्ती 28:17 का संदर्भ और अर्थ
ये पद पवित्र सुसमाचार मत्ती में उन घटनाओं का हिस्सा है जब यीशु पुनर्जीवित हो कर अपने चरित्री शिष्यों से मिलता है। प्रारम्भिक दृश्य में शिष्य उसकी उपस्थिति को देखकर प्रणाम करते हैं, किन्तु कुछ लोग शंका में पड़ जाते हैं। यह दृश्य हमारी रुचि को दो बिंदुओं पर केंद्रित करता है: पहले, पुनर्जीवित मसीह की वास्तविकता पर विश्वास का संघर्ष; दूसरे, विश्वास और संदेह के बीच यीशु की दिव्य सत्ता और करुणा का प्रदर्शन।
केंद्रीय तात्पर्य
यहाँ “दृष्टिगत” एवं “रूढ़ीभूत” अनुभव एक साथ आते हैं। शिष्य जीवंत यीशु को देखते हैं, उनके साथ बातचीत करते हैं, और प्रणाम करते हैं—जो सम्मान और श्रद्धा का स्पष्ट संकेत है। फिर भी कुछ लोग संदेह में पड़ते हैं, जो मानवीय धारणाओं, भय या पूर्वाग्रह के कारण हो सकता है। इस दृश्य से यह स्पष्ट होता है कि यीशु का पुनर्जीवन वास्तविक और मानवीय रूप में उपस्थित है, पर यह भी दर्शाता है कि विश्वास पथ में अवरोध न हो तो अधिक गहराई तक आध्यात्मिक ज्ञान खुल सकता है।
मुख्य विषय
सम्बन्धित पद
यथार्थ, यह पाठ अन्य उद्धारणों से जुड़ता है जो यीशु के पुनर्जीवन के प्रमाण और शिष्यों के विश्वास की विकसित प्रक्रिया को दर्शाते हैं, जैसे:
इन संदर्भों में पुनर्जीवन की वास्तविकता, शिष्यों की अनुभवजन्य पुष्टि, और विश्वास-जीवन की राह स्पष्ट होती है।
व्यावहारिक विचार
हमारा जीवन भी कभी-कभी संदेह का सामना करता है—विशेषकर कठिनाईयों के बीच विश्वास की परीक्षा होती है। यह पद हमें याद दिलाता है कि: - विश्वास को समय, प्रमाण और आत्मा-समर्थन चाहिए। - यीशु की उपस्थिति और आज्ञाओं को मानना जीवन के उद्देश्य को स्पष्ट करता है। - संदेह के क्षणों में प्रार्थना, पवित्रशास्त्र की पुष्टि और समुदाय की सहायता जरूरी है।
संक्षिप्त निष्कर्ष
मत्ती 28:17 में प्रणाम और संदेह एक संतुलित चित्र बनाते हैं: यीशु की महिमा स्पष्ट है, पर मानव मन के संदेह को भी समझना चाहिए। इस दृश्य से प्रेरणा मिलती है कि विश्वास तब और मजबूत होता है जब हम मसीह को पहचानते हैं, उनके द्वारा दिए गए मिशन में भाग लेते हैं, और विश्वास के साथ प्रार्थना में स्थिर रहते हैं।
cross-references
यथार्थ से जुड़ाव बनाए रखने के लिए: