Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
मत्ती 9:1 मत्ती 9:2 मत्ती 9:3 मत्ती 9:4 मत्ती 9:5 मत्ती 9:6 मत्ती 9:7 मत्ती 9:8 मत्ती 9:9 मत्ती 9:10 मत्ती 9:11 मत्ती 9:12 मत्ती 9:13 मत्ती 9:14 मत्ती 9:15 मत्ती 9:16 मत्ती 9:17 मत्ती 9:18 मत्ती 9:19 मत्ती 9:20 मत्ती 9:21 मत्ती 9:22 मत्ती 9:23 मत्ती 9:24 मत्ती 9:25 मत्ती 9:26 मत्ती 9:27 मत्ती 9:28 मत्ती 9:29 मत्ती 9:30 मत्ती 9:31 मत्ती 9:32 मत्ती 9:33 मत्ती 9:34 मत्ती 9:35 मत्ती 9:36 मत्ती 9:37 मत्ती 9:38



मत्ती 9:15 पर विवेच्य दार्शनिक अर्थ
यह वाक्य यीशु के साथ छात्रों और जनता के बीच के एक-modal दृश्य में आता है, जहाँ वेद-आत्मा और रस्म-परम्परा से जुड़ी एक प्रतीकात्मक बात कही गई है। दुल्हे और बारात की उपमा से यीशु यह संकेत करते हैं कि उनके साथ रहने के समय का फर्क कैसे आस्था और उत्साह के समय को नियंत्रित करता है—और जब वह उपस्थित नहीं होते, तब उपवास और प्रार्थना जैसे आंतरिक स्वीकृति के अभ्यास क्यों उचित होते हैं। यह verses 15 में दिखती धारणा कि ईश्वर के राज्य के निकट समय में आस्था की गहराई में परिवर्तन आ सकता है; नीचे के प्रसंगों में यीशु अपने शिष्यों को यह समझाते हैं कि उनकी मंडली की स्थितियाँ एक-बद्ध नहीं हैं, बल्कि जिस प्रकार उनका वास्तविक संबंध प्रभु से है वही सच्चा आराम देता है।
आधिकारिक संदर्भ: मूल संदर्भ और संदेश
पास रचना में यीशु और उनके शिष्यों परिदृश्य को देखते हैं कि बजाय रस्म-रिवाज के, नया रूप और नई ऊर्जा चाहिए—यानी उद्धारकर्ता के समय के साथ सामंजस्य बैठाने की जरूरत है। दुल्हा यहाँ यीशु स्वयं हैं; बाराती उनके साथ रहते हैं, वे खुश रहते हैं। जैसे-जैसे दूल्हा निकट आता है, वैराग्य और उपवास का समय तब आते हैं जब दूल्हा उनके बीच नहीं रहा। यह दर्शाता है कि धार्मिकता की भक्ति पहले उनकी उपस्थिति के साथ है; जब वह साथ नहीं होते, तब आस्था की अनुशीलन की प्र्रक्रिया अधिक सूझ-बूझ के साथ होती है।
मुख्य संदेश
कई प्रमुख थीम्स और क्रॉस-रेफरेंसेस
संक्षिप्त cross-references और उनके तात्पर्य:
टिप्पणीकारों के विचार (संयुक्त सार)
मैथ्यू हेनरी, एल्बर्ट बार्न्स और एडम क्लार्क जैसे सार्वजनिक-डायरेक्ट टिप्पणीकारों के विचार इस ढांचे में पिघलते हैं—पर उनका संकेत यह है कि यीशु के समय में दुल्हा के साथ रहने की खुशी, और जब वह नहीं होते तब आत्म-नियमन, यह दोनों आस्था की विविध गहराइयों को उजागर करते हैं।
उनमें से कुछ छोटे उद्धरण (यदि उपलब्ध हों) इस प्रकार मिलते हैं: “खुशी के समय उपवास कभी-कभी आवश्यक नहीं होता” जैसी सहज व्याख्या शुरुआती संदर्भ में मिलती है; अगर आप स्रोतों को देखेंगे, तो वे कहेंगे कि यीशु दुल्हे के साथ रहने को प्रमुख बताते हैं और आवश्यकता अनुसार तपस्या की बात करते हैं।
व्यावहारिक देवotional विचार
हम कैसे लागू करें? यीशु की उपस्थिति के समय हमारी खुशी, प्रार्थना, और भक्तिपूर्ण क्रिया एक साथ चलते हैं। जब जीवन कठिन होता है और मुश्किल समय आता है, तो आत्म-नियमन, प्रार्थना और पवित्रता की मांग बढ़ती है। धार्मिकता केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि प्रभु के साथ निरंतर संबंध की अनुभूति है।
संक्षेप संदर्भ
1) मत्ती 9:14-15 — दुल्हे के समय उपवास का नियम; 2) लूका 5:34-35 — नया समय, पुरानी रीति-रिवाजों की पार्श्वभूमि; 3) मरकुस 2:19-20 — दूल्हे के साथ रहने और उपवास की संतुलित दृष्टि।