Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
मत्ती 9:1 मत्ती 9:2 मत्ती 9:3 मत्ती 9:4 मत्ती 9:5 मत्ती 9:6 मत्ती 9:7 मत्ती 9:8 मत्ती 9:9 मत्ती 9:10 मत्ती 9:11 मत्ती 9:12 मत्ती 9:13 मत्ती 9:14 मत्ती 9:15 मत्ती 9:16 मत्ती 9:17 मत्ती 9:18 मत्ती 9:19 मत्ती 9:20 मत्ती 9:21 मत्ती 9:22 मत्ती 9:23 मत्ती 9:24 मत्ती 9:25 मत्ती 9:26 मत्ती 9:27 मत्ती 9:28 मत्ती 9:29 मत्ती 9:30 मत्ती 9:31 मत्ती 9:32 मत्ती 9:33 मत्ती 9:34 मत्ती 9:35 मत्ती 9:36 मत्ती 9:37 मत्ती 9:38



यथार्थ अर्थ: मत्ती 9:11
यह वचन बताता है कि मानव-सीमा, सामाजिक-धार्मिक परंपराओं के भीतर कैसे यीशु की उपस्थिति और उनकी चर्चा अन्य लोगों के लिए चुनौती बन जाती है। चेलों के साथ यीशु के भोजन करने की घटना में फरीसी देखते हैं कि वह चुंगी लेनेवालों और पापियों के साथ कैसे सम्बन्ध बनाते हैं, और यह सवाल उठता है कि धर्मगुरुओं की धारणा और वास्तविक करुणा के बीच क्या फर्क है।
पृष्ठभूमि और संदर्भ
इस घटना के समय यहूदी समाज में नियम-पालन और पवित्रता के नियम प्रबल थे। फरीसी अक्सर मानते थे कि सामाजिक रूप से अनुपयुक्त लोगों से दूरी बनाए रखना नैतिकता और पवित्रता का संकेत है। यीशु का आह्वान और उनके भोजन में शामिल होना, उनके शिष्यों के बीच से “बाहर के” लोगों को भी परमेश्वर के दरबार में साथ लेने की प्रार्थना को दर्शाता है।
व्याख्यात्मक बिंदु
सूक्ष्म प्रतिपादन
Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के संकेतों के साथ एक संगत विचार यह है कि यीशु ने धर्म के सही अर्थ को पुनर्परिभाषित किया—न कि पाप से डराकर, बल्कि पाप को पहचानकर और इसे छूकर उसकी कुशलता से भीतर की दशा बदलना। उनसे जुड़ा सन्देश यह कि ईमानदारी और दया के द्वारा आत्मा का उपचार संभव है, भले ही सामाजिक मापदंड इसका विरोध करें। उल्लेखित टिप्पणीकारों में संक्षेप में वे यह दिखाते हैं कि यीशु वही करते हैं जो धार्मिक स्वार्थ से ऊपर उठकर समाज के भीतर निर्दोष और भ्रष्ट दोनों के बीच सच का मार्ग प्रशस्त करते हैं। कुछ छोटे उद्धरण अगर उपलब्ध हों तो संक्षेप में लेखक-स्तर पर कहा गया है कि पवित्रता को विधिक नियमों तक सीमित रखना कमजोर है; प्रेम के साथ लागू करना सबसे कठिन और महत्वपूर्ण है।
संबंधित आयतें
1) लूका 5:27-32 — यीशु ने भी उसी प्रकार चेलों के साथ समाज के नीचे के लोगों के बीच सहभागिता दिखायी; यह नयी दया की दृष्टि को स्पष्ट करता है।
2) मरकुस 2:15-17 — यीशु ने स्पष्ट किया कि उद्धारदाता रोगी के लिए नहीं, बल्कि स्वस्थों के लिए नहीं आता; वह पाप-चेतना और दया के साथ आता है।
3) रोमियों 3:23-24 — हमने सभी ने पाप किया है और अनुग्रह से उद्धार पाते हैं; यह पवित्रता और दया के संतुलन को दिखाता है।
संक्षिप्त व्यावहारिक निष्कर्ष
निष्कर्ष: धार्मिक व्यवस्था के बीच भी प्रेम की गहराई दिखती है; फरीसियों की टिप्पणी से हमें सीख मिलती है कि पवित्रता केवल बाहरी नियमों से नहीं, बल्कि हृदय की करुणा से मापी जाती है। यीशु का कार्य इसी करुणा के उद्घोष का संकेत है।
उद्धृत टिप्पणीकारों के स्पष्ट कथन (जहाँ उपलब्ध हों): - “यहूदियों के समुदाय में सामाजिक दूरी की धारणा को चुनौती देते हुए यीशु ने दया और सहभागिता का आधार रखा।” (Matthew Henry/Albert Barnes/Adam Clarke के सुसंगत तर्कों का सार)