Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
मत्ती 9:1 मत्ती 9:2 मत्ती 9:3 मत्ती 9:4 मत्ती 9:5 मत्ती 9:6 मत्ती 9:7 मत्ती 9:8 मत्ती 9:9 मत्ती 9:10 मत्ती 9:11 मत्ती 9:12 मत्ती 9:13 मत्ती 9:14 मत्ती 9:15 मत्ती 9:16 मत्ती 9:17 मत्ती 9:18 मत्ती 9:19 मत्ती 9:20 मत्ती 9:21 मत्ती 9:22 मत्ती 9:23 मत्ती 9:24 मत्ती 9:25 मत्ती 9:26 मत्ती 9:27 मत्ती 9:28 मत्ती 9:29 मत्ती 9:30 मत्ती 9:31 मत्ती 9:32 मत्ती 9:33 मत्ती 9:34 मत्ती 9:35 मत्ती 9:36 मत्ती 9:37 मत्ती 9:38



मत्ती 9:4 पर टिप्पणी (HINIRV)
इस पद में यीशु ने एक दिलचस्प आत्म-चेतावनी दी है—मन के विचारों को ही वह अपराध के अनुसार गिनते हैं। उन पंक्तियों का संदर्भ यह है कि जब लोग जेसा-तैसा विचार करते हैं, तब वह उन्हें सीधे नहीं कहता; बल्कि वह उनके मन की बातें पढ़ लेते हैं ताकि ध्यान रहे कि भलि-बुरी धारणाओं के पीछे भावी कार्य संचालित होते हैं। यह घटना तब है जब यीशु लहरों के बीच दो पथिकों के देने के बारे में विचार-विमर्श कर रहे थे और कुछ धार्मिक गुरु उन पर आरोप लगाते थे।
मुख्य अर्थ
येशु के अनुसार, अपराध का प्रश्न केवल बाहरी कर्मों से नहीं बनता, बल्कि मन के भीतर उठने वाले विचारों से बनता है। यदि कोई मन में बुरा विचार कर रहा है या अन्याय की कल्पना कर रहा है, तो उसकी आत्मा की पवित्रता खतरे में है। यीशु इस सच को न केवल अपराधों की घनिष्ठता के साथ बतलाते हैं, बल्कि यह भी संकेत करते हैं कि बिना विचार-नियंत्रण के धार्मिक कर्म सिर्फ दिखावा बन जाते हैं।
तीन प्रमुख विषय
संदर्भ-छाँट और संबंधित कथन
इस विचार के साथ अन्य विधान और कहानियाँ जो मन के विचारों की भूमिका पर प्रकाश डालती हैं—जैसे कि चित्त के निरीक्षण, हृदय की पवित्रता, तथा प्रार्थना में अद्भुत ईमानदारी—हमें मदद करती हैं कि हम अपने जीवन के आंतरिक मंच पर जागरूक रहें। हल्के-फुल्के मन से शुरू होते विचार ठोस कर्म बन जाते हैं; अतः विवेकपूर्ण प्रार्थना और आत्म-परिष्कार आवश्यक हैं।
क्रॉस-रेफरेंसेस और संक्षिप्त स्पष्टीकरण
- मत्ती 5:28: बाहर के कर्म से अधिक आंतरिक विचारों का पवित्र होना आवश्यक है; पाप मन में बुना जाता है। यह verse इस बात को और स्पष्ट करता है कि नैतिकता केवल क्रिया-नैतिकता नहीं, मन के साथ जुड़ी है।
- मत्ती 15:19: मन के विचारों में जो पाप उठते हैं, वे जीवन के अन्य मार्गों को दूषित करते हैं; इस तरह विचार-नियन्त्रण की शिक्षा यहाँ स्पष्ट रहती है।
- मरकुस 7:21-23: मन के भीतर से आने वाले पाप ही वास्तविक पाप के स्रोत हैं; यीशु इसके प्रति सचेत करते हैं।
व्यावहारिक विचार
जीवन में दिखने वाले व्यवहार से पहले अपने मन के विचारों पर जाँच करें। यह जागरूकता प्रार्थना, आत्म-निगरानी और नियमित आत्म-शुद्धि के अभ्यास से मजबूत होती है। दूसरों के बारे में बुरे विचार आने पर उन्हें तुरंत गिराह-तोड़ दें और सचेत रहें कि यह विचार कब और कैसे आपके कर्म बन जाते हैं।
संक्षिप्त निचोड़
यीशु का यह संकेत मनोविज्ञान नहीं, आत्म-आस्थायित आध्यात्मिक नैतिकता है—मन के विचार भी नैतिक दायित्व के अधीन हैं. हमारे हृदय की स्थिति ही हमारे कर्मों की दिशा तय करती है; לכן अंतर्मन की पवित्रता ही बाहर के जीवन की सत्यता है।
आसान उद्धरणयुक्त उल्लेख (पब्लिक डोमेन टिप्पणीकारों से): मार्था-हेनरी, अल्बर्ट बार्न्स, एडम क्लार्क के मूल विचारों में यह माना गया है कि भीतर के विचार और इरादे बाहरी क्रिया से अधिक महत्वपूर्ण होते हैं; यह न समझना कि धर्म केवल परिधान है।
व्यवस्थित सार: मन की दृष्टि को नियंत्रित करना ही वास्तविक धर्म है; यीशु हमारे विचारों पर भी निगाह डालते हैं ताकि हम सचेमन और शुद्ध आचरण की ओर बढ़ें।