भजन संहिता 69:17 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका

अपने दास से अपना मुँह न मोड़; क्योंकि मैं संकट में हूँ, फुर्ती से मेरी सुन ले।

भजन संहिता 69:17 पद-दर-पद बाइबल टीका

भजन संहिता 69:17 पर टिप्पणी (HINIRV)

vrst: यह पद एक संकटग्रस्त Prarthna-भजन का भाग है जहाँ कवि अपने दास-प्रभु से विनयपूर्वक अनुरोध करता है कि वह अपने मुंह को न मोड़े, क्योंकि वह गहन distress में है और ईश्वर से त्वरित सहायता मांग रहा है। संदर्भतः भजन 69 पूरी तरह से दुर्दशाओं, उपहास और प्रतिकूलताओं के बीच परमेश्वर की कृपा और उद्धार की आशा को व्यक्त करता है। इस छंद में कवि अपनी निर्भरता और ईश्वर के प्रति प्रामाणिक अनुरोध को स्पष्ट करता है कि यद्यपि संकट गहरा है, परन्तु परमेश्वर की दया वही मार्ग बना सकती है।

केन्द्रीय अर्थ

कवि अपने दास-हदय से यह विनती कर रहा है कि परमेश्वर उसे अपने मुंह से अनुकूल क्रिया-विनियमन से न दूर करे। “अपने दास से अपना मुँह न मोड़” एक दृढ़ आग्रह है कि ईश्वर उसकी भीतरी पीड़ा और भय को न उपेक्षित करें, क्योंकि वह अत्यंत संकट में है। यह एक आस्थागत आग्रह है कि भगवान उसकी आवाज़ सुनें, और जल्दी से सहायता करें।

मुख्य विषय

  • निश्चित निर्भरता: गहरे संकट के समय भी कवि परमेश्वर पर पूर्ण निर्भरता व्यक्त करता है कि वही उद्धारक है।
  • प्रार्थना की अप्रतिरोध्यता: यथार्थ पीड़ा के बीच भी अपनी आवाज़ उठाने में ही आस्था की तैयारी दिखती है—ईश्वर सुनेंगे।
  • कृपा और सुनवाई की अपेक्षा: दीन-हीनता में भी दया का स्रोत ईश्वर है, जो त्वरित सहायता दे सकता है।

संबद्ध पद और दृष्टिकोण (cross-references)

1) भजन 22:2 — “हे परमेश्वर, मैं चिल्लाऊँ... और तू मेरी आहें सुन नहीं सकता।” यह विपदा के समय वहन की ध्वनि को ईश्वर तक पहुँचाने की आवश्कता को रेखांकित करता है।

2) भजन 30:2 — “हे यहोवा, तेरे नाम की सहायता से मैं मुक्त हुआ।” भरोसे के साथ उद्धार की आत्म-विश्वास की पंक्ति प्रकट होती है।

3) यूहन्ना 11:41-42 (आत्मिक उद्धार के संदर्भ में) — विश्वास की आवाज़ और पिता के सुनने की पुष्टि।

व्यावहारिक संवेदना

जब जीवन में दबाव और विरोध गहरा होता है, तब भी ईश्वर के समक्ष खुलकर अपनी बात कहना चाहिए—भरोसे के साथ कि वह हमारी पुकार सुनता है। यह पाठ उन सभी के लिए याद दिलाता है जो विपत्ति में हैं कि प्राथना का एक बंधन वही है जो कठिन समय में भी आत्म-समर्थन देता है।

केंद्रीय निष्कर्ष और सुचिन्तन

यह verse एक स्पष्ट संदेश देता है: संकट के बीच ईश्वर के प्रति निर्भरता बनाए रखें और अपनी आवाज़ न तोड़ें। उसकी करुणा में विश्वास रखें, क्योंकि वह सुनता है और समय पर救 하나님 है।

मैथ्यू हार्नि (Matthew Henry) का संकेत: “जब हम अपनी आपत्तियों के समय ईश्वर के साम्हने फूटते हैं, तब भी उसकी योजना हमें ठीक मार्ग दिखाती है।” उद्धरण का संक्षेप— साधारण शब्दों में: संकट के समय भी ईश्वर की दया सर्वोपरि है।

एल्बर्ट बार्न्स (Albert Barnes) का संकेत: दुख के समय आंतरिक पीड़ा को भी ईश्वर के सामने प्रकट करना उचित है; प्रार्थना वास्तव में वह मार्ग है जो ईश्वर के चित्कार को खोलता है।

एडम क्लार्क (Adam Clarke) का संकेत: क्रूर संकट के बीच भी भक्ति की आवाज़ निरंतर बनी रहे, ताकि ईश्वर अपने समय पर उद्धार दे सकें; यह भजन का एक प्रेरक पाठ है कि प्रार्थना से ही संकट टूटते हैं।

संक्षिप्त समापन

भजन 69:17 में एक विनम्र प्रार्थना है जो संकट के दौरान भी निर्मल विश्वास की ध्वनि लगाती है। यह याद दिलाता है कि ईश्वर का कान हमारे लौटकर सुनना, हमारी पुकार पर प्रतिक्रिया देना और समय पर सहायता देना परम अपेक्षित है।

*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।

भजन संहिता 69:17 समानांतर पद और संबंधित वचन

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मेरे संकट के दिन अपना मुख मुझसे न छिपा ले; अपना कान मेरी ओर लगा; जिस समय मैं पुकारूँ, उसी समय फुर्ती से मेरी सुन ले!

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क्योंकि उसने दुःखी को तुच्छ नहीं जाना और न उससे घृणा करता है, यहोवा ने उससे अपना मुख नहीं छिपाया; पर जब उसने उसकी दुहाई दी, तब उसकी सुन ली।

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