Old Testament
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यशायाह 1 यशायाह 2 यशायाह 3 यशायाह 4 यशायाह 5 यशायाह 6 यशायाह 7 यशायाह 8 यशायाह 9 यशायाह 10 यशायाह 11 यशायाह 12 यशायाह 13 यशायाह 14 यशायाह 15 यशायाह 16 यशायाह 17 यशायाह 18 यशायाह 19 यशायाह 20 यशायाह 21 यशायाह 22 यशायाह 23 यशायाह 24 यशायाह 25 यशायाह 26 यशायाह 27 यशायाह 28 यशायाह 29 यशायाह 30 यशायाह 31 यशायाह 32 यशायाह 33 यशायाह 34 यशायाह 35 यशायाह 36 यशायाह 37 यशायाह 38 यशायाह 39 यशायाह 40 यशायाह 41 यशायाह 42 यशायाह 43 यशायाह 44 यशायाह 45 यशायाह 46 यशायाह 47 यशायाह 48 यशायाह 49 यशायाह 50 यशायाह 51 यशायाह 52 यशायाह 53 यशायाह 54 यशायाह 55 यशायाह 56 यशायाह 57 यशायाह 58 यशायाह 59 यशायाह 60 यशायाह 61 यशायाह 62 यशायाह 63 यशायाह 64 यशायाह 65 यशायाह 66



यशायाह 36:19 का अर्थ—सीधा उत्तर
इस पद में राजा एक शासक की याचना नहीं, बल्कि अपने दावे पर विश्वास रखने वाले लोगों के दृष्टिकोण का परीक्षण करता है। यकीनन मैदान पर बहादुरी का प्रदर्शन है, परन्तु असली रक्षा परमात्मा ही कर सकता है। यातनाओं और युद्धों के बीच, आश्रय कहाँ है—राजा हनान के देवताओं या अन्य स्थानीय देवताओं में नहीं, बल्कि एक निर्भरता में है जो परमेश्वर की कृपा पर टिकी हो। यहाँ स्पष्ट रूप से कहा गया है कि बेबीलोनियाई आक्रमण के संदर्भ में न तो हूण, न अर्पाद, न सपुव्रीम के देवता, न शोमरोन (आसन्नी) की कोई शक्ति रक्षा कर पाती है यदि परमेश्वर की अनुमति न हो।
पृष्ठभूमि और संदर्भ
यशायाह के समय 6वें और 7वें दशक के बीच लगभग ईसा पूर्व पांचवीं शताब्दी के आस-पास भारत-फैली साम्राज्यिक राजनीति में निश्चित भय और दुष्प्रेरणा का दौर था। यशायाह—राजा हों या प्रतिभाषी—कहते हैं कि राजनीतिक शक्ति, सैन्य आक्रमण और पितृभक्ति के उन्माद से भी परमेश्वर की सत्ता ऊपर है। इस पाठ में एशोर-युग के देवताओं के संकल्पों की असुरक्षा और एकेश्वरीय सत्ता का स्पष्ट सामना दिखाई देता है।
व्याख्यात्मक निष्कर्ष
सही अनुवाद से जुड़ी छोटी व्याख्या
यह पद स्पष्ट करता है कि विदेशी देवताओं की महिमा और शक्ति मानवीय दृष्टिकोण में सीमित है, और असली शक्तिशाली कौन है—यह परमेश्वर का कार्य है। यह संदेश शांति, विश्वास और निर्भयता का प्रेरक बनता है, विशेषकर उन समयों में जब साम्राज्यों की ताक़तें चारों ओर फैल रही हों।
संबद्ध भाग और व्याख्या
1) यशायाह 37:20— परमेश्वर की ही शक्ति सदा श्रेष्ठ है, और प्रश्नों का उत्तर वही दे सकता है। यह संदर्भ बताता है कि आक्रमण और शत्रुओं के उद्धोष के बीच ईश्वर का प्रत्यक्ष हस्तक्षेप कितना निर्णायक हो सकता है।
2) 1 राजा 8:60— एकता में मानना कि सारे राष्ट्र परमेश्वर के अधीन हैं; यह पद महात्म्य के साथ आत्म-समर्पण की भी शिक्षा देता है।
3) निराकरण का चिंतन: भरोसा किस पर है—शस्त्रों पर या परमेश्वर की कृपा पर? यशायाह की टिप्पणी में यह स्पष्ट है कि वास्तविक रक्षा परमेश्वर से है, चाहे दिखती tíchति कुछ भी हो।
छोटा व्यावहारिक निष्कर्ष
हम चाहे कितने भी समर्थ क्यों न हों, संकट के समय का वास्तविक सुरक्षा स्रोत क्या है, यह याद रखें। हमारी निर्भरता ईश्वर की व्यवस्था और उसकी वचन-प्रत्यक्ष में होनी चाहिए, न कि राजनीतिक या सैन्य शक्ति में।
क्रॉस-रेफरेंसेस (संक्षेप में)
- यशायाह 37:20: परमेश्वर की सहायता और एकताबद्धता पर जोर।
- 1 राजा 8:60: सभी देशों के लिए एक परमेश्वर के अधीनता का विचार।
- राजाओं के इतिहास से प्रेरणा: शत्रुओं के विरुद्ध ईश्वर की सहायता कब स्पष्ट होती है, यह विश्वास के परीक्षण पर निर्भर है।
उद्धृत विचार (मानक स्रोत): Matthew Henry, Albert Barnes, Adam Clarke द्वारा किया गया संकलन यदि उपलब्ध हो, तो उनके छोटे-छोटे सार वाक्यांश यहाँ उद्धृत रहेंगे।