Old Testament
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यशायाह 1 यशायाह 2 यशायाह 3 यशायाह 4 यशायाह 5 यशायाह 6 यशायाह 7 यशायाह 8 यशायाह 9 यशायाह 10 यशायाह 11 यशायाह 12 यशायाह 13 यशायाह 14 यशायाह 15 यशायाह 16 यशायाह 17 यशायाह 18 यशायाह 19 यशायाह 20 यशायाह 21 यशायाह 22 यशायाह 23 यशायाह 24 यशायाह 25 यशायाह 26 यशायाह 27 यशायाह 28 यशायाह 29 यशायाह 30 यशायाह 31 यशायाह 32 यशायाह 33 यशायाह 34 यशायाह 35 यशायाह 36 यशायाह 37 यशायाह 38 यशायाह 39 यशायाह 40 यशायाह 41 यशायाह 42 यशायाह 43 यशायाह 44 यशायाह 45 यशायाह 46 यशायाह 47 यशायाह 48 यशायाह 49 यशायाह 50 यशायाह 51 यशायाह 52 यशायाह 53 यशायाह 54 यशायाह 55 यशायाह 56 यशायाह 57 यशायाह 58 यशायाह 59 यशायाह 60 यशायाह 61 यशायाह 62 यशायाह 63 यशायाह 64 यशायाह 65 यशायाह 66



यशायाह 36:5 पर उद्धृत महत्व
यह वचन हमें यह सिखाते हैं कि युद्ध-यात्रा और शक्ति-कौशल केवल भौतिक उपायों पर निर्भर नहीं होते। खुली चुनौती के समय जब राजा संसारिक शक्तियों पर भरोसा करने का आग्रह करता है, तब परमेश्वर की ओर से दिखने वाला एक दुष्प्रभाव-भरा सम्वाद सामने आता है। इस वचन से प्रेरणा मिलती है कि भरोसा किस पर हो, यह निर्णायक है: निर्भरता किसके ऊपर है और कौन परेशानी के समय वास्तविक सुरक्षा देता है।
स्थिति का संदर्भ और मूल संदेश
यशायाह 36 अध्याय में बाइट-युग के संकट के समय यह उद्घोषणा सामने आती है कि राजा और उसकी सैन्य योजना बाहरी शक्ति पर निर्भर है। आश्वासन यह है कि मुँह से बातें बनाकर युद्ध जीतना, या बलवा की योजना ही सब कुछ नहीं है। प्रभु पूछते हैं: तुम किन पर भरोसा करते हो? यह सवाल हमें यह दिखाता है कि सबसे बड़ी सुरक्षा परमेश्वर की कर्म-योजना पर होती है, न कि मानव-यत्नों पर।
मुख्य विचार
परिशुद्ध ब्रह्म-वाणी से जुड़े बाइबल-जाँच
कई दशाओं में परमेश्वर के चेलों को मानव-योजना के विरुद्ध विश्वास की परीक्षा होती है। नीचे दिए गए क्रॉस-रेफरेंसेस इस दुविधा के साथ सहारा बनते हैं:
एच्छिक टिप्पणी: समान-विषयक पंक्तियाँ
Matthew Henry, Barnes, और Clarke के सार्वजनिक-डomain टिप्पणियाँ से कुछ संबद्ध विचार इस प्रकार मिलते हैं:
Henry का तात्पर्य है कि मानव कौशल से अधिक परमेश्वर की इच्छा को मानना चाहिए, अन्यथा युद्ध और संताप केवल बढ़ेंगे। Barnes इस बात पर प्रकाश डालते हैं कि असल शक्ति परमेश्वर की मान्यता में है—मनुष्य के उपाय केवल साधनों तक सीमित रहते हैं, परिणाम परमेश्वर के निर्णय पर निर्भर हैं। Clarke इसे यह समझाते हैं कि यह पंक्ति श्रद्धा की कसौटी बनती है—जो लोग केवल अपने मुँह-फूँक-फूँक कर योजना बनाते हैं, वे परमेश्वर की अधिकारी सत्ता से वंचित रह जाते हैं।
नोट: इन टिप्पणीकारों के छोटे उद्धरण पाठ में उपलब्ध नहीं हैं, पर उनके सामान्य निष्कर्ष इस दावे को पुष्ट करते हैं कि भरोसा परमेश्वर पर हो, न कि मानव-योजना पर।
जीवंत समापन: आध्यात्मिक-व्यावहारिक प्रार्थना
हे परमेश्वर, जब भी हमारी दृष्टि संकटों के समय सीमा-रेखा पर अटक जाए, तू हमें अपनी सुरक्षा-छाया में रहने का अनुभव देगा। मुँह से निकलती बहसों और तात्कालिक उपायों से ऊपर उठकर हम यह स्मरण रखें कि केवल तुझ पर भरोसा ही स्थिरता देता है। हमें ज्ञान दे कि हम अपने हाथों के प्रयासों से पहले तेरे निर्देश को पूछें, और जब तू कहे, तब ही आगे बढ़ें। हमारी सांसों में तेरा प्रेरक स्वर बना रहे, ताकि हम भय के बावजूद भी विश्वास की राह चुनें।Amen.
क्रॉस-रेफरेंसेस के साथ यह विचार इस बात को मजबूत करता है कि परमेश्वर की आज्ञाओं पर टिके रहने से जीवन में स्थिरता और सुरक्षा मिलती है, भले ही मानव-यु्क्तियों की प्रतिध्वनि कितनी भी तेज क्यों न हो।