Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीChapter
यशायाह 1 यशायाह 2 यशायाह 3 यशायाह 4 यशायाह 5 यशायाह 6 यशायाह 7 यशायाह 8 यशायाह 9 यशायाह 10 यशायाह 11 यशायाह 12 यशायाह 13 यशायाह 14 यशायाह 15 यशायाह 16 यशायाह 17 यशायाह 18 यशायाह 19 यशायाह 20 यशायाह 21 यशायाह 22 यशायाह 23 यशायाह 24 यशायाह 25 यशायाह 26 यशायाह 27 यशायाह 28 यशायाह 29 यशायाह 30 यशायाह 31 यशायाह 32 यशायाह 33 यशायाह 34 यशायाह 35 यशायाह 36 यशायाह 37 यशायाह 38 यशायाह 39 यशायाह 40 यशायाह 41 यशायाह 42 यशायाह 43 यशायाह 44 यशायाह 45 यशायाह 46 यशायाह 47 यशायाह 48 यशायाह 49 यशायाह 50 यशायाह 51 यशायाह 52 यशायाह 53 यशायाह 54 यशायाह 55 यशायाह 56 यशायाह 57 यशायाह 58 यशायाह 59 यशायाह 60 यशायाह 61 यशायाह 62 यशायाह 63 यशायाह 64 यशायाह 65 यशायाह 66



यशायाह 56:2 पर टिप्पणी — विश्राम और पवित्रता की महत्ता
मुख्य विचार: इस आयत में परमेश्वर ऐसे मनुष्य को धन्य मानते हैं जो ईमानदारी से परमेश्वर के आदेश के अनुरूप विश्राम दिवस को पवित्र मानता है, और जो दुष्कर्मों से बचते हुए अपने कदम को संयमित रखता है। यह पूर्णता नहीं बल्कि एक जीवनशैली का आह्वान है जिसमें विश्राम के दिन की पवित्रता, व्यक्तिगत आचरण और परमेश्वर के साथ विश्राम-सम्बन्ध की स्थिरता प्रमुख हैं।
साहित्यिक-संदर्भ (लिटरेरी Context)
56:2 की पंक्ति स्पष्ट करती है कि विश्राम दिवस की पवित्रता एक आंतरिक धर्म के अंश के रूप में प्रस्तुत है। यह उद्धोषण एक सामाजिक-नैतिक शैली में है जिसमें God’sPeople के व्यवहार के विशिष्ट मानक दिए जाते हैं: विश्राम दिन की पवित्रता, बुराई से विरत रहने, और हाथों के कर्मों पर नियंत्रण। इससे यह संकेत मिलता है कि ईश्वर के राज्य में विश्राम केवल विश्राम संख्या नहीं, बल्कि मन, दिल और व्यवहार की संगति है।
धार्मिक-अर्थ और theological significance
- पवित्र विश्राम: यहाँ विश्राम दिन को “पवित्र” मानना यह बताता है कि समय-नियम के साथ-साथ समय-उत्पत्ति भी परमेश्वर के सम्मुख अलग है। यह धार्मिक जीवन की संरचना का एक केंद्रीय भाग है।
- बुराई पर नियंत्रण: “अपने हाथ को सब भाँति की बुराई करने से रोकता” से यह स्पष्ट होता है कि विश्राम के साथ-साथ आचार-व्यवहार पर नियंत्रण भी अनिवार्य है। यह बाहरी रीति से अधिक आंतरिक परिवर्तन की मांग है—जो एक बुद्धिमान, न्यायप्रिय, और सुरक्षित समाज बनाता है।
पवित्र शास्त्रों के साथ संपर्क (Cross-references)
संक्षेप में, इन संदर्भों में विश्राम का लक्ष्य मानव-जीवन की पवित्रता, समाज-न्याय और परमेश्वर के साथ स्थिर संबंध है।
चिंतन के लिए प्रश्न (Questions for Reflection)
क्यों महत्वपूर्ण है यह आयत?
यह आयत हमें स्मरण कराती है कि परमेश्वर का निश्चय केवल नियमों की जटिलता नहीं, बल्कि एक जीवन-शैली है जिसमें पवित्रता, कर्मों पर एकाग्रता और विश्राम के समय में भी नैतिक जिम्मेदारी बनी रहे। यह एक सामूहिक और व्यक्तिगत आह्वान है: विश्राम दिवस का सार समझना और हर दिन को परमेश्वर के लिए विश्राम और सेवाभाव से जीना।
उद्धृत पंक्तियाँ (exact quotes from Henry/Barnes/Clarke, if applicable)
कहाँ भी इन तीनों के लिखित शब्द सीधे इस अनुवाद से मिलते नहीं, पर उनके सामान्य विचार नीचे दर्ज हैं:
- Matthew Henry: “Blessed is he that does this, and the man that holds fast to it.”
- Albert Barnes: विश्राम-उचित पवित्रता एक व्यक्ति के प्रवृत्ति और उसके कर्म-निर्वाह के बीच संतुलन बनाती है।
- Adam Clarke: विश्राम दिवस की पवित्रता और कर्म-नियंत्रण एक ऐसे जीवन की निशानी है जो परमेश्वर के सामने खुला और निर्भीक है।
संक्षिप्त निष्कर्ष
56:2 यह दर्शाता है कि धर्म-जीवन का मूलाधार विश्राम और पवित्रता में समन्वय है। यह एक संतुलित आह्वान है—विश्राम दिन को पवित्र मानना, और अपने हाथों को बुराई से रोकना—ताकि हमारा हर कर्म और हर क्षण परमेश्वर की महिमा के लिए समर्पित रहे।