यिर्मयाह 42:21 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका

देखो, मैं आज तुमको बता देता हूँ, परन्तु, और जो कुछ तुम्हारे परमेश्‍वर यहोवा ने तुम से कहने के लिये मुझको भेजा है, उसमें से तुम कोई बात नहीं मानते।

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यिर्मयाह 42:21 पद-दर-पद बाइबल टीका

यिर्मयाह 42:21 पर टिप्पणी (HINIRV)

वचन संदर्भ: यह संदर्भ वह घटनाक्रम है जिसमें यहूदा के निवासी शरण लेने के लिए यिर्मयाह के निर्देश का पालन करने से इनकार कर देते हैं और ईश्वर के संदेश को अस्वीकृत करते हैं। वचन में चेतावनी है कि जो संदेश-पत्र भेजा गया है, उसे अस्वीकार करने से परमेश्वर के निर्णय और उनके जीवन की दिशा पर गहरा प्रभाव पड़ेगा।

मुख्य अर्थ

यह आयत स्पष्ट करती है कि भविष्यवाणी उनके लिए एक स्पष्ट और मान्य संदेश है, परन्तु उनका अस्वीकार करना न केवल एक व्यक्तिगत अवज्ञा है, बल्कि परमेश्वर के आदेशों के साथ एक प्रतिरक्षा है। नीति-निर्णय और आचरण के संदर्भ में यह कहता है कि जो संदेश उनके प्रमुखों के द्वारा आया है, उसे स्वीकारना चाहिए या परिणामस्वरूप अत्यंत कठोर परिणाम भुगतने होंगे।

मध्य विषय—तीन प्रमुख बिंदु

  • आदेश की आस्थापन: प्रभु के दूत द्वारा आया सन्देश है; अस्वीकृति ईश्वर की योजनाओं की अवमानना है।
  • जिम्मेदारी और जवाबदेही: जब परमेश्वर ने स्पष्ट निर्देश दिए हों, तब मानव की अवहेलना स्वयं के लिए संकट का कारण बनती है।
  • प्रकृति की सजा-धर्म: ईश्वर के चेतावनियों को न मानना वहीं परिणाम देता है जो निष्कर्षतः भविष्य में असुविधाओं और संकटों के रूप में सामने आएगा।

गहरे विचार — पथ-प्रकाशित इशारे

- पुराने दूत-प्रणालियों में यह पुष्टि मिलती है कि परमेश्वर के संदेश को मानना चाहिए, क्योंकि यह भविष्य के लिए सुरक्षा और सचेतना देता है।

- यह आयत मानव स्वभाव के साथ भी चिपका हुआ है; हम कभी-कभी भ्रांतियों या भय के कारण सत्य से बचना चाहते हैं, परन्तु ईश्वर की योजना को मानना ही जीवन-निर्णय बनता है।

केंन्द्रित विषय—अन्य संबंधित आध्यात्मिक पाठ

1) डैनियल के समय-काल में अस्वीकार और विश्वसनीयता के बीच संघर्ष। (उचित संकेत के लिए संदर्भ: पूर्ववर्ती उद्धरणों में ईश्वर के संदेश की महत्ता)।

2) इस्राइल की विषमताओं में नबियों के संदेश की भूमिका और उनकी आज्ञाओं के पालन की महत्ता।

3) परमेश्वर की इच्छा को मानना क्यों आवश्यक है, यह आदत और आस्था के निर्माण की कुंजी है।

प्रयोजनात्मक चिंतन

इस आयत से सिखना यह है कि परमेश्वर की भाषा को मानना信, विश्वास और एक निष्ट जीवन-पथ दिखाता है। जब हम उसकी चेतावनियों और निर्देशों को स्वीकारते हैं, तब आशीषाओं के रास्ते खुलते हैं; इनकार करने से असुविधाओं और दुष्परिणामों का खतरा रहता है। यह एक सतर्कता की पुकार है कि हम हर संदेश के पीछे परमेश्वर की योजना को ढूंढ़ें, और धैर्य व नम्रता से उसमें चलें।

क्रॉस-रेफरेंसेस (संक्षिप्त सार सहित)

- यिर्मयाह 7:23–24: परमेश्वर की असीमित आज्ञाओं को मानना जीवन-शास्त्र बनता है; उनकी बातों को मानना बन्धन नहीं, आशीष है।

- औसत्ल-उद्धरण: यिर्मयाह 26:5-6 (अनुवादित विचार) — परिणामस्वरूप ईश्वर के संदेश को मानना जीवन और मृत्यु के लिये निर्णायक हो सकता है।

- यिर्मयाह 43:2-3: ऐतिहासिक अनुभव में अवज्ञा कैसे आन्तरिक संकट पैदा करती है; संदेश के प्रति विश्वास का महत्व।

संक्षिप्त समापन

यिर्मयाह 42:21 में संदेश को अस्वीकारना इस्राइल के भविष्य के लिए एक स्पष्ट चेतावनी है कि परमेश्वर की बातों को मानना जीवन के सुरक्षित पथ की कुंजी है। यह केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि हर पाठक के लिए आत्मा-चेतावनी है कि सच्ची वाणी पर टिकना और उसकी दिशा पर चलना कितना आवश्यक है।

नोट: इस टिप्पणी में Matthew Henry, Albert Barnes, Adam Clarke की प्रकाशित आध्यात्मिक उद्धरणों के संक्षिप्त संकेतों का समावेश किया गया है; यदि उपलब्ध हो तो उनके शब्द सीधे उद्धृत नहीं किए गए हैं।

*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।

यिर्मयाह 42:21 समानांतर पद और संबंधित वचन

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इसलिए मैं आज के दिन तुम से गवाही देकर कहता हूँ, कि मैं सब के लहू से निर्दोष हूँ।

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