Old Testament
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यिर्मयाह 1 यिर्मयाह 2 यिर्मयाह 3 यिर्मयाह 4 यिर्मयाह 5 यिर्मयाह 6 यिर्मयाह 7 यिर्मयाह 8 यिर्मयाह 9 यिर्मयाह 10 यिर्मयाह 11 यिर्मयाह 12 यिर्मयाह 13 यिर्मयाह 14 यिर्मयाह 15 यिर्मयाह 16 यिर्मयाह 17 यिर्मयाह 18 यिर्मयाह 19 यिर्मयाह 20 यिर्मयाह 21 यिर्मयाह 22 यिर्मयाह 23 यिर्मयाह 24 यिर्मयाह 25 यिर्मयाह 26 यिर्मयाह 27 यिर्मयाह 28 यिर्मयाह 29 यिर्मयाह 30 यिर्मयाह 31 यिर्मयाह 32 यिर्मयाह 33 यिर्मयाह 34 यिर्मयाह 35 यिर्मयाह 36 यिर्मयाह 37 यिर्मयाह 38 यिर्मयाह 39 यिर्मयाह 40 यिर्मयाह 41 यिर्मयाह 42 यिर्मयाह 43 यिर्मयाह 44 यिर्मयाह 45 यिर्मयाह 46 यिर्मयाह 47 यिर्मयाह 48 यिर्मयाह 49 यिर्मयाह 50 यिर्मयाह 51 यिर्मयाह 52Verse
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यिर्मयाह 42:8 का सरल अर्थ
इस पद में ईश्वर की आह्वानपूर्वक आवाज स्पष्ट है: यिर्मयाहीयाचकों ने परमेश्वर के वचन को सुनने के लिए कारेह के योहानान और उसके साथियों समेत सब लोगों को बुलाया, ताकि वे निर्णय समझ सकें और पथ पर लौटें।
पृष्ठभूमि और संदर्भ
यिर्मयाह के समय यहूदियों पर बंधन की तलवार टिकी थी। राज्य-राजनीति, भय और अय्यूबी के युद्ध-जोखिमों के बीच परमेश्वर का संदेश उनके सामने रखता है कि वे अपने भरोसे को राजा-प्रधानों या विदेशी सुरक्षा से नहीं, बल्कि परमेश्वर पर रखें। खुदाई में यह स्पष्ट है कि Yahweh ने लोगों को एक सार्वजनिक चर्चा के लिए बुलाया जिससे वे अपने दासत्व और अन्धविश्वास से उभरकर सत्य के मार्ग पर चलें।
व्याख्यात्मक टिप्पणियाँ
मूल विचार (संदर्भ-आधारित)
यह अध्याय यह दर्शाता है कि परमेश्वर कभी भी अपने लोगों को एकांत नहीं छोड़ते; वह सार्वजनिक रूप से उनकी निष्क्रियता पर ध्यान दिलाते हैं ताकि वे सत्य की ओर लौटें और अपनी योजना से विचलित न हों।
2-3 प्रासंगिक क्रॉस-रेफरेंसे:
• एक अन्य संदर्भ जो इस प्रकार के अनुरोध और पश्चात्ताप को उजागर करता है—यिर्मयाह 7:3-7: यह दिखाता है कि सत्यापित वातावरण और जन-समाजीकरण के साथ परमेश्वर की व्यवस्था कैसे कार्य करती है। व्याख्या: जन-समूह के सामने पथ-परिवर्तन की माँग, समुदायिक आस्था की पुष्टि के लिए जरूरी है।
• आस्था और आज्ञा के मेल परिशुद्धि—यिर्मयाह 26:12-15: राजाओं की राजनीतिक भूमिका के बीच भी संदेश आगे बढ़ता है कि आ Mouth से नहीं, बल्कि परमेश्वर के निर्देश से ही वास्तविक सुरक्षा मिलती है। व्याख्या: राजनीतिक दबाव के बावजूद परमेश्वर का वचन सर्वोपरि है।
• सिरफिरे चेतावनी से उद्धार की दिशा—यिर्मयाह 29:7: सभी के कल्याण हेतु शहर के शांति-चयन आवश्यक है; जब लोग शांति से रहते हैं, तब परमेश्वर का उद्देश्य पूरा होता है। व्याख्या: सामुदायिक सद्भाव और नीति-निर्माण में परमेश्वर की इच्छा प्राथमिक है।
शाब्दिक परिशिष्ट और उद्धरण (हिंदी अनुवादन के अनुरूप)
यहाँ सीधे शब्दों के उद्धरण Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के संक्षिप्त स्वरूप में नहीं दिए जा रहे, बल्कि उनके दृष्टिकोण से सार प्रस्तुत किया गया है। यदि आप चाहें तो उनके पूर्ण मौलिक उद्घरणों के लिए उपयुक्त पुरालेख देखें।
संक्षिप्त thematic outline
व्यावहारिक takeaway
हम भी उस समय के समान, अपने दिलों को खुला रखें, प्रमुख-नेतृत्व से नहीं, बल्कि परमेश्वर के वचन से मार्गदर्शित हों। यदि हम एक साथ सत्य की खोज और पथ-पर लौटने के लिए तैयार रहते हैं, तब ही सामाजिक और आध्यात्मिक पुनःस्थापना संभव है।