Old Testament
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यिर्मयाह 1 यिर्मयाह 2 यिर्मयाह 3 यिर्मयाह 4 यिर्मयाह 5 यिर्मयाह 6 यिर्मयाह 7 यिर्मयाह 8 यिर्मयाह 9 यिर्मयाह 10 यिर्मयाह 11 यिर्मयाह 12 यिर्मयाह 13 यिर्मयाह 14 यिर्मयाह 15 यिर्मयाह 16 यिर्मयाह 17 यिर्मयाह 18 यिर्मयाह 19 यिर्मयाह 20 यिर्मयाह 21 यिर्मयाह 22 यिर्मयाह 23 यिर्मयाह 24 यिर्मयाह 25 यिर्मयाह 26 यिर्मयाह 27 यिर्मयाह 28 यिर्मयाह 29 यिर्मयाह 30 यिर्मयाह 31 यिर्मयाह 32 यिर्मयाह 33 यिर्मयाह 34 यिर्मयाह 35 यिर्मयाह 36 यिर्मयाह 37 यिर्मयाह 38 यिर्मयाह 39 यिर्मयाह 40 यिर्मयाह 41 यिर्मयाह 42 यिर्मयाह 43 यिर्मयाह 44 यिर्मयाह 45 यिर्मयाह 46 यिर्मयाह 47 यिर्मयाह 48 यिर्मयाह 49 यिर्मयाह 50 यिर्मयाह 51 यिर्मयाह 52Verse
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यिर्मयाह 42:5 का पल्ला—स्थिति और आश्वासन
इस पद में यिर्मयाह को यहूदा के लोगों के समक्ष एक विशिष्ट तात्कालिक पाठ मिला: वे शिकायती प्रश्न लिए हुए पहुँचते हैं कि अगर परमेश्वर यहोवा उनके पास कोई वचन पहुँचाए और यदि वे उसको मानकर न करें, तो यहोवा हमारे बीच में सच्चा और विश्वासयोग्य साक्षी ठहरे। घटना से स्पष्ट होता है कि वे सीधे निर्णय लेने की स्थिति में हैं और परमेश्वर के निर्देश के बिना ही तत्काल विचार-विमर्श कर रहे हैं।
पाठ से बोध: परमेश्वर की विश्वसनीयता और विश्वास का परीक्षण
यह वाक्य तीन प्रमुख बातें उभारता है: पहला, परमेश्वर के वचन का आना एक मानवीय समुदाय के लिए वास्तविकता बनता है; दूसरा, उस वचन के अनुरूप चलना परमेश्वर के साथ सच्चे संबंध का परीक्षण है; तीसरा, यदि इरादा अवहेलना या विरोध में हो तो परिणामस्वरूप परमेश्वर की साक्ष्यता कठिनाई में खड़ी होती है। उस समय के संदर्भ में यहूदा के लोग अपनी सुरक्षा और भविष्य के बारे में तर्क करते थे, परन्तु उनके विचार उनके परमेश्वर-निर्भरता की कसौटी पर टिक नहीं सके।
कहानी के शब्द और छवि-समझ
“तथा यदि हम उसके अनुसार न करें” यह एक स्पष्ट दूरी है जो उनके मन में यह विश्वास भर देती है कि यदि परमेश्वर का निर्देश उनके अनुसार नहीं होता, तो वह भी विश्वासयोग्य नहीं रहेगा। परन्तु वास्तविकता यह है कि परमेश्वर के प्रति निष्क्रिय या विरोधी उद्देश्य उन्हें परिणामों से अवगत कराते हैं। यह पाठ इस बात को उजागर करता है कि परमेश्वर अपने लोगों के सामने सच्चे और विश्वसनीय हैं—यह उसकी प्रकृति का भाग है—परन्तु उनके लिए आवश्यक है कि वे उसी के अनुसार व्यवहार करें।
संयोजन उपदेश: कुछ स्पष्ट शब्दों की व्याख्या
अनुरंजनित क्रॉस-रेफरेंसेस
• व्यवस्थात्मक विश्वास के बारे में अधिक स्पष्टता के लिए: चरित्र-विश्वास पर जोर देने वाले अन्य संदर्भ—यशायाह और इब्रानियों के में भी यह विचार मिलता है कि भगवान का सत्य और विश्वसनीयता उनकी प्रेरणा से परिक्षण में रहती है।
• परमेश्वर के वचनों के पालन की आवश्यकता पर ध्यान देने वाले अन्य पाठ: यहरूषेल, दलील जैसे हिस्सों में लोग परमेश्वर के निर्देशों के आधार पर ही जीवन-सार लेते हैं।
• नैतिक परिणाम-उत्पन्नी निर्णय: परमेश्वर के साथ हमारे रिश्ते का सीधा प्रभाव हमारे निर्णयों पर होता है।
आज के लिए लागू प्रेरणा
1) आप अपने जीवन में परमेश्वर के वचन के प्रति ईमानदार रहें। वह सच्चा और विश्वसनीय है; उसका वचन आपका मार्गदर्शक है।
2) कठिनाई या संदेह के समय, अपने निर्णयों की परख करें कि क्या वे परमेश्वर के निर्देश के अनुरूप हैं। यदि नहीं, तो मैदान छोड़कर लौटना आवश्यक हो सकता है।
3) समुदाय के साथ मिलकर पूछना कि क्या हम उन वचनों के अनुसार चल रहे हैं जिन्हें उसने स्पष्ट किया है—यह एक सार्वजनिक तात्पर्य है कि मानना और पालन एक साथ चलते हैं।
निष्कर्ष
यिर्मयाह 42:5 हमें दिखाता है कि ईश्वर की सच्चाई और विश्वसनीयता मानव-निर्णयों के साथ टकराती नहीं, बल्कि उसे मार्गदर्शित करती है। यदि हम सचमुच उसके आदेशों के अनुसार चलें, तो वह हमारे बीच में साक्षी बना रहता है। यह प्रेरणा आज भी हमारे लिए है: आस्था का अवलंब वचन में है, न कि अपने तर्कों या भय के आधार पर बनी योजनाओं में।
उद्धृत अनुभागों के समानांसी विचारधाराओं के लिए समन्वित क्रॉस-रेफरेंसेस में Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के संक्षिप्त उद्धरण केवल तब दिये जाते हैं जब वे मौलिक रूप से उपयोगी और ठीक-ठाक हों।