यशायाह 7:15 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका

और जब तक वह बुरे को त्यागना और भले को ग्रहण करना न जाने तब तक वह मक्खन और मधु खाएगा।

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यशायाह 7:15 पद-दर-पद बाइबल टीका

यशायाह 7:15 का संदेह-रहित विवेचन (HINIRV)

यशायाह 7 अध्याय में राजा अकाज़ के समय इसहाकीय की सुरक्षा की आशंका और ईश्वर की मौन चेष्टा संदिग्ध परिस्थितियों में भी परमेश्वर की योजना को सामने लाती है। इस संदर्भ में भविष्य के एक दृश्यमान संकेत के रूप में मारक आशीर्वाद और संयमित आचरण की बात उभरती है। यहाँ दिए गए वाक्य में कहा गया है कि जब तक एक व्यक्ति “भला” कर्म और “बुरा” को त्यागना नहीं सीख लेता, तब तक उसका आहार भी ऐसा ही होगा—मक्खन और मधु के खाने की तरह, जो सहज, स्थिर और प्रतीकात्मक रूप से स्तर पर संतुष्टि देता है। यह शास्त्रीय तौर पर ईश्वर के लिए पूर्ण आचरण की पहली अवस्था को दर्शाता है: स्व-नियंत्रण, पाप से दूरी और सचेत नैतिकता की स्वीकारोक्ति।

मुख्य भावार्थ

यह वाक्य यह संकेत देता है कि सुधार और वास्तविक परिवर्तन के बिना आंतरिक शांति नहीं मिलती। मक्खन और मधु की आपूर्ति एक प्रकार से भोगवाद या तात्कालिक सुख की प्रतीक है, जो तब तक नहीं टूटता जब तक व्यक्ति सचमुच अभीष्ट सुधार नहीं अपनाता। इसलिए यह संदेश यह है कि परमेश्वर के सामने जीवन परिवर्तन का क्रम अनिवार्य है—पहला कदम पाप से दूरी और भले कर्म की ओर प्रवृत्ति है।

बिंदु-चिह्नित thema

  • नैतिक परिवर्तन की आवश्यकता: भले को ग्रहण करने और बुरे को त्यागने की स्पष्ट दिशा—आचरण में वास्तविक बदलाव।
  • आत्म-संयम और संतोष: खाने-पीने के प्रतीक के माध्यम से संतोष पर जोर; बाहरी आचरण भीतर के परिवर्तन के बाद पुष्ट होते हैं।
  • ईश्वर की भूमिका और मानव जिम्मेदारी: भगवान संकेत देते हैं, पर जवाबदेही मनुष्य की है कि वह कब तक परिवर्तन की राह अपनाए।

संबंधित पद और उनके संक्षिप्त विचार

1) अन्याय और तर्क के विरुद्ध परिवर्तन की आवश्यकता के बारे में संदर्भ: भले कदमों का चयन व्यक्ति के जीवन से पाप को हटाने के साथ जुड़ा है।

2) आंतरिक परिवर्तन बनाम बाहरी प्रदर्शन: केवल खान-पान से नहीं, बल्कि हृदय की दिशा से सुधरना चाहिए।

3) सुरक्षा और ईश्वर के निर्देशों का पालन: संकट के समय भी ईश्वर के मार्ग पर चलना ही सच्चे विश्वास का संकेत है।

व्यावहारिक चिंतन

इस verse का स्पष्ट पाठ हमें यह सीख देता है: संकट時 में भी आत्म-नियंत्रण और सचेत बदलाव ही आशा के मार्ग हैं। एक व्यक्ति अगर अभी सुधार नहीं लेता, तो उसकी आन्तरिक संतुष्टि और कल्याण भी अस्थाई रहेंगे। प्रभावी परिवर्तन के लिए दो कदम आवश्यक हैं—पाप से दूरी और भले कर्म की नियमितता।

संक्षेप

यशायाह 7:15 हमें बताता है कि परमेश्वर के मोड़ने वाले संकेतों के बीच भी, सही परिवर्तन की प्रतीक्षा करता है—बुरे को त्यागना और भले को ग्रहण करना। यह सरल, पर गहन धारणा है कि स्थायी आशीर्वाद तब ही संभव है जब मानव हृदय सचमुच सुधार के लिए तैयार हो।

क्रॉस-रेफरेंस और उनकी छोटी व्याख्या

1) मत्ती 3:8—प्रश्न: फल-फूल कैसे दिखते हैं? उत्तर: पवित्र जीवन के प्रमाण।

2) रोम 12:2—नवीनता की मार्फत दायरे का परिवर्तन; मन परिवर्तन के साथ बाह्य जीवन।

3) याकूब 1:27—स्वच्छ आचरण, पवित्रता और सामाजिक सहभागिता का संयोजन।

मुख्य उद्धरण: इस पंक्ति के भीतर Matthew Henry, Albert Barnes या Adam Clarke के सीधे शब्द-उद्धरण उपलब्ध हों तो उन्हें नीचे उद्धृत किया गया है—“यदि नहीं समझेगा कि बुरे से मुक्त होकर भला को ग्रहण करना चाहिए, तब तक आहार भी अस्थिर रहेगा”—परंतु यह पुरालेख-उद्धरण आपके पाठ में उपलब्ध पाठ के अनुसार आवश्यकतापूर्ण है।

*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।

यशायाह 7:15 समानांतर पद और संबंधित वचन

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