Old Testament
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मत्ती 27:1 मत्ती 27:2 मत्ती 27:3 मत्ती 27:4 मत्ती 27:5 मत्ती 27:6 मत्ती 27:7 मत्ती 27:8 मत्ती 27:9 मत्ती 27:10 मत्ती 27:11 मत्ती 27:12 मत्ती 27:13 मत्ती 27:14 मत्ती 27:15 मत्ती 27:16 मत्ती 27:17 मत्ती 27:18 मत्ती 27:19 मत्ती 27:20 मत्ती 27:21 मत्ती 27:22 मत्ती 27:23 मत्ती 27:24 मत्ती 27:25 मत्ती 27:26 मत्ती 27:27 मत्ती 27:28 मत्ती 27:29 मत्ती 27:30 मत्ती 27:31 मत्ती 27:32 मत्ती 27:33 मत्ती 27:34 मत्ती 27:35 मत्ती 27:36 मत्ती 27:37 मत्ती 27:38 मत्ती 27:39 मत्ती 27:40 मत्ती 27:41 मत्ती 27:42 मत्ती 27:43 मत्ती 27:44 मत्ती 27:45 मत्ती 27:46 मत्ती 27:47 मत्ती 27:48 मत्ती 27:49 मत्ती 27:50 मत्ती 27:51 मत्ती 27:52 मत्ती 27:53 मत्ती 27:54 मत्ती 27:55 मत्ती 27:56 मत्ती 27:57 मत्ती 27:58 मत्ती 27:59 मत्ती 27:60 मत्ती 27:61 मत्ती 27:62 मत्ती 27:63 मत्ती 27:64 मत्ती 27:65 मत्ती 27:66



मत्ती 27:44 का संधारण और संदर्भ
यूहन्नी क्रूस पर चढ़े यीशु के साथ क्रॉस पर बैठे अपराधियों में से एक की विहंगम निन्दा और अस्वीकार का यह नया स्वरूप बताता है। इस शेष क्रूर भीड़-चाल के सामने, अनेक लोग यीशु की निंदा करते रहे, परन्तु यह दोनों राक्षसी व्यवहार के बीच एक दिव्यता और निरपेक्ष ध्यान की लहर दिखाती है। इस पद को ईसा के दर्द, बहादुरी और शुद्धत्याग के संदर्भ में समझना अत्यंत आवश्यक है।
मुख्य अर्थ
क्रूस पर दोनों डाकुओं में से एक की निन्दा का यह स्वर उनकी चरित्र-स्थिति को रेखांकित करता है: जो लोग ईसा के साथ थे, वे उनकी मान्यता के विपरीत व्यवहार दिखाते हैं, और जो दूर-देश रहते थे, वे भी विश्वास के संकेतों को नहीं समझते। परन्तु एक पल ऐसा भी आता है जब यीशु का करुणा-भरा उपदेश, उनके हृदय को खोल देता है और वह अपनी गलती स्वीकार कर लेता है। यह संदेश शुद्ध रीति से दिखाता है कि उद्धार की राह में विपरीत प्रतिक्रियाएँ समान नहीं होतीं—कभी-कभी अत्यंत गहरे घावों के बीच भी कृपा का प्रकाश दिख सकता है।
तीन प्रमुख विषय
संदर्भ प्रासंगिक cross-references
1) लूका 23:39-43 — डाकुओं में से एक विश्वास में परिवर्तित होता है और यीशु के साथ आश्वासन प्राप्त करता है: यह उद्धार के आशय को पुष्ट करता है कि दया कभी-कभी अविश्वास के बीच भी प्रवेश कर सकती है।
2) मरकुस 15:32 — क्रूस के पास उपस्थित जनसमूह और विरोधाभास अधिक स्पष्ट होता है; यह प्रकरण ईसा की महानता और मानव प्रतिक्रियाओं के भेद को बताता है।
3) योहन्ना 19:26-27 — यीशु के दुख के बीच माता-पिता-सम्बन्ध का उल्लेख, जो पीड़ा के समय भी प्रेम और कर्तव्य की राह दिखाती है।
जीवनपरक विचार
यह पद हमें यह स्मरण कराता है कि उद्धार की राह कई बार संघर्षों से होकर गुजरती है। विश्वास का आरम्भ कभी-कभी धैर्य के साथ होता है और यह स्वीकार करता है कि परमेश्वर की कृपा दर्द के बीच भी पहुँचती है। हमारा दायित्व है कि हम निन्दा से दूर रहें, दूसरों के लिए दया का संदेश बनें, और अवसर मिलते ही ईसा के प्रति विश्वास दिखाएं।
संक्षिप्त समापन
इस verse में दिखती निन्दा और अंततः विश्वास की संभवना उद्धार के धन-स्त्रोत को स्पष्ट करती है: क्रूस के दुख के बीच भी परमेश्वर की करुणा सच है, और जो व्यक्ति ईसा की शरण में आता है, उसे वह उद्धार का आश्वासन देता है।
नोट और उद्धरणीय विचार
यह पाठ Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के सार्वजनिक-domain टिप्पणी-आंकड़ों से प्रेरित एक समेकित व्याख्या के साथ प्रस्तुत किया गया है, ताकि पाठक एक समेकित एवं सहज समझ प्राप्त कर सकें।