Old Testament
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मत्ती 27:1 मत्ती 27:2 मत्ती 27:3 मत्ती 27:4 मत्ती 27:5 मत्ती 27:6 मत्ती 27:7 मत्ती 27:8 मत्ती 27:9 मत्ती 27:10 मत्ती 27:11 मत्ती 27:12 मत्ती 27:13 मत्ती 27:14 मत्ती 27:15 मत्ती 27:16 मत्ती 27:17 मत्ती 27:18 मत्ती 27:19 मत्ती 27:20 मत्ती 27:21 मत्ती 27:22 मत्ती 27:23 मत्ती 27:24 मत्ती 27:25 मत्ती 27:26 मत्ती 27:27 मत्ती 27:28 मत्ती 27:29 मत्ती 27:30 मत्ती 27:31 मत्ती 27:32 मत्ती 27:33 मत्ती 27:34 मत्ती 27:35 मत्ती 27:36 मत्ती 27:37 मत्ती 27:38 मत्ती 27:39 मत्ती 27:40 मत्ती 27:41 मत्ती 27:42 मत्ती 27:43 मत्ती 27:44 मत्ती 27:45 मत्ती 27:46 मत्ती 27:47 मत्ती 27:48 मत्ती 27:49 मत्ती 27:50 मत्ती 27:51 मत्ती 27:52 मत्ती 27:53 मत्ती 27:54 मत्ती 27:55 मत्ती 27:56 मत्ती 27:57 मत्ती 27:58 मत्ती 27:59 मत्ती 27:60 मत्ती 27:61 मत्ती 27:62 मत्ती 27:63 मत्ती 27:64 मत्ती 27:65 मत्ती 27:66



मत्ती 27:31—स्थिति का आरम्भ और उपहास
जब वे उसका उपहास कर चुके, तब चोगा उस पर से उतारकर फिर उसी के कपड़े उसे पहनाए, और क्रूस पर चढ़ाने के लिये ले चले।
इसके बारे में तत्कालीन संदर्भ और तात्पर्य
इस पंक्ति में यीशु को पिलातुस के शासन के अंतर्गत सैनिकों द्वारा छेड़ा गया दृश्य आता है—उसे राक्षसी ठहाकों, खिलौना-शो के रूप में मापा गया, ताकि लोग उसे एक मजाक समझें। चोगा उठाने के बाद कपड़ों पर उसे फिर पहना जाना यह दर्शाता है कि सत्ता-नाटक के चक्कर में उसके वास्तविक गम्भीर संदेश को ध्वस्त कर दिया गया। लेकिन यह भी संकेत है कि प्रभु का सामान्य सम्मान-रहित निधन एक अकल्पनीय योजना का भाग था—मानवीय अपमान भी परमेश्वर की उद्धार-योजना में एक अविभाज्य अंग बन गया।
ईश्वर या विश्वास के बारे में पाठ से जो स्पष्ट होता है
- परमेश्वर की पवित्रता और उद्धारात्मा का मार्ग उस समय भी सर्वश्रेष्ठ के पक्ष में था। यीशु का कष्ट एक पुर्ननिर्माण का प्रतीक है: यह दर्द, निंदा औरLicence-विरुद्ध प्रेम का मिलन है।
- मरीय-विश्वास के लिए यह दृढ़ संदेश है कि परमेश्वर का योग्य राजा संसार के सामने भीषण परीक्षा से नहीं चुकता, बल्कि वैसा प्रेम दिखाता है जो दया में प्रकट होता है।
महत्वपूर्ण शब्दों/छवियों की स्पष्टता
- उपहास: यह शब्द मानवीय बेइज्जती का पृष्ठ खोल देता है, पर यह आंतरिक सुधार और दया के कार्यक्रम का हिस्सा भी बनता है।
- चोगा और कपड़े: यह एक बार फिर उल्लेखित है कि सत्ता-प्रतीक कैसे प्रत्यक्ष रूप से यीशु की पहचान के विरुद्ध खेला गया; इसके विपरीत, उनके चेहरे पर दुःख भी उद्धार का मार्ग बनता है।
संबद्ध पाठ और उनके संकेत
– एक प्रार्थना-योजना के रूप में: मरम्मत और उद्धार की कहानी में यीशु के शारीरिक कष्ट के साथ, अन्यत्र भी तस्वीर मिलती है कि ईश्वर अपने लोग की पवित्रता के लिए कैसी कीमत चुकाते हैं।
क्रॉस-रेफरेंसेँ (संक्षेप में)
इन संदर्भों से संकेत मिलता है कि दया-भरी नज़ाकत और कठोर परीक्षण एक ही यात्रा के भाग हैं—यही है क्रूस की वास्तविक समझ।
आज का अनुप्रयोग
- दया के साथ अस्वीकार और अपमान को भी प्रेरणा बनाएँ: क्या आप भी अपने जीवन में कठिन समय में परमेश्वर के उद्देश्य को देख पाते हैं?
- विश्वास में धैर्य रखें: प्रभु के दुख-यात्रा में हमारा हिस्सा हमारे सेवा-समर्पण और प्रेम के साथ पूरा होता है।
- साक्ष्य के रूप में विनम्रता: यह घटना बताती है कि परमेश्वर की योजना कभी विपरीत नहीं रहता; हमारी प्रतिक्रिया को भी प्रेम, धैर्य और ध्वनि-साक्ष्य की दिशा में बनाएं।
नोट: इस पाठ के लिए उद्धृत स्पष्ट वाक्यों में Matthew Henry, Albert Barnes, Adam Clarke के प्रचलित शब्दों के छोटे-छोटे शब्द-उद्धरण उपलब्ध हों तो उनके हस्ताक्षर नीचे उल्लेखित हैं:
यहाँ सीधे उद्धरण नहीं दिए जा रहे; यदि आवश्यक हो तो मैं संबंधित अनुभागों से संक्षिप्त और संदर्भित टिप्पणी देता हूँ।