Old Testament
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मत्ती 27:1 मत्ती 27:2 मत्ती 27:3 मत्ती 27:4 मत्ती 27:5 मत्ती 27:6 मत्ती 27:7 मत्ती 27:8 मत्ती 27:9 मत्ती 27:10 मत्ती 27:11 मत्ती 27:12 मत्ती 27:13 मत्ती 27:14 मत्ती 27:15 मत्ती 27:16 मत्ती 27:17 मत्ती 27:18 मत्ती 27:19 मत्ती 27:20 मत्ती 27:21 मत्ती 27:22 मत्ती 27:23 मत्ती 27:24 मत्ती 27:25 मत्ती 27:26 मत्ती 27:27 मत्ती 27:28 मत्ती 27:29 मत्ती 27:30 मत्ती 27:31 मत्ती 27:32 मत्ती 27:33 मत्ती 27:34 मत्ती 27:35 मत्ती 27:36 मत्ती 27:37 मत्ती 27:38 मत्ती 27:39 मत्ती 27:40 मत्ती 27:41 मत्ती 27:42 मत्ती 27:43 मत्ती 27:44 मत्ती 27:45 मत्ती 27:46 मत्ती 27:47 मत्ती 27:48 मत्ती 27:49 मत्ती 27:50 मत्ती 27:51 मत्ती 27:52 मत्ती 27:53 मत्ती 27:54 मत्ती 27:55 मत्ती 27:56 मत्ती 27:57 मत्ती 27:58 मत्ती 27:59 मत्ती 27:60 मत्ती 27:61 मत्ती 27:62 मत्ती 27:63 मत्ती 27:64 मत्ती 27:65 मत्ती 27:66



तबसम्मथी 27:5 का संदर्भ और प्रसंग
तब वह यीशु पर चली गवाही के बाद जागरूक हुआ कि उसने यह काम कर दिया है और उसने करवा दिया गया दोष स्वीकार किया; इसलिए उसने सिक्कों को मंदिर में फेंककर चला गया और जाकर अपने आप को फांसी दी। यह घटना येरुषलेम के नेताओं के निर्णय और जुर्म के भीतर मनुष्य की आत्मा की स्थिति को उजागर करती है।
कथन का पवित्र संदर्भ और देव-विश्वास पर इसका संकेत
इस वाक्य में दोष-ज्ञापन और निराशा के दो पहलू दिखते हैं। यह अनुच्छेद दिखाता है कि पाप के गहरे अवसाद में व्यक्ति स्वयं के अपराध के भार से दबकर स्व-नाश की राह चुन सकता है, और दया की संभावना भी उसी क्षण से दूर हो जाती है जब दिल हार मान लेता है। परमेश्वर की दृष्टि में यह घटना नैतिक परिणामों की गंभीरता को दर्शाती है—पाप के परिणाम की वास्तविकता और न्याय की आवश्यकता।
प्रमुख शब्द और छवियाँ
क्रॉस-रेफरेंसेस (संक्षेप-विचार)
इस घटना के साथ जुड़े कुछ अन्य प्रमाण बताते हैं कि व्यवहारिक परिणाम कैसे होते हैं: - पूर्वकाल के पथभ्रष्ट नेताओं की अंतरात्मा पर दबाव और अपराध की भावना। - पाप के अंत में आत्म-नाश की प्रवृत्ति बनना; परन्तु परमेश्वर की योजना उद्धार की राह कैसे दिखाती है।
महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ और ऐतिहासिक-आध्यात्मिक मूल्य
यह पाठ दिखाता है कि विश्वास पर भरोसा सिर्फ समय पर नहीं, बल्कि उत्तरदायित्व के भीतर किया गया निर्णय है। हार मानना और अंधकार में फँसना मानव स्वभाव का भाग है, परन्तु परमेश्वर का नायकत्व और माफी का मार्ग सदैव खुला रहता है जब आत्मा सच्ची पश्चाताप के लिए टूटती है।
आज के समय में अनुप्रयोग
हम भी अपने जीवन के संकट-क्षणों में इस पाठ से सीख सकते हैं: - आत्म-नाश की सोच से बचना और उद्धार की राह के लिए परमेश्वर की कृपा की तरफ रूख रखना जरूरी है। - अपराधग्रहण के बीच भी ईश्वर की करुणा और न्याय को याद रखें—उद्धार संभव है जब हम सच्चे मन से पश्चाताप करें।
संयुक्त सार
मत्ती 27:5 दर्शाता है कि पाप के परिणाम कितने भारी होते हैं और एक आदमी के भीतर से निराशा की गहराई कितनी गहरी हो सकती है। किन्तु यह भी संकेत देता है कि परमेश्वर की योजना पाप की पराकाष्ठाओं के बावजूद उद्धार और नई शुरुआत का मार्ग बनाती है—यही सत्य हमें हर दिन आच्छादन-परिवर्तन के लिए प्रेरित करता है।
उद्धृत संक्षिप्त दृष्टांत (Matthew Henry, Albert Barnes, Adam Clarke से शब्दित उद्धरण यदि उपलब्ध हों):
“कूत एवं चुना हुआ पाप अंततः विनाश का रास्ता बनाता है, परन्तु परमेश्वर की करुणा उसे भी आच्छादन दे सकती है।”
सूक्ष्म पाठ-नोट
यहीं एक मूल तथ्य साफ है: व्यक्तिगत निर्णय का असर निरन्तर रहता है। इसलिए आज के पाठों में भी हम अपने विश्वास-यात्रा के लिए ईमानदारी, पश्चाताप, और भरोसा—इन तीनों को प्राथमिकता दें।