Old Testament
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मत्ती 2:23 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
और नासरत नामक नगर में जा बसा, ताकि वह वचन पूरा हो, जो भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा कहा गया थाः “वह नासरी* कहलाएगा।” (लूका 18:7)
मत्ती 2:23 पद-दर-पद बाइबल टीका
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मत्ती 2:23 समानांतर पद और संबंधित वचन
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यूहन्ना 1:45 (HINIRV) »
फिलिप्पुस ने नतनएल से मिलकर उससे कहा, “जिसका वर्णन मूसा ने व्यवस्था में और भविष्यद्वक्ताओं ने किया है, वह हमको मिल गया; वह यूसुफ का पुत्र, यीशु नासरी है।” (मत्ती 21:11)

न्यायियों 13:5 (HINIRV) »
क्योंकि तू गर्भवती होगी और तेरे एक बेटा उत्पन्न होगा। और उसके सिर पर छुरा न फिरे, क्योंकि वह जन्म ही से परमेश्वर का नाज़ीर रहेगा; और इस्राएलियों को पलिश्तियों के हाथ से छुड़ाने में वही हाथ लगाएगा।”

मरकुस 1:24 (HINIRV) »
उसने चिल्लाकर कहा, “हे यीशु नासरी, हमें तुझ से क्या काम? क्या तू हमें नाश करने आया है? मैं तुझे जानता हूँ, तू कौन है? परमेश्वर का पवित्र जन!”
मत्ती 2:23 — नासरत में बसेरा और भविष्यवाणी की पूर्ति
इस पद में यीशु के बचपन के एक पड़ाव की प्रक्रिया दिखाई देती है: वह नासरत नगर में बस गया ताकि भविष्यवाणी पूरी हो सके कि “वह नासरी कहलाएगा।” यह वाक्य लूका 18:7 के साथ एक संगतता प्रस्तुत करता है—यह दर्शाता है कि यीशु का जीवन कौन-सी कथा-परंपरा और किन पवित्र नियमों के अनुरूप पूरा हुआ है। धर्मशास्त्रीय दृष्टि से यह बताता है कि यीशु का जन्म और जीवन एक उद्देश्यपूर्ण योजना का हिस्सा थे, न कि किसी व्यक्ति-विशेष के आकस्मिक घटनाचक्र।
मुख्य अर्थ
मत्ती 2:23 में कहा गया है कि यीशु नासरत में रहने लगे ताकि यह वचन पूरा हो—“वह नासरी कहलाएगा।” यह उद्धारकर्ता के जीवन के शुरुआती चरणों को उदाहरण के रूप में स्थिर करता है कि वह मानव-यात्रा में एक भीड़-भाड़ से उठकर सामान्य जीवन के साथ जुड़कर उतरा है। नासरत एक ग़ैर-राजसी, साधारण समुदाय का नाम है; यहाँ Jesus के नासरयी कहलाने से यह सच उजागर होता है कि उनका आध्यात्मिक महानत्व सामान्य मानवता के साथ गहराई से जुड़ा रहा।
तीन प्रमुख विषय
संबद्ध पाठ
– मत्ती 2:23 की यह सोच पुरानी भविष्यवाणियों की स्थायित्व से जुड़ती है और लूका 18:7 के संदर्भ में भी परिलक्षित होती है कि प्रभु के कार्य का स्वरूप सामान्य जीवन के भीतर है।
व्यावहारिक विचार
हम कैसे नासरत के समान सरल और विनम्र जीवन से उद्धार की योजना का भाग बनते हैं? ईश्वर की योजनाएं अक्सर हमारे दैनिक-जीवन के छोटे-छोटे पहलुओं में प्रकट होती हैं—परिवार, समुदाय, और सामान्य जिम्मेदारियाँ। यीशु की सूचीबद्ध पहचान हमें प्रेरित करती है कि हम भी अपने चरणों को विशिष्ठताओं से ऊपर उठाकर ईश्वर के उद्देश्य के अनुरूप चलें।
क्रॉस-रेफरेंसेस (संक्षेप)
1) मत्ती 1:23 — “ईश्वर का पुत्र” के रूप में जन्म की पवित्र भूमिका बनाये रखना; 2) लूका 2:51–52 — यीशु का पिता-परिवार के साथ स्थायित्व और आस्था में वृद्धि; 3)यूहन्ना 1:14 — शब्द मनुष्य बनकर हमारे बीच आना—नासरत की पहचान का गहरा आध्यात्मिक अर्थ।
इन संदर्भों से स्पष्ट होता है कि यीशु की नासरी-स्वीकार्यता भरोसे और समर्पण का प्रकटन है, जो कि उद्धार के उद्देश्य को आगे बढ़ाती है।
छोटी-सी समापनी
यह वचन बताता है कि ईश्वर की योजना संसार के बड़े प्रतीकों के बजाय छोटे, निर्विशेष जीवनों में भी पूरी होती है। यीशु का नासरी-केवल नाम से पहचाना जाना यह दर्शाता है कि उद्धार एक सामान्य मानव जीवन के माध्यम से आया—जो हर रोज़ की साधारण गतिविधियों में दमकता है।
नोट: इस पंक्ति में Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के कुछ उल्लेखित निष्कर्षों को शामिल किया गया है। उनके शब्दों से प्रेरणा मिलती है कि यीशु की पहचान सामान्य और विंगित नहीं, बल्कि ईश्वर की पवित्र योजना की अभिव्यक्ति है।
संक्षेप
मत्ती 2:23 यीशु के जीवन की एक योजना-संरेखित शुरुआत है: नासरत में बसना ताकि वह नासरी कहलाए—यह भविष्य-प्रवृत्ति की पूर्ति का संकेत है और यह दिखाता है कि ईश्वर का उद्धारकार्य कैसे ordinary जीवन से प्रारंभ होता है।