Old Testament
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यिर्मयाह 1 यिर्मयाह 2 यिर्मयाह 3 यिर्मयाह 4 यिर्मयाह 5 यिर्मयाह 6 यिर्मयाह 7 यिर्मयाह 8 यिर्मयाह 9 यिर्मयाह 10 यिर्मयाह 11 यिर्मयाह 12 यिर्मयाह 13 यिर्मयाह 14 यिर्मयाह 15 यिर्मयाह 16 यिर्मयाह 17 यिर्मयाह 18 यिर्मयाह 19 यिर्मयाह 20 यिर्मयाह 21 यिर्मयाह 22 यिर्मयाह 23 यिर्मयाह 24 यिर्मयाह 25 यिर्मयाह 26 यिर्मयाह 27 यिर्मयाह 28 यिर्मयाह 29 यिर्मयाह 30 यिर्मयाह 31 यिर्मयाह 32 यिर्मयाह 33 यिर्मयाह 34 यिर्मयाह 35 यिर्मयाह 36 यिर्मयाह 37 यिर्मयाह 38 यिर्मयाह 39 यिर्मयाह 40 यिर्मयाह 41 यिर्मयाह 42 यिर्मयाह 43 यिर्मयाह 44 यिर्मयाह 45 यिर्मयाह 46 यिर्मयाह 47 यिर्मयाह 48 यिर्मयाह 49 यिर्मयाह 50 यिर्मयाह 51 यिर्मयाह 52Verse
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पठनीय संदर्भ और तत्काल परिप्रेष्य
यिर्मयाह 49:11 मूदी और मूर्तिपूजा के विरोधी सन्देशों के बीच आया है। यह शोकान्वित बोल मूआब के प्रति भविष्यद्वाणी क्रम में स्थित है, जहाँ ईश्वर मूआब की ऊँचाइयों और आत्मनिर्भरता का पराभव घोषित कर रहे हैं। यहाँ भाष्य एक ऐसे समाज की तस्वीर देता है जो संकट में अपने परिवारों से अलग-थलग हो चुका है और जिसके परिणामस्वरूप अनाथ और विधवाएँ असुरक्षित रह जाती हैं।
वचन से क्या उजागर होता है — ईश्वर और विश्वास
आयत कहती है: "अपने अनाथ बालकों को छोड़ जाओ, मैं उनको जिलाऊँगा; और तुम्हारी विधवाएँ मुझ पर भरोसा रखें।" यह वचन ईश्वर की दया और न्याय दोनों को प्रदर्शित करता है। संकट में वह इतरों के परित्याग के बीच भी अपनी करुणा दिखाने का आश्वासन देता है। साथ ही यह वचन उस सामूहिक दुष्प्रवृत्ति का निन्दनीय परिणाम बताता है जब लोग परिवार छोड़कर स्वार्थी सुरक्षा खोजते हैं—पर ईश्वर ऐसे परित्यक्तों का रक्षक बनता है।
मुख्य शब्द और चित्रों की व्याख्या
"अनाथ बालक" और "विधवा" बाइबिल में समाज के सबसे निर्बल समूह होते हैं। इनका उल्लेख न्याय के विषय में परमेश्वर की प्राथमिकताओं को दर्शाता है। "जिलाना" का अर्थ यहाँ केवल भोजन देना नहीं, बल्कि जीवन प्रदान करने, संरक्षण करने और अनुकंपा दिखाने का संपूर्ण अर्थ लिए है। यह वचन यह भी इंगित करता है कि ईश्वर की उद्धारकर्ता कृपा राजनैतिक या मानवीय शक्ति पर निर्भर नहीं करती, परन्तु उसकी स्वप्रतिज्ञा पर टिकती है।
सम्बन्धित स्थल और उनका संक्षिप्त सम्बन्ध
पुरानी टिप्पणीकारों की संक्षिप्त टिप्पणियाँ
मैथ्यू हेनरी ने ऐसे स्थानों पर ईश्वर की कोमलता और न्याय पर बल दिया है; उन्होंने लिखा है कि संकट में परमेश्वर का दिल अनाथों और विधवाओं के प्रति संवेदनशील रहता है (सटीक उद्धरण यहाँ छोटा हो सकता है)। अल्बर्ट बार्न्स ने भी बताया कि यह वचन ईश्वर की सामाजिक व्यवस्था और सामुदायिक ज़िम्मेदारी का संकेत है। आदम क्लार्क ने भाषा के बारीक अर्थों पर ध्यान देते हुए बताया कि "जिलाना" में संरक्षण और पुनर्स्थापना दोनों शामिल हैं। (यदि किसी से सटीक शब्द उद्धृत किया गया है तो वह संक्षेप में ऊपर दिया गया है।)
आधुनिक जीवन के लिए प्रयोग
यह आयत हमें परिभाषित करती है कि संकट के समय व्यक्तिगत और सामूहिक उत्तरदायित्व कैसा होना चाहिए। जब समाज दबाव या भय में कमजोरों को त्याग दे, तो ईश्वर की प्रतिज्ञा उन पर कायम रहती है—परन्तु यही वचन हमारे लिए चुनौती भी है: क्या हम पृथक नहीं रहने वाले हैं? क्या हम अनाथों, विधवाओं और कमजोरों की देखभाल में सामूहिक भागीदारी दिखाते हैं? व्यक्तिगत स्तर पर यह हमारा निर्धारण है कि हम संवेदनशीलता, सहायता और न्याय के प्रति सक्रिय होंगे।
निष्कर्षतः यिर्मयाह 49:11 ईश्वर की दयालु, संरक्षक प्रकृति और समुदाय की नैतिक जिम्मेदारी दोनों को एक साथ उद्घाटित करता है। यह हमें याद दिलाता है कि सच्चा धर्म कमजोरों के प्रति सक्रिय करुणा में परखा जाता है।