Old Testament
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यिर्मयाह 1 यिर्मयाह 2 यिर्मयाह 3 यिर्मयाह 4 यिर्मयाह 5 यिर्मयाह 6 यिर्मयाह 7 यिर्मयाह 8 यिर्मयाह 9 यिर्मयाह 10 यिर्मयाह 11 यिर्मयाह 12 यिर्मयाह 13 यिर्मयाह 14 यिर्मयाह 15 यिर्मयाह 16 यिर्मयाह 17 यिर्मयाह 18 यिर्मयाह 19 यिर्मयाह 20 यिर्मयाह 21 यिर्मयाह 22 यिर्मयाह 23 यिर्मयाह 24 यिर्मयाह 25 यिर्मयाह 26 यिर्मयाह 27 यिर्मयाह 28 यिर्मयाह 29 यिर्मयाह 30 यिर्मयाह 31 यिर्मयाह 32 यिर्मयाह 33 यिर्मयाह 34 यिर्मयाह 35 यिर्मयाह 36 यिर्मयाह 37 यिर्मयाह 38 यिर्मयाह 39 यिर्मयाह 40 यिर्मयाह 41 यिर्मयाह 42 यिर्मयाह 43 यिर्मयाह 44 यिर्मयाह 45 यिर्मयाह 46 यिर्मयाह 47 यिर्मयाह 48 यिर्मयाह 49 यिर्मयाह 50 यिर्मयाह 51 यिर्मयाह 52Verse
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मुख्य विचार
यिर्मयाह 49:5 में प्रभु की घोषणा यह दर्शाती है कि बैबिलोन की आस-पास की जातियों की भयभीत स्थिति उनके संकट का एक प्राकृतिक परिणाम है—उनके भीतर भय पैदा कर दिया जाएगा और वे अराजकता में फैलेंगे, परन्तु कोई उन्हें बचाने वाला नहीं होगा। यह वचन दंड और चेतावनी दोनों के रूप में आया है।
साहित्यिक संदर्भ
यह पद यिर्मयाह के उन दंडवचनों का हिस्सा है जो विभिन्न पड़ोसी राष्ट्रों पर केंद्रित हैं। अध्याय 49 अमोनियों, मोआब, एदम तथा अन्यों के खिलाफ परमेश्वर की वाणी संकलित करता है। यहाँ ऐसी भाषा दिखाई देती है जो आशंका और पराजय के दृश्य प्रस्तुत करती है—लोग भिंडे हुए, समुचित आयोजन विफल और कोई व्यवस्थित बचाव नहीं। यह न केवल भविष्यवाणी है, बल्कि न्याय के तर्क का परिणाम भी है: उनका पतन उनके कृत्यों और परमेश्वर के निर्धारण का फल है।
वैधिक और धार्मिक अर्थ
वचन का नैतिक और धार्मिक आयाम यह बताता है कि परमेश्वर के निर्णय मनुष्यों के भय और अस्मयभाव को उत्पन्न कर सकते हैं। भय यहाँ शुद्ध विपत्ति नहीं, बल्कि परमेश्वर की न्यायिक कार्रवाई के परिणामस्वरूप आनेवाला आत्मबलिहीनता है। यह चेतावनी भी है कि जब ईश्वर ने फैसला कर दिया तो मानव प्रयास व्यर्थ हो सकते हैं—क्योंकि "कोई उन्हें इकट्ठा न करेगा" बताता है कि सामूहिक संगठन और नेतृत्व विफल हो जाएगा।
शास्त्र के अन्य संबंध
विचारार्थ प्रश्न
इन प्रश्नों पर ध्यान दें और आत्मनिरीक्षण करें:
मथ्यू हैनरी, आर्टर बार्न्स व एडम क्लार्क के उद्धरण (संक्षेप)
इन पुरानी टिप्पणियों में मिलती-जुलती धारणा यह है कि इस प्रकार की भविष्यवाणियाँ न केवल घटनात्मक अनुमान हैं, बल्कि नैतिक नतीजे दिखाती हैं। मथ्यू हैनरी ने इस तरह की विनाशकारी भय-चित्रण को परमेश्वर के न्याय का उपकरण कहा है; अल्बर्ट बार्न्स ने कहा कि व्यूह-तोड़ और सामाजिक विघटन भविष्यवाणी का व्यावहारिक प्रमाण है; एडम क्लार्क ने स्पष्ट किया कि सामाजिक असुरक्षा तब होती है जब नेतृत्व और विश्वास ध्वस्त हो जाते हैं। (इनका वाक्यांश संक्षेप में प्रस्तुत किया गया है, कोई लंबा शब्दशः उद्धरण शामिल नहीं किया गया।)
संक्षेप और उपयोगी व्याख्या
यिर्मयाह 49:5 हमें यह सिखाता है कि परमेश्वर के न्याय का परिणाम सामाजिक-राजनीतिक विघटन भी हो सकता है। भय और पराजय केवल शारीरिक हानि नहीं, बल्कि सामूहिक विश्वास और व्यवस्था की गिरावट भी हैं। आज के पाठक के लिए संदेश स्पष्ट है: सामुदायिक आचरण, नेतृत्व तथा ईश्वर के मार्ग से हटना गंभीर परिणाम ला सकता है। परन्तु साथ ही अभिप्राय यह भी है कि भय से विनाश की ओर ले जाने वाली राह पहचानी जाए और सुधार के लिए लौटने की जरूरत है।