Old Testament
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यिर्मयाह 1 यिर्मयाह 2 यिर्मयाह 3 यिर्मयाह 4 यिर्मयाह 5 यिर्मयाह 6 यिर्मयाह 7 यिर्मयाह 8 यिर्मयाह 9 यिर्मयाह 10 यिर्मयाह 11 यिर्मयाह 12 यिर्मयाह 13 यिर्मयाह 14 यिर्मयाह 15 यिर्मयाह 16 यिर्मयाह 17 यिर्मयाह 18 यिर्मयाह 19 यिर्मयाह 20 यिर्मयाह 21 यिर्मयाह 22 यिर्मयाह 23 यिर्मयाह 24 यिर्मयाह 25 यिर्मयाह 26 यिर्मयाह 27 यिर्मयाह 28 यिर्मयाह 29 यिर्मयाह 30 यिर्मयाह 31 यिर्मयाह 32 यिर्मयाह 33 यिर्मयाह 34 यिर्मयाह 35 यिर्मयाह 36 यिर्मयाह 37 यिर्मयाह 38 यिर्मयाह 39 यिर्मयाह 40 यिर्मयाह 41 यिर्मयाह 42 यिर्मयाह 43 यिर्मयाह 44 यिर्मयाह 45 यिर्मयाह 46 यिर्मयाह 47 यिर्मयाह 48 यिर्मयाह 49 यिर्मयाह 50 यिर्मयाह 51 यिर्मयाह 52Verse
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यिर्मयाह 49:2 का संदर्भ और अर्थ
यिर्मयाह भविष्यद्वक्ता बतलाते हैं कि यहोवा दमकती हुई योजना में अम्मोनियों के नगर रोब्बाह के विरुद्ध युद्ध की ललकार सुनाएगा। रोब्बाह वर्तमान अम्मौन की राजधानी है, जिसे नष्ट कर देने, फूँक-फूँककर खण्डहर बनाने की प्रतिज्ञा ईश्वर के न्याय के क्रम का हिस्सा है। यह कहावत सामने आती है ताकि यहूदियों के पड़ोसी राष्ट्रों के व्यवहार-स्वभाव पर चेतावनी बने—यद्यपि देश-परिदृश्य बदल सकता है, परमेश्वर की न्याय-परिपाटी अपरिवर्तित है। इस वचन में यहोवा अपने लोगों के लिए क्षमा-égrार्थन पुनर्निर्माण का मार्ग भी दिखाते हैं: उनके देश पर अधिकार अब परमेश्वर के नियंत्रण में है और लौटकर इस्राएल के लोग अपना देश वापस पायेंगे।
मूल भाव और केंद्रीय अर्थ
यह वचन स्पष्ट करता है कि परमेश्वर की योजना के विरुद्ध हिंसा और दमन का क्रम टिक नहीं सकता। रोब्बाह की विभिषिका से यहूदियों को यह संदेश मिलता है कि स्थानीय शत्रु कितने शक्तिशाली क्यों न हों, पर ईश्वर का न्याय उच्च और स्थिर है। जब अम्मोनियों के नगर उजड़ते हैं, तब जो लोग इस्राइलियों के देश को अपना लेते हैं, वे अपने पुराने स्थलों पर लौटेंगे—यह पुनर्स्थापना और विश्वास की पुनर्जागरण की दिशा में एक स्पष्ट संकेत है।
प्रमुख विषय
संबद्ध पाठ-संदर्भ
1) यिर्मयाह 50-51: बंधनयुक्त राष्ट्रों के विरुद्ध यहोवा का न्याय और भविष्य के उद्धार की योजना।
2) यसियों 21:10-12: राष्ट्रों के भाग्य और परमेश्वर के उद्धार के संकेतों का तुलना।
3) देणामुक्ति का विचारात्मक समानार्थ: यहूदी-गति और देश-परिवर्तन का धर्मी नियत।
व्यावहारिक आत्मचिंतन
जो लोग अपनी सुरक्षा earthly सत्ता में देखते हैं, उनके लिए यह वचन सचेत करता है कि परमेश्वर की योजना के बाहर टिकना संभव नहीं। विश्वास की स्थिरता तब प्रकट होती है जब तब भी जब परिस्थितियाँ कठिन हों, हम परमेश्वर की न्याय-योजना पर भरोसा रखकर अपने जीवन को उनके उद्देश्य के अनुरूप समर्पित करें। नयी आशा का समय आ सकता है, जब लोग अपने देश और पहचान को पुनः पा लेते हैं।
क्रॉस-रेफरेंसेस और उनका संक्षिप्त स्पष्टीकरण
• यिर्मयाह 50-51: यहोवा के न्याय की व्यापक घोषणा—शत्रुओं के विरुद्ध एक गहरे दिव्य निर्णय की तैयारी।
• यशाय 41:11-12: ईश्वर के संरक्षण में भय मुक्त पुनःस्थापन की संभावना, विपत्ति के बाद उद्धार का संदेश।
• दानिष्ट 3:16-18: परमेश्वर के नियंत्रण में रहने पर भयमुक्त विश्वास का उदाहरण।
संक्षिप्त निष्कर्ष
यिर्मयाह 49:2 यहोवा की न्याय-योजना का एक भाग है जिसमें अम्मोनियों के विरुद्ध युद्ध की ललकार के साथ देश-न्याय और पुनर्स्थापन का संदेश समाहित है। यह चेतावनी देता है कि शक्तिशाली बाह्य संयोजन भी परमेश्वर के आदेश से ऊपर नहीं और लौटकर विश्वासियों के देश वे ही क्षण-क्षण में पुनः बसेंगे।
उद्धरण नोट
यदि उपलब्ध हो, नीचे दिए उद्धरण पारंपरिक टिप्पणियों से सीधे लिए गए हैं:
“यहोवा की वाणी है... उजड़कर खण्डहर हो जाएगा” — यहोवा के न्याय की कठोरता एवं देश-फिर से आबाद कराने की आशा की समन्वयता को दर्शाती है।
ध्यान दें: मौलिक टिप्पणियाँ Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke से मिनिमल उपयोग में शामिल की गई हैं; यहाँ उनके विशिष्ट शब्दों को संक्षेप में समाहित किया गया है।