Old Testament
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मत्ती 1:25 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
और जब तक वह पुत्र न जनी तब तक वह उसके पास न गया: और उसने उसका नाम यीशु रखा।
मत्ती 1:25 पद-दर-पद बाइबल टीका
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मत्ती 1:25 समानांतर पद और संबंधित वचन
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निर्गमन 22:29 (HINIRV) »
“अपने खेतों की उपज और फलों के रस में से कुछ मुझे देने में विलम्ब न करना*। अपने बेटों में से पहलौठे को मुझे देना।

निर्गमन 13:2 (HINIRV) »
“क्या मनुष्य के क्या पशु के, इस्राएलियों में जितने अपनी-अपनी माँ के पहलौठे हों, उन्हें मेरे लिये पवित्र मानना*; वह तो मेरा ही है।”

मत्ती 1:21 (HINIRV) »
वह पुत्र जनेगी और तू उसका नाम यीशु* रखना, क्योंकि वह अपने लोगों का उनके पापों से उद्धार करेगा।”
मति 1:25 का स्पष्ट अर्थ
यह वचन बताता है कि यीशु का जन्म के समय यीशु का नाम उनके दाय पर रखा गया और ऐंसा कहा गया कि माता-पिता ने उसे पुत्र के रूप में संरक्षित किया। विशेष रूप से, मरियम के गर्भधारण के बाद, पवित्र परिवार को यह संकेत मिला कि उनका पुत्र जीसस होगा, और वे उसे यीशु नाम से बुलाते रहे, जिसका मूल अर्थ है “यहोवा उद्धार करेगा”।
प्रसंगिक पृष्ठभूमि
यरुशलम के बाहर से आए राहताने के साथ, ग़ायब नहीं—परिवार का घर Nazareth में था। इस पाठ के संदर्भ में यीशु का नामकरण पवित्र योजना का हिस्सा है, जो मसीह के पदार्पण और उनके उद्धार मिशन को संकेत करता है।
व्याख्यात्मक दृष्टिकोण
1) पवित्र नाम का महत्व: यीशु नाम देह-स्वरूप घोषणा का केंद्र है; इसका अभिप्राय उद्धारकर्ता के रूप में प्रभु का कार्य है। 2) क्रमशः घटनाक्रम: पिता-यूसुफ के स्वप्नों के साथ, यह नामकरण परिवार और समुदाय के लिए स्पष्ट संकेत है कि ईश्वर उन्हीं के साथ है। 3) न बपतिस्मा-उत्प्रेक्षण: महत्त्वपूर्ण यह है कि यीशु का जन्म सामान्य तरीके से नहीं, बल्कि दिव्यता और योजनाबद्ध उद्धार के साथ जुड़ा है।
संश्लेषित विचार
अन्य प्रासंगिक संदर्भ
1) मत्ती 1:21 — “तुम उनके लिए पुत्र को जन्म देंगे, और तुम उसका नाम यीशु रखना, क्योंकि वही अपने लोगों को उनके पापों से उद्धार देगा।” यह नामकरण उद्धार की योजना को स्पष्ट रूप से उद्घाटित करता है।
2) लूका 2:21 — शिशु के चैंसकर में नामकरण परंपरा पर प्रकाश डालता है कि जन्म के आठवें दिन पुत्र को संस्कार दिया गया।
3) प्रेरितों के काम 4:12 — यीशु के नाम के भीतर उद्धार की शक्ति का केंद्रीय स्थान उद्धृत करता है, जहाँ इसे किसी और नाम के भीतर नहीं खोजा जा सकता।
किरदार-पत्र और व्यावहारिक takeaway
- परमेश्वर की योजना में हर नाम और हर कदम एक उद्देश्य के साथ जुड़ा है। यीशु के नाम का चयन बेहतरीन उद्धार के मिशन की शुरुआत को दर्शाता है।
- विश्वासियों के लिए यह याद दिलाता है कि हमारे जीवन में भी छोटे-छोटे निर्णय परमेश्वर की योजनाओं से जुड़ते हैं और उनमें उद्धार की आशा होती है।
यूज़र-फ्रेंडली cross-reference सार
• मत्ती 1:21 — उद्धारकर्ता के नामकरण का सीधे कारण बताता है।
• लूका 2:21 — शिशु के नामकरण और धार्मिक प्रतीक के बारे में नोट देता है।
• प्रेरितों के काम 4:12 — यीशु के नाम में उद्धार की शक्ति के केन्द्र को स्पष्ट करता है।
निष्कर्ष के तौर पर, मत्ती 1:25 में यीशु का नाम रखना ईश्वर की उद्धारयोग्य योजना का प्रारम्भिक संकेत है—एक न बार नहीं बल्कि पुरे इतिहास में.expectation fulfilled
यूटिल नोट: Matthew Henry, Albert Barnes, Adam Clarke के संदर्भ में संक्षिप्त विचार यह हैं—
— Henry के अनुसार, नामकरण के साथ मसीह के आने की योजना स्पष्ट की जाती है और यह पवित्रता के साथ जुड़ा है।
— Barnes ने संकेत किया कि यह नामकरण परिवार को एक पुख्ता दिशानिर्देश देता है कि कैसे आने वाला मसीह उनकी आशाओं को पूरा करेगा।
— Clarke ने विचार किया कि नाम से भाव प्रेरित होता है, जो उद्धार के कार्य को संकेतित करता है।